
Round The Watch News: उत्तराखंड सरकार की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य से जुड़े उत्पीड़न और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के मामले में उनके पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को अदालत से राहत नहीं मिली है। गिरफ्तारी की आशंका के बीच दाखिल की गई अग्रिम जमानत याचिका को देहरादून की अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में कानून के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक इस मामले में लागू होती है।
यह आदेश पांचवीं अपर सत्र न्यायाधीश एवं एससी-एसटी एक्ट की विशेष न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता दिखाई दे रहा है, तो इस स्तर पर अग्रिम जमानत की अर्जी पर सुनवाई नहीं की जा सकती। इसी आधार पर पप्पू गिरधारी की याचिका खारिज कर दी गई।
15 अक्टूबर को कैंट थाने में दर्ज हुआ था मुकदमा
कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ देहरादून के कैंट थाने में 15 अक्टूबर को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत में पति पर जान से मारने का आपराधिक षड्यंत्र रचने और एससी-एसटी एक्ट से संबंधित आरोप लगाए गए हैं।
प्राथमिकी के मुताबिक, शिकायतकर्ता रेखा आर्य उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके आवास पर मौजूद स्टाफ के सामने गिरधारी लाल साहू ने उनके लिए जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। एफआईआर में कथित घटना का समय वर्ष 2004 बताया गया है।
घरेलू और आर्थिक विवाद को बताया मुकदमे की वजह
अग्रिम जमानत की मांग करते हुए बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि रेखा आर्य और गिरधारी लाल साहू करीब 22 वर्षों से पति-पत्नी हैं। दोनों के बीच घरेलू और आर्थिक मामलों को लेकर विवाद चल रहा है। बचाव पक्ष के मुताबिक, इसी विवाद के चलते एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराने का प्रयास किया गया।
आरोपी की ओर से अधिवक्ता विपिन जोशी और वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ ने पक्ष रखा। उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कराने में कथित देरी का मुद्दा भी उठाया। बचाव पक्ष ने कहा कि जिस घटना के आधार पर आरोप लगाए गए हैं, वह काफी पुरानी है और एफआईआर वर्षों बाद दर्ज कराई गई है।
बंद कमरे में घटना होने की दलील, सार्वजनिक अपमान पर सवाल
बचाव पक्ष ने अदालत में यह तर्क भी दिया कि कथित जातिसूचक शब्द घर के भीतर एक कमरे में कहे गए थे। इसलिए घटना को सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक रूप से हुई घटना नहीं माना जाना चाहिए।
अधिवक्ताओं ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट की धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध तभी लागू होता है, जब शिकायत में प्रथम दृष्टया इस अधिनियम के तहत अपराध बनता हो। बचाव पक्ष ने यह आशंका भी जताई कि मंत्री पद पर होने के कारण शिकायतकर्ता अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर आरोपी को गिरफ्तार करा सकती हैं। इसी आधार पर अदालत से अग्रिम जमानत देने की मांग की गई।
अभियोजन ने कहा- स्टाफ की मौजूदगी में किया गया अपमान
सरकारी पक्ष ने अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया। अभियोजन की ओर से विशेष लोक अभियोजक गोविंद सिंह ने अदालत में दलील दी कि प्राथमिकी में स्पष्ट रूप से स्टाफ के सामने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित करने का आरोप लगाया गया है।
अभियोजन के मुताबिक, घटनास्थल पर अन्य लोगों की मौजूदगी के आरोप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केवल यह कहने से कि कथित घटना घर के भीतर हुई थी, उसे सार्वजनिक दृष्टि से पूरी तरह बाहर नहीं माना जा सकता।
सरकारी पक्ष ने अदालत से कहा कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध का संकेत देते हैं। इसलिए अधिनियम की धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक लागू होती है और आरोपी को इस स्तर पर राहत नहीं दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी नहीं आया काम
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2020 के पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले के फैसले सहित कई न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया। इन फैसलों के आधार पर अग्रिम जमानत पर लगी रोक के संबंध में दलीलें पेश की गईं।
हालांकि, अदालत ने प्रस्तुत न्यायिक फैसलों को मौजूदा मामले की परिस्थितियों से अलग माना। न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों के आधार पर प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता हुआ पाया। इसी कारण धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध को लागू माना गया।
अदालत ने इसी कानूनी आधार पर गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी की अग्रिम जमानत याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और उसे खारिज कर दिया। फिलहाल इस आदेश से पप्पू गिरधारी को अग्रिम जमानत के जरिए गिरफ्तारी से सुरक्षा नहीं मिली है। हालांकि, याचिका खारिज होने का अर्थ अपने आप में आरोपों का अंतिम रूप से साबित होना नहीं है। मामले में आरोपों की सत्यता का निर्धारण आगे की कानूनी प्रक्रिया में होगा।



