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क्योंकि जब मां सड़क पर उतरती है, तो सिर्फ रास्ते नहीं बदलते…सिस्टम बदलने लगते हैं

अंधेरी सड़कों और थकान को चुनौती देकर LUCC घोटाले की पीड़ित महिलाओं की दिल्ली की अडिग पदयात्रा जारी

Rajkumar Dhiman, Dehradun: श्रीनगर की शांत वादियों से निकली कुछ थकी हुई, लेकिन अडिग क़दमों की आहट अब देश की राजधानी दिल्ली की ओर निरंतर बढ़ रही है। LUCC घोटाले में अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी गंवा चुकी एक दर्जन से अधिक महिलाएं आज सिर्फ सड़क पर नहीं चल रहीं हैं, वे अपने टूटे सपनों, बिखरे विश्वास और कुचले गए आत्मसम्मान को लेकर न्याय की तलाश में निकल पड़ी हैं।

यह यात्रा किसी संगठन का औपचारिक आंदोलन नहीं, बल्कि उन माताओं, बहनों और बेटियों की करुण पुकार है, जिनके घरों की रसोई से बचत के सिक्के, गहनों की आख़िरी चमक और बच्चों के भविष्य के सपने एक झटके में छिन गए।

उत्तराखंड के गढ़वाल के श्रीनगर से शुरू हुई यह पदयात्रा अब रात के अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही है। वे थके पांव, सूखी आंखें, लेकिन आंखों में जलता न्याय का दीपक।
पुलिस ने रोकने की कोशिश की। समझाया, डराया, रास्ता बंद किया। लेकिन जिन महिलाओं के पास खोने को कुछ नहीं बचा, उन्हें रोका नहीं जा सकता।

वे रुकी नहीं… क्योंकि उनका रुकना उनके बच्चों के भविष्य का रुक जाना होता। इस संघर्ष का नेतृत्व कर रहीं सरस्वती देवी की आवाज़ में सिर्फ आक्रोश नहीं, बल्कि पीड़ा की गहराई है। उत्तराखंड क्रांति दल की नेता सरस्वती देवी कहती हैं, “हम दिल्ली इसलिए जा रहे हैं ताकि सत्ता के गलियारों में हमारी चीख़ सुनी जाए।

हम हर हाल में राष्ट्रपति के सामने अपनी बात रखेंगे। हमें अपनी जमा पूंजी वापस चाहिए, दोषियों को सज़ा चाहिए, और सम्मान के साथ जीने का अधिकार चाहिए।” यह सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं है, यह इज़्ज़त की लड़ाई है, यह भरोसे की लड़ाई है, यह न्याय की लड़ाई है।

और है भी ऐसा ही। क्योंकि, रात का अंधेरा, ठंडी हवा, थकान से कांपते पैर, लेकिन इन सब पर भारी है वह संकल्प, जो कहता है, “जब तक पैसा वापस नहीं मिलेगा,
जब तक दोषी सलाखों के पीछे नहीं जाएंगे, जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह यात्रा नहीं रुकेगी।”

सीधे तौर पर देखा जाए श्रीनगर से दिल्ली की ओर बढ़ती यह पदयात्रा अब एक आंदोलन बन चुकी है। एक ऐसा आंदोलन, जो सिस्टम से नहीं डरता, जो सत्ता से नहीं झुकता और जो अन्याय के आगे सिर नहीं झुकाता। यह महिलाएं इतिहास नहीं लिख रहीं, बल्कि वे इतिहास को जगाने निकली हैं।

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