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नंदा ससुराल जरूर जाएगी, राजा आए न आए, कुरुड़ में महापंचायत का फैसला

एक रोज पहले कर्णप्रयाग में नंदा देवी राजजात समिति ने इस वर्ष टाल दी थी 12 वर्षों में होने वाली महायात्रा

Rajkumar Dhiman, Dehradun: हिमालय महाकुंभ नंदा देवी बड़ीजात यात्रा अवश्य होगी। फिर चाहे राजा आए न आए, नंदा अवश्य ससुराल जाएगी। यह निर्णय नंदानगर विकासखंड (चमोली) में आयोजित महापंचायत में किया गया। महापंचायत में क्षेत्र के सभी प्रमुख जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, मंदिर समितियों, बुद्धिजीवियों, महिला मंगल दलों और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण उपस्थित रहे। ताकि आगामी नंदा देवी बड़ीजात यात्रा (12 वर्षों में होने वाली) को पारंपरिक, सुव्यवस्थित व श्रद्धापूर्ण तरीके से सम्पन्न कराने के मार्ग पर विचार-विमर्श किया जा सके।

बैठक में सभी ने एक स्वर में कहा कि नंदा देवी बड़ीजात केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, लोक आस्था और परंपरा का प्रतीक है, जिसे उसकी मूल भावना के अनुरूप ही सम्पन्न किया जाना चाहिए।

महापंचायत ने यह निर्णय भी लिया कि उन लोगों के निर्णय, जिनके द्वारा बड़ीजात यात्रा को न कराने का प्रस्ताव रखा गया था, उसे एनजीओ का व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए खारिज कर दिया गया। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि बसंत पंचमी के अवसर पर दीनपटा निकाला जाएगा, जिसकी शुरुआत सिद्धपीठ नंदा देवी मंदिर, कुरुड़ से होगी।

महापंचायत ने दिया साफ संदेश
बैठक में महापंचायत ने साफ कहा कि नंदा देवी बड़ीजात होके रहेगी। यात्रा की तैयारी और संचालन के लिए एक सम्पूर्ण कमेटी का गठन भी किया गया है, जिसमें अध्यक्ष हरेंद्र सिंह रावत, उपाध्यक्ष सुखबीर रौतेला, नरेश गौड़, सचिव अशोक गौड़, कोषाध्यक्ष प्रकाश गौड़ को नामित किया गया। इसके साथ ही संरक्षक मंडल में जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट और नंदानगर के ब्लॉक प्रमुख को जगह दी गई। नंदानगर, देवाल, थराली, नारायणबगड़, कर्णप्रयाग, जोशीमठ, दशोली से बड़ीजात में सम्मिलित होने वाली सभी देव डोलियों के अध्यक्ष को भी आयोजन की व्यवस्था में खास जगह दी गई।

🕉️ नंदा देवी बड़ीजात यात्रा का इतिहास, पौराणिक महत्व एवं सांस्कृतिक संदर्भ
📜 नंदा देवी राजजात यात्रा (जिसे स्थानीय रूप से बड़ीजात भी कहा जाता है) उत्तराखंड का एक विश्व-प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, जिसे लगभग हर 12 वर्षों में आयोजित किया जाता है।

📌 पौराणिक और सांस्कृतिक कथा
🔹 माँ नंदा देवी को उत्तराखंड में राजराजेश्वरी देवी के नाम से अत्यधिक पूज्य माना जाता है। वे भगवान शिव की पत्नी या उनकी मातृत्व भूमि की देवी मानी जाती हैं।
🔹 परंपरा के अनुसार, यह यात्रा देवी नंदा के मायके से ससुराल (कैलाश) तक जाने की संकेतात्मक यात्रा है। वहां से उनके वापस अपने मायके लौटने का उत्सव तीन सप्ताह तक चलता है।
🔹 यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर तक फैली होती है और कठिन हिमालयी पगडंडियों तथा घाटियों से होकर गुजरती है।
🔹 यात्रा का नेतृत्व विशेष चार-सींग वाला भेड़ (चौसिंघ्या खाडू) करता है, जिसे देवी का पवित्र वाहन माना जाता है।

🧿 सांस्कृतिक एकता और लोकधर्म
🔹 नंदा देवी राजजात यात्रा गढ़वाल और कुमाऊँ के लोगों के बीच सांस्कृतिक एकता तथा लोकमान्यताओं की गहरा प्रतीकात्मक यात्रा भी है।
🔹 इसमें भाग लेने वाले स्थानीय ग्राम समाज के छंतोली, डोलियां, परंपरागत नृत्य और लोकगीत उत्तराखंड की जीवंत लोक संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।

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