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‘Gen Z’ से शुरू हुआ सवाल पहुंचा मानवता के भविष्य तक, निष्कर्ष: मिश्रण तय है, चुनौती यह कि समाज उसे कैसे संभालता है

प्रो. एएन पुरोहित की 15 पृष्ठ की पुस्तिका में सामाजिक, सांस्कृतिक और आनुवंशिक हाइब्रिडाइजेशन पर विमर्श

Round The Watch News: आज की दुनिया में समाजों, संस्कृतियों और मानव आबादियों का आपस में मिलना अब कोई भविष्य की संभावना नहीं, बल्कि लगातार तेज होती वास्तविकता है। प्रवासन, अंतर-सांस्कृतिक विवाह, शिक्षा, शहरीकरण, वैश्वीकरण, सोशल मीडिया, तकनीक और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस प्रक्रिया को अभूतपूर्व गति दे दी है। लेकिन इसका अंतिम परिणाम क्या होगा—क्या दुनिया एक जैसी संस्कृति में बदल जाएगी, क्या स्थानीय पहचान कमजोर होगी, क्या पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ेगी और क्या आनुवंशिक मिश्रण मानव समाज को किसी नई दिशा में ले जाएगा?

प्रो. एएन पुरोहित की पुस्तिका ‘Social, Cultural and Genetic Hybridisation and its Global Impact in the Future’ इन्हीं सवालों का जवाब तलाशती है। पुस्तिका का मूल विचार यह है कि हाइब्रिडाइजेशन यानी विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आनुवंशिक तत्वों का मिश्रण अपने आप में न अच्छा है, न बुरा। उसका परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज इस बदलाव को कितनी समझदारी, वैज्ञानिक दृष्टि, मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ स्वीकार करता है।

यह पुस्तिका किरण बडोला के जन्मदिन 5 मार्च पर उन्हें जन्मदिन के उपहार के रूप में समर्पित की गई है। इसके शुरुआती पृष्ठ पर इसे ‘A Birthday Gift’ के रूप में प्रस्तुत करते हुए किरण बडोला को प्रेम, स्नेह और आशीर्वाद के साथ समर्पित किया गया है।

सबसे बड़ा निष्कर्ष: हाइब्रिडाइजेशन को रोका नहीं जा सकता
पुस्तिका का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि आने वाले समय में मानव समाजों के बीच संपर्क और मिश्रण और बढ़ेगा। इसलिए सवाल यह नहीं कि हाइब्रिडाइजेशन होगा या नहीं—वह होगा ही। असली सवाल यह है कि उससे किस तरह का मानव समाज तैयार होगा।

लेखक के अनुसार मानव इतिहास खुद इस बात का प्रमाण है कि समाज कभी पूरी तरह बंद और स्थिर इकाइयां नहीं रहे। लोगों ने व्यापार, प्रवासन, विवाह और राजनीतिक-सामाजिक संपर्क के माध्यम से एक-दूसरे की भाषाएं, खानपान, तकनीक, विचार और आनुवंशिक विविधता ग्रहण की है। आधुनिक परिवहन और डिजिटल संचार ने केवल इस प्रक्रिया की गत और पैमाना बढ़ाया है। ?.799इसलिए भविष्य को रोकने की कोशिश के बजाय जरूरत है कि बदलाव मानवीय, स्वैच्छिक, वैज्ञानिक रूप से सूचित और सांस्कृतिक रूप से रचनात्मक हो।

नतीजा यह नहीं कि दुनिया एक द बन जाएगी
पुस्तिका का निष्कर्ष उस धारणा को भी चुनौती देता है कि वैश्वीकरण अंततः दुनिया की सभी संस्कृतियों को एक जैसा बना देगा। इसके बजाय संभावना यह है कि भविष्य में कई संस्कृतियां बनी रहेंगी, लेकिन उनमें एक-दूसरे के प्रभाव से पैदा हुए हाइब्रिड तत्व लगातार बढ़ेंगे।

