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भालू का ऐसा खौफ कि उजड़ गया पूरा गांव, आख़िरी परिवार भी छोड़ गया पैतृक घर

पहाड़ पर पहाड़ जैसा जीवन जीने जी रहे लोगों की टूटती जा रही हर आस

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड में सर्द मौसम के साथ भालुओं का आतंक इस हद तक बढ़ गया है कि अब यह सिर्फ हमलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों की जिंदगी, आजीविका और हिम्मत तक छीन रहा है। पहाड़ के गांवों में दहशत का आलम ऐसा है कि लोग सूरज ढलने से पहले अपने घरों में सिमटने को मजबूर हैं। शायद ही कोई जिला ऐसा बचा हो, जहां भालू के हमलों की खबरें न मिल रही हों।

पौड़ी जिले के पोखड़ा क्षेत्र की पणिया ग्राम सभा का तोक गांव बस्ताग इस भयावह सच की सबसे करुण तस्वीर बन चुका है। यहां भालू के आतंक ने एक परिवार को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव को उजाड़ दिया।

एक सप्ताह, छह मवेशी खत्म और उजड़ती हुई जिंदगी
बस्ताग गांव में पिछले पांच वर्षों से हरीश प्रसाद नौटियाल का परिवार ही अकेला ऐसा था, जो गांव को आबाद किए हुए था। खेती और पशुपालन ही उनके जीवन का सहारा था। दो दुधारू गाय, बैलों की एक जोड़ी और दो बकरियां—यही उनकी मेहनत की पूंजी थी। लेकिन बीते एक सप्ताह में भालू ने एक-एक कर उनके सभी मवेशियों को मार डाला।

भय यहीं नहीं रुका। भालू अब जंगल तक सीमित न रहकर घर के आंगन में डेरा जमाने लगा। हर रात डर के साए में गुजरने लगी। आखिरकार परिवार ने अपनी सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए पैतृक घर छोड़ने का कठोर फैसला किया।

घर छोड़ा, गांव छोड़ा… और बस्ताग हो गया वीरान
हरीश प्रसाद, उनकी पत्नी जसोदा देवी, बेटा संजय और तलाकशुदा बेटी शांति—चारों अब पड़ोस के गांव पणिया में एक ग्रामीण के घर शरण लिए हुए हैं। उनके जाने के साथ ही बस्ताग गांव पूरी तरह खाली हो गया। जहां कभी जीवन की हल्की-सी लौ जल रही थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा है।

नम आंखों से हरीश प्रसाद कहते हैं—“कभी सोचा नहीं था कि गांव छोड़ने की वजह भालू बनेगा। उसने हमारे मवेशी ही नहीं मारे, हमारी पूरी आर्थिकी छीन ली।” डर ऐसा कि आंगन भी सुरक्षित नहीं रहा जसोदा देवी बताती हैं कि जब वन्यजीव आंगन तक आने लगे, तब बच्चों और परिवार की जान की चिंता हर पल सताने लगी। अब उनके पास न मवेशी बचे हैं, न कोई कमाई का जरिया। वर्षों की मेहनत एक झटके में खत्म हो गई।

डेढ़ दशक में सिमटता गांव, अब पूरी तरह उजड़ गया
पणिया के ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी बताते हैं कि डेढ़ दशक पहले तक बस्ताग तोक में 18 परिवार रहते थे। सड़क और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में धीरे-धीरे लोग शहरों की ओर पलायन करते चले गए।

कोरोना काल में कुछ लोग गांव लौटे जरूर, लेकिन स्थायी रूप से बसने की उम्मीद फिर टूट गई।
पीड़ित परिवार ने कई बार वन विभाग से भालू के आतंक से निजात दिलाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नतीजा यह हुआ कि गांव की आख़िरी सांस भी थम गई।

आश्वासन है, लेकिन डर अब भी कायम
पोखड़ा रेंज के रेंज अधिकारी नक्षत्र शाह का कहना है कि परिवार को जल्द सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी, ताकि वे गांव लौट सकें। लेकिन, सवाल यह है कि जब डर, नुकसान और टूट चुकी हिम्मत इतनी गहरी हो—तो क्या सिर्फ आश्वासन से उजड़ा गांव फिर बस पाएगा?

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