
Amit Bhatt, Dehradun: हजारों साल पुराने इतिहास से पर्दा उठाने की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक बड़े अभियान की शुरुआत की है। देहरादून ज़िले के बाड़वाला स्थित जगतग्राम में ASI टीम ने अश्वमेध यज्ञ की चौथी वेदिका की तलाश में नई खोदाई शुरू कर दी है। यह वही स्थल है, जहां 1952–54 के बीच तीन वेदिकाएँ खोजी गई थीं, लेकिन चौथी वेदिका का पता न लगाने के कारण शोध अधूरा रह गया था।
🔶 70 साल बाद इतिहास को फिर जाँचने उतरी ASI
ASI उत्तराखंड सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद मोहन चंद्र जोशी के मुताबिक, तीसरी शताब्दी ईस्वी के दौरान जगतग्राम में अश्वमेध यज्ञ होने के प्रमाण पहले ही सामने आ चुके हैं।
पुराने उत्खनन में मिली वेदिकाएँ गरुड़ आकार की ईंटों से निर्मित थीं, जिन पर ब्राह्मी लिपि, संस्कृत और चार अश्वमेध यज्ञों के उल्लेख मिले थे।
अब टीम ने चौथी वेदिका की खोज के लिए चार नए ट्रेंच खोले हैं। उत्खनन में अब तक 4.5 मीटर की गहराई तक खुदाई कर ली गई है, और अनुमान है कि 2.5 मीटर और नीचे जाकर वेदिका के अवशेष मिल सकते हैं।
🔶 किसने कराया था अश्वमेध यज्ञ?
पुरातत्व रिकॉर्ड बताते हैं कि तीसरी शताब्दी में इस क्षेत्र पर कुलिंद वंश का शासन था, जिसके राजा शील वर्मन ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित कराया था। उनका साम्राज्य हरिपुर, सरसावा, विकासनगर से लेकर वर्तमान हिमाचल सीमा तक फैला हुआ बताया जाता है।
🔶 क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती थी यह यज्ञ परंपरा?
अश्वमेध यज्ञ भारतीय इतिहास में साम्राज्य की सर्वोच्चता का प्रमाण था।
एक विशिष्ट, अलंकृत अश्व को एक वर्ष तक पड़ोसी राज्यों की सीमाओं में स्वतंत्र छोड़ा जाता था।
यदि कोई राज्य घोड़े को न रोके—तो राजा की प्रभुता स्वीकार मानी जाती थी।
यदि विरोध करता—तो युद्ध होता और पराजय के बाद वह राज्य अधीनता स्वीकार करता।
घोड़े की वापसी पर विशिष्ट वैदिक कर्मों, दान और अनुष्ठानों के साथ राजा को चक्रवर्ती सम्राट माना जाता था।
🔶 मिट्टी और बर्तनों की TL और OSL डेटिंग
उत्खनन में ईंटें, मृदभांड, पाट-शेल्स व अन्य प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं।
ASI टीम अब इनकी थर्मोल्यूमिनेसेंस (TL) और ऑप्टिकली स्टीम्यूलेटेड ल्यूमिनेसेंस (OSL) डेटिंग कराएगी, जिससे
🟡 स्थल की सटीक उम्र
🟡 यज्ञ के कालखंड
🟡 उस समय की सभ्यता और संस्कृति
का वैज्ञानिक निर्धारण हो सकेगा।
🔶 अगले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण
जगतग्राम का यह उत्खनन अब इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की नजर में फिर केंद्रबिंदु बन गया है।
चौथी वेदिका का मिलना भारतीय इतिहास में अश्वमेध यज्ञ पर उपलब्ध प्रमाणों को नया आयाम देगा।