यानी भविष्य की दुनिया में स्थानीय और वैश्विक पहचान साथ-साथ रह सकती हैं। एक व्यक्ति घर में क्षेत्रीय भाषा बोल सकता है, भारतीय परंपराओं से जुड़ा हो सकता है, भारतीय सिनेमा देख सकता है, कोरियाई संगीत सुन सकता है, अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल कर सकता है और वैश्विक वैज्ञानिक सामग्री पढ़ सकता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि उभरते हुए हाइब्रिड मानव की वास्तविकता है।

परिणाम: पहचान मिटे नहीं, बल्कि कई परतों वाली हो
सामाजिक हाइब्रिडाइजेशन का एक प्रमुख परिणाम यह है कि व्यक्ति की पहचान अब पहले की तरह एकल नहीं रह गई है। गांव में जन्मा व्यक्ति शहर में पढ़ सकता है, अंतरराष्ट्रीय संस्था में नौकरी कर सकता है और डिजिटल माध्यम से अपने परिवार और स्थानीय समुदाय से जुड़ा रह सकता है। अलग-अलग सामाजिक दुनियाओं के बीच लगातार आने-जाने से पहचान बहुस्तरीय हो रही है।

इसका सकारात्मक परिणाम व्यापक सामाजिक नेटवर्क, पूर्वाग्रहों में कमी, सहयोग और नए अवसरों के रूप में सामने आ सकता है। लेकिन इसके नकारात्मक परिणाम भी संभव हैं—सामुदायिक जुड़ाव कमजोर होना, सामाजिक विखंडन, अकेलापन और पारंपरिक belonging के खत्म होने का भाव।

इसलिए लेखक के अनुसार सामाजिक मिश्रण को केवल ‘मिलना’ नहीं समझना चाहिए। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अलग-अलग सामाजिक संसारों से क्या लेना है और क्या छोड़ना है, इसका चुनाव करता है।

सांस्कृतिक परिणाम: न पूरी अस्वीकृति, न अंधी स्वीकृति
भोजन, भाषा, संगीत, पहनावा, वास्तुकला, साहित्य और सिनेमा में सांस्कृतिक मिश्रण पहले से दिखाई दे रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संस्कृति खत्म हो रही है। लेखक के अनुसार संस्कृतियां इसलिए जीवित रही हैं क्योंकि उनमें समय के साथ बदलने और बाहरी प्रभावों को अपनाने की क्षमता रही है।

हालांकि, इसके दो खतरे हैं, बाहरी प्रभावों को पूरी तरह रोक देने से संस्कृति कठोर हो सकती है। हर नए प्रभाव को बिना विचार स्वीकार करने से उसकी विशिष्ट पहचान कमजोर हो सकती है। इसका समाधान पुस्तिका ‘Selective Continuity’ के रूप में देती है—जो मूल्य, स्मृतियां और परंपराएं समाज को अर्थ देती हैं, उन्हें बचाया जाए; वहीं उपयोगी और रचनात्मक बदलाव के लिए रास्ता खुला रखा जाए।

भारत के लिए निष्कर्ष और भी महत्वपूर्ण
पुस्तिका का भारतीय संदर्भ में बड़ा निष्कर्ष है कि भारत को पश्चिमी पीढ़ीगत लेबल और वैश्विक सांस्कृतिक प्रभावों को ज्यों का त्यों स्वीकार करने के बजाय उन्हें अपने ऐतिहासिक अनुभव से जोड़कर देखना चाहिए।

Baby Boomers, Generation X, Millennials, Gen Z और Generation Alpha जैसे वर्गीकरण उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे भारतीय समाज की पूरी तस्वीर नहीं देते। एक ही उम्र के लोग भारत में बिल्कुल अलग आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों में पले-बढ़े हो सकते हैं।

भारतीय संदर्भ में पीढ़ी, वंश, कुल, गोत्र, संतति और परंपरा जैसी अवधारणाएं पीढ़ियों को केवल जन्म-वर्ष से नहीं, बल्कि परिवार, पूर्वजों, स्मृति, जिम्मेदारी और मूल्यों के हस्तांतरण से जोड़ती हैं। इसलिए निष्कर्ष यह है कि Gen Z को समझना जरूरी है, लेकिन भारतीय युवाओं को केवल Gen Z कहकर समझ लेना पर्याप्त नहीं है।

Gen Z का परिणाम: वैश्विक जुड़ाव, लेकिन स्थानीय जड़ें
भारत में Gen Z की लोकप्रियता स्वयं वैश्वीकरण का परिणाम है। भारतीय युवा वैश्विक डिजिटल संस्कृति से जुड़े हैं, लेकिन उनकी वास्तविक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। महानगर के युवा और हिमालयी गांव के युवा के लिए तकनीक, शिक्षा, रोजगार, परिवार और सामाजिक जीवन के अनुभव अलग हो सकते हैं।

इसलिए भारतीय Gen Z की पहचान में एक दिलचस्प द्वंद्व दिखाई देता है, वैश्विक भी और स्थानीय भी। डिजिटल भी और सामाजिक रूप से जड़ित भी। व्यक्तिवादी भी और परिवार-केंद्रित भी। पुस्तिका का निष्कर्ष है कि भारत को पश्चिमी template में युवाओं को फिट करने के बजाय उनकी इस बहुस्तरीय पहचान को समझना चाहिए।

पीढ़ियों को जन्म-वर्ष से नहीं, इतिहास से समझने का सुझाव
पुस्तिका एक वैकल्पिक भारतीय ढांचे की संभावना भी सामने रखती है। इसमें Freedom-Struggle Generation, Nation-Building Generation, Development Generation, Liberalisation Generation और Digital Generation जैसे ऐतिहासिक चरणों के जरिए पीढ़ियों को समझने का सुझाव है।

ये कठोर demographic categories नहीं, बल्कि यह समझने के तरीके हैं कि किस पीढ़ी पर कौन-सी ऐतिहासिक, तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा। आगे चलकर AI, जलवायु परिवर्तन, जैव-प्रौद्योगिकी और बढ़ती उम्र की आबादी जैसी घटनाएं नई पीढ़ियों की पहचान को प्रभावित कर सकती हैं।

आनुवंशिक परिणाम: ‘श्रेष्ठ मानव’ की धारणा वैज्ञानिक नहीं
पुस्तिका आनुवंशिक मिश्रण को लेकर भी एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष देती है। मानव आबादियां हजारों वर्षों से प्रवास और मिश्रण करती रही हैं। Genetic admixture मानव इतिहास की सामान्य प्रक्रिया है। इसे किसी ‘श्रेष्ठ’ या ‘हीन’ मानव प्रकार के निर्माण के रूप में देखना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। मानव आनुवंशिक विविधता जटिल है और अधिकांश genetic differences आबादियों के भीतर मौजूद होते हैं, न कि सरल तरीके से बड़े महाद्वीपीय समूहों के बीच।

आनुवंशिक मिश्रण कुछ परिस्थितियों में विविधता बढ़ा सकता है और छोटी अलग-थलग आबादियों में दुर्लभ हानिकारक आनुवंशिक रूपांतरों के केंद्रित रहने की संभावना कम कर सकता है। लेकिन स्वास्थ्य, व्यवहार, बुद्धिमत्ता और व्यक्तित्व को केवल genes से तय मानना गलत होगा। नतीजा साफ है, भविष्य का ‘हाइब्रिड मानव’ न अपने आप बेहतर होगा, न खराब।

वैज्ञानिक भविष्य का सबसे बड़ा खतरा: जेनेटिक्स का दुरुपयोग
Genomic science से personalised medicine और बीमारी के जोखिम को बेहतर समझने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसी के साथ genetic information के दुरुपयोग का खतरा भी बढ़ेगा। बीमा और रोजगार में आनुवंशिक आधार पर भेदभाव, genetic privacy का उल्लंघन और समूहों के बीच वैज्ञानिक रूप से निराधार अंतर बताने की कोशिशें गंभीर खतरे हैं। इसलिए भविष्य की आनुवंशिक व्यवस्था का आधार होना चाहिए। जैसे स्वास्थ्य, सहमति, निजता, समानता और वैज्ञानिक प्रमाण। ‘Genetic perfection’ की कल्पना के आधार पर सामाजिक hierarchy बनाने की कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

सामाजिक संघर्ष का असली कारण हाइब्रिडाइजेशन नहीं, असमानता है। पुस्तिका का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि सांस्कृतिक और सामाजिक मिश्रण अपने आप संघर्ष पैदा नहीं करता। संघर्ष की जड़ अक्सर होती है-असमान शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, बहिष्कार, भेदभाव, राजनीतिक हेरफेर और सांस्कृतिक पहचान खोने का डर। जब लोगों को लगता है कि उनकी पहचान खतरे में है, तब सांस्कृतिक अंतर राजनीतिक संघर्ष का रूप ले सकते हैं। इसका समाधान जबरन एकरूपता नहीं, बल्कि निष्पक्ष संस्थाएं और विश्वास हैं, जहां अलग-अलग समुदाय अपनी वैध पहचान बनाए रखते हुए समान रूप से भाग ले सकें।

प्रवासन का परिणाम: नवाचार भी, तनाव भी
प्रवासन आने वाले दशकों में भी हाइब्रिडाइजेशन का बड़ा माध्यम बना रहेगा। शिक्षा, रोजगार, विवाह, सुरक्षा और अवसरों के कारण लोग सीमाओं और क्षेत्रों के पार जाते रहेंगे। इससे कौशल, नेटवर्क और विचारों का आदान-प्रदान होगा तथा नवाचार को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन गलत तरीके से प्रबंधित प्रवासन आर्थिक संसाधनों, सांस्कृतिक मानकों और राजनीतिक पहचान को लेकर तनाव पैदा कर सकता है। इसलिए पुस्तिका का निष्कर्ष है, प्रवासन को रोकना समाधान नहीं; बुद्धिमत्तापूर्ण सामाजिक एकीकरण जरूरी है।

शहरों का भविष्य: विविधता के साथ सह-अस्तित्व
भविष्य के शहर अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, खानपान और जीवनशैलियों के मेल के केंद्र होंगे। इससे रचनात्मकता और आर्थिक गतिशीलता बढ़ सकती है। लेकिन केवल सड़क, भवन और डिजिटल infrastructure पर्याप्त नहीं होगा। शहरों को ऐसे सार्वजनिक और सामुदायिक स्थान चाहिए जहां लोग वास्तव में एक-दूसरे से जुड़ सकें। भविष्य का सफल शहर वह नहीं जहां विविधता समाप्त हो जाए, बल्कि वह जहां विविधता स्थायी संघर्ष में बदले बिना साथ रह सके।

परिवार बदलेंगे, लेकिन रिश्तों की बुनियाद नहीं
अंतर-क्षेत्रीय और अंतर-सांस्कृतिक विवाह बढ़ने से परिवारों में भाषाओं, परंपराओं और मूल्यों का नया मिश्रण हो सकता है। साथ ही पहचान, पारिवारिक अपेक्षाओं और बच्चों की परवरिश को लेकर नई चुनौतियां भी सामने आएंगी। भविष्य का परिवार आकार और स्वरूप में ज्यादा विविध हो सकता है, लेकिन उसे अब भी चाहिए होगा। जिसमें शामिल होना चाहिए स्नेह, विश्वास, जिम्मेदारी, सम्मान और पीढ़ियों के बीच देखभाल। तकनीक संपर्क का तरीका बदल सकती है, लेकिन मानव संबंधों की जगह पूरी तरह नहीं ले सकती।

AI का परिणाम: ज्ञान का विस्तार या अभिव्यक्ति की एकरूपता?
Artificial Intelligence भविष्य के मानव समाज को हाइब्रिडाइजेशन का नया आयाम दे रही है। AI भाषा अनुवाद, शिक्षा, वैज्ञानिक विश्लेषण और अंतर-सांस्कृतिक संवाद में मदद कर सकती है। इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोगों के बीच संवाद और तेज हो सकता है। लेकिन यदि पूरी दुनिया विचार, लेखन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए समान AI प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर हो गई तो अभिव्यक्ति के एकरूप होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए AI को उपकरण बनाना है, मनुष्य का विकल्प नहीं।

2050 के बाद की दुनिया: ‘एक दुनिया’ नहीं, overlapping identities
पुस्तिका के अनुमान के मुताबिक 2050 के आसपास दुनिया अधिक शहरी, ज्यादा जुड़ी हुई और ज्यादा सांस्कृतिक रूप से मिश्रित हो सकती है। Digital identity महत्वपूर्ण होगी। अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और रोजगार बढ़ सकते हैं। कई समाजों में अंतर-क्षेत्रीय और अंतर-सांस्कृतिक परिवारों की संख्या बढ़ सकती है।

लेकिन इसके साथ स्थानीय पुनरुत्थान भी हो सकता है। कुछ समुदाय अपनी भाषा, भोजन, वास्तुकला और परंपराओं को वैश्वीकरण के दबाव के जवाब में और मजबूती से बचाने की कोशिश करेंगे। इसलिए संभावित परिणाम एक समान वैश्विक संस्कृति नहीं, बल्कि overlapping identities वाली दुनिया है। सबसे बड़ी अनिश्चितता यह होगी कि क्या संस्थाएं तकनीक और प्रवासन की रफ्तार के बराबर तेजी से बदल पाएंगी।

उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा परिणाम: पहाड़ में अवसर आएं, सिर्फ पलायन नहीं
पुस्तिका का उत्तराखंड और हिमालय पर केंद्रित निष्कर्ष खास तौर पर महत्वपूर्ण है। हिमालयी समाज पहले से प्रवासन, मौसमी आवाजाही, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अनुभव रखते हैं। उत्तराखंड की भौगोलिक कठिनाइयों के बीच विविध समुदाय और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं मौजूद हैं।

वैश्विक संपर्क से उत्तराखंड को पर्यटन, शिक्षा, डिजिटल काम, शोध, उच्च-मूल्य वाले पर्वतीय उत्पाद के क्षेत्र में अवसर मिल सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ अत्यधिक पलायन गांवों की संस्थाओं और सांस्कृतिक हस्तांतरण को कमजोर कर सकता है। इसलिए उत्तराखंड के लिए सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि डिजिटल कनेक्टिविटी पहाड़ को अवसर दे, सिर्फ लोगों को पहाड़ छोड़ने का जरिया न बने।उत्तराखंड को दुनिया से कटकर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और पारिस्थितिक ताकत के साथ वैश्विक दुनिया में भागीदारी करनी चाहिए।

क्या बचाना है? जो मानव गरिमा और सामाजिक भरोसा मजबूत करे
पुस्तिका अतीत की हर चीज को बचाने की वकालत नहीं करती।
उसके अनुसार बचाने योग्य चीजें वे हैं जो मानव गरिमा, सामाजिक विश्वास, पर्यावरणीय जिम्मेदारी, सांस्कृतिक स्मृति, पीढ़ियों के बीच संबंध को मजबूत करती हैं।

स्थानीय भाषाएं, पारंपरिक ecological knowledge, स्थानीय भोजन, सामुदायिक संस्थाएं, संगीत, वास्तुकला और नैतिक परंपराएं बदलते समय के साथ खुद को ढालकर जीवित रह सकती हैं। संरक्षण का मतलब परंपरा को संग्रहालय की वस्तु बनाना नहीं, बल्कि उसे जीवित रखना है।

क्या बदलना जरूरी है? पुराना होना सही होने की गारंटी नहीं
पुस्तिका का दूसरा निर्णायक निष्कर्ष है कि ऐसी परंपराओं को बदलने की अनुमति होनी चाहिए जो अनावश्यक पीड़ा, बहिष्कार या असमानता पैदा करती हैं। विज्ञान को अंधविश्वास को चुनौती देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। महिलाओं और पुरुषों को अपने जीवन को लेकर ज्यादा स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। युवाओं को पुरानी प्रथाओं पर सम्मानपूर्वक सवाल उठाने का अधिकार होना चाहिए।

इसलिए दो कसौटियां सामने आती हैं—परंपरा सिर्फ पुरानी है, इसलिए सही नहीं। आधुनिकता सिर्फ नई है, इसलिए सही नहीं।
दोनों का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वे मानवीय और टिकाऊ समाज बनाने में कितनी मदद करती हैं।

अंतिम परिणाम: ‘पुराना बनाम नया’ नहीं, ‘निरंतरता के साथ बदलाव’
पूरी पुस्तिका का निष्कर्ष अंततः ‘Gen Z’ के सवाल से कहीं आगे निकल जाता है। मानव समाज लगातार बदल रहा है—सामाजिक संपर्क, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, प्रवासन, अंतर-विवाह, शिक्षा और तकनीक के कारण। यह मानव इतिहास की सामान्य प्रक्रिया है।

लेकिन तेज बदलाव के खतरे भी वास्तविक हैं—पहचान कमजोर हो सकती है, असमानता बढ़ सकती है और नई नैतिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए भविष्य को ‘पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी’ या ‘परंपरा बनाम आधुनिकता’ के संघर्ष के रूप में देखना गलत होगा।

लेखक इसके स्थान पर एक तीसरा रास्ता रखते हैं—Continuity with Change — बदलाव के साथ निरंतरता। बुजुर्ग पीढ़ी के पास अनुभव और ज्ञान है। युवा पीढ़ी के पास नई परिस्थितियों के अनुरूप कुछ नया बनाने की क्षमता। किसी एक को दूसरे की जगह लेने की जरूरत नहीं। और सबसे बड़ा संदेश: भविष्य में इंसान को ‘बेहतर उत्पाद’ नहीं, इंसान ही रहना है। पुस्तिका का अंतिम चिंतन पूरे विमर्श को एक केंद्रीय सिद्धांत पर लाकर खड़ा करता है।

मानवता का भविष्य केवल हाइब्रिडाइजेशन से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि मानवता हाइब्रिडाइजेशन को कितनी बुद्धिमत्ता से संभालती है। मनुष्य ज्यादा जुड़ सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि एक जैसा हो जाए। वह ज्यादा वैज्ञानिक हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि कम मानवीय हो। वह वैश्विक हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाए। यानी भविष्य का लक्ष्य अंतर को खत्म करना नहीं, बल्कि अलग-अलग पहचानों को संवाद, संपर्क और सहयोग के जरिए कुछ बेहतर बनाने की क्षमता देना है। और इसी अंतिम निष्कर्ष में पूरी पुस्तिका का सार छिपा है—
“Modernity and tradition need not be enemies.”

हर पीढ़ी अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच एक कड़ी है।
किरण बडोला के जन्मदिन पर दिया गया यह 15 पृष्ठ का उपहार इसलिए महज व्यक्तिगत शुभकामना नहीं रह जाता; यह बदलती पीढ़ियों, बदलती पहचान और बदलती मानव सभ्यता के सामने खड़े एक बड़े सवाल का वैचारिक उत्तर बन जाता है—बदलाव को रोकना नहीं है, लेकिन यह तय करना है कि बदलाव के बाद बचा हुआ समाज कितना मानवीय, कितना न्यायपूर्ण और कितना अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा।

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