घपलों में डूबे उत्तराखंड के आरटीओ, 67 हजार वाहन बिना फिटनेस दौड़ रहे, एक व्यक्ति के दो-दो लाइसेंस
361.86 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया, वैध वसूले में ढीले पड़े अफसरों के तेवर

Rajkumar Dhiman, Bharadisain: उत्तराखंड के परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेखापरीक्षा में सामने आया है कि विभागीय व्यवस्था में कई स्तरों पर बड़ी खामियां मौजूद हैं। रिपोर्ट में राज्य के संभागीय परिवहन कार्यालयों (आरटीओ) और सहायक संभागीय परिवहन कार्यालयों (एआरटीओ) के कामकाज की विस्तृत समीक्षा के दौरान वाहन पंजीकरण, ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने, परमिट प्रबंधन, कर वसूली, सड़क सुरक्षा और प्रवर्तन व्यवस्था में व्यापक अनियमितताएं उजागर हुई हैं। कैग ने साफ संकेत दिया है कि नियामक तंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावी निगरानी की कमी के कारण सरकार को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है और सड़क सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है।
बिना फिटनेस प्रमाण पत्र के दौड़ रहे हजारों वाहन
कैग रिपोर्ट का सबसे गंभीर खुलासा यह है कि राज्य में 67,603 वाहन बिना वैध फिटनेस प्रमाण पत्र के सक्रिय स्थिति में पाए गए। इनमें 561 एंबुलेंस, 34 शिक्षण संस्थानों की बसें और 67,008 अन्य परिवहन वाहन शामिल हैं। फिटनेस प्रमाण पत्र किसी भी वाहन की तकनीकी स्थिति और सड़क पर सुरक्षित संचालन का प्रमाण होता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में बिना फिटनेस के वाहनों का संचालन सड़क सुरक्षा के लिहाज से बेहद चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है।
पंजीकरण और नवीनीकरण व्यवस्था में बड़ी लापरवाही
लेखापरीक्षा के दौरान यह भी सामने आया कि वाहन पंजीकरण प्रणाली में गंभीर ढिलाई बरती जा रही है। राज्य में 43,821 गैर-परिवहन वाहनों के पंजीकरण का नवीनीकरण लंबित पाया गया, जबकि 2,362 वाहनों के अस्थायी पंजीकरण को छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थायी पंजीकरण में परिवर्तित नहीं किया गया। यह स्थिति पंजीकरण प्रणाली की निगरानी और अनुपालन व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है।
वाहनों के गलत वर्गीकरण से सरकार को राजस्व झटका
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 361 निर्माण उपकरण वाहनों को गलत तरीके से “अन्य” श्रेणी में दर्ज कर दिया गया। जबकि इन्हें हल्के, मध्यम या भारी मोटर वाहन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए था। इस गलत वर्गीकरण के कारण पंजीकरण शुल्क की कम वसूली हुई और सरकार को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा।
हजारों परिवहन वाहनों के परमिट खत्म, फिर भी सड़क पर
कैग ने पाया कि राज्य में 6,343 परिवहन वाहनों के परमिट समाप्त हो चुके थे, लेकिन उनका नवीनीकