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घाटे में डूबा दून का बैंक, मुनाफा दिखाकर वर्षों तक गुमराह करता रहा प्रबंधन और अब 124 करोड़ फंसे

9 हजार खाताधारक संकट में, आरबीआई भी 12 साल बाद जागा

Rajkumar Dhiman, Dehradun: अर्बन कोओपरेटिव बैंक देहरादून की कहानी धीरे-धीरे एक बड़े वित्तीय संकट में तब्दील होती चली गई। बैंक वर्षों से घाटे की स्थिति में था, लेकिन प्रबंधन लगातार कागजी रिकॉर्ड में मुनाफा दिखाकर वास्तविक हालात छुपाता रहा। ऋण वितरण में बड़े स्तर पर हुई अनियमितताओं के कारण बैंक आर्थिक दलदल में फंसता चला गया। जब हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गए और संकट सिर के ऊपर पहुंच गया, तब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंक पर छह माह का प्रतिबंध लगा दिया और साथ ही खाताधारकों की राशि निकासी पर रोक भी लगा दी।

इस फैसले के बाद बैंक से जुड़े करीब 9 हजार खाताधारकों के सामने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी की सुरक्षा को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। बैंक में कुल 124 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि फंसी हुई है, जिसकी वापसी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। बैंक की यह हालत अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे करीब एक दशक की लापरवाही और गलत नीतियों की लंबी कहानी छिपी है।

2013-14 में पड़ चुकी थी संकट की नींव
आरबीआई की कार्रवाई भले ही अब हुई हो, लेकिन बैंक के पतन की शुरुआत वर्ष 2013-14 में ही हो चुकी थी। उस समय बैंक प्रबंधन ने मशीनरी खरीद और अन्य मदों के नाम पर चुनिंदा लोगों को बड़े पैमाने पर ऋण बांट दिए। ये ऋण समय के साथ फंसते चले गए, लेकिन न तो वसूली की दिशा में कोई ठोस प्रयास किया गया और न ही जोखिम प्रबंधन के नियमों का पालन हुआ।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि बैंक घाटे में चला गया, फिर भी खातों में लाभ दिखाया जाता रहा। इस तरह बैंक प्रबंधन लगातार खाताधारकों और नियामक संस्थाओं की आंखों में धूल झोंकता रहा।

38 करोड़ का एनपीए, 124 करोड़ की जमा पर संकट
जानकारी के अनुसार बैंक के फंसे ऋण (NPA) की राशि लगभग 38 करोड़ रुपये है। वहीं, दूसरी ओर करीब 9 हजार खाताधारकों की 124 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि अब संकट में है। यह स्थिति बैंक को लगभग दिवालियेपन की कगार पर ले आई है।

प्रोविजनिंग न होने से नहीं खुली समय रहते सच्चाई
नियमों के तहत प्रत्येक बैंक को दिए गए ऋण और फंसे ऋणों के आधार पर तय प्रतिशत में प्रोविजनिंग (ऋण हानि प्रावधान) करनी होती है। लेकिन अर्बन कोओपरेटिव बैंक के प्रबंधन ने इस अनिवार्य प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं अपनाया और फंसे कर्ज को छिपाता रहा। यदि समय-समय पर नियमों के अनुसार प्रोविजनिंग की जाती, तो बैंक की वास्तविक आर्थिक स्थिति पहले ही सामने आ जाती और हालात इतने भयावह नहीं होते।

आरबीआई की निगरानी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में खाताधारकों ने आरबीआई की निगरानी भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। चार करोड़ रुपये की जमा राशि वाले खाताधारक अचिन गुप्ता का कहना है कि बैंक का हर वर्ष ऑडिट हुआ, लेकिन इसके बावजूद गंभीर अनियमितताएं पकड़ में नहीं आईं। उनका कहना है कि यदि समय रहते गड़बड़ियों की पहचान कर ली जाती, तो आज हजारों खाताधारकों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता। प्रभावित खाताधारकों में नगर निगम देहरादून, निगम ठेकेदार, लोक निर्माण विभाग के ठेकेदार और कई कारोबारी शामिल हैं।

खाताधारकों का आक्रोश, बैंक प्रबंधन के खिलाफ तहरीर
आरबीआई के प्रतिबंध के बाद खाताधारकों की चिंता खुलकर सामने आ गई। मंगलवार को बड़ी संख्या में खाताधारक बैंक पहुंचे और प्रबंधन से जवाब मांगने की कोशिश की, लेकिन वहां न चेयरमैन मौजूद थे और न ही सचिव। इससे नाराज खाताधारकों ने बैंक परिसर में प्रदर्शन किया और बैंक प्रबंधन व आरबीआई के खिलाफ नारेबाजी की।

सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। इसके बाद खाताधारकों ने संयुक्त रूप से शहर कोतवाली में बैंक प्रबंधन के खिलाफ तहरीर दी।
तहरीर में आरोप लगाया गया कि प्रबंधन ने जानबूझकर खाताधारकों को भ्रमित किया और अब संकट के समय कोई जवाबदेही नहीं निभा रहा है।

तहरीर देने वालों में रजत अग्रवाल, नरेंद्र, अचिन गुप्ता, जितेंद्र कोटनाला, महेंद्र रावत, आर्यन गुप्ता, मुकेश शर्मा, नरेश थापा, सार्थक, नमन अग्रवाल सहित कई खाताधारक शामिल हैं।

नकदी संकट से ठप हुआ कारोबार
बैंक से जुड़े कई खाताधारक कारोबारी और ठेकेदार हैं।
निकासी पर रोक लगने से उनके व्यापारिक कार्य पूरी तरह प्रभावित हो गए हैं। नकदी की कमी के कारण कई कारोबार ठप पड़ गए हैं और लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

एक ही परिवार के नियंत्रण का आरोप
खाताधारकों का आरोप है कि बैंक की बदहाली के पीछे प्रबंधन पर एक ही परिवार का लंबे समय तक नियंत्रण मुख्य कारण रहा। पहले बैंक के चेयरमैन रमेश ममगाईं रहे और बाद में उनके बेटे मयंक ममगाईं ने यह पद संभाला।
आरोप है कि इसी दौरान नियमों की अनदेखी कर ऋण वितरण किया गया, जिससे बैंक धीरे-धीरे अंदर से खोखला होता चला गया।

अयोग्य प्रबंधकों की नियुक्ति पर सवाल
खाताधारक अचिन गुप्ता का कहना है कि कुछ समय पहले बैंक प्रबंधन ने चंचल और साक्षी गर्ग को प्रबंधक पद की जिम्मेदारी दी, जबकि वे इस पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं रखती थीं। उन पर भी वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। इसके साथ ही बैंक के सचिव बीरबल की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।

नगर निगम के 10 करोड़ और बैंक कर्मचारी की जमा भी संकट में
सूत्रों के मुताबिक, अर्बन कोओपरेटिव बैंक में नगर निगम देहरादून के करीब 10 करोड़ रुपये जमा हैं। इसके अलावा बैंक की एक महिला कर्मचारी की भी करोड़ों रुपये की जमा राशि फंसी हुई है। अब सभी जमाकर्ता अपनी रकम की वापसी को लेकर गहरी चिंता और असमंजस में हैं।

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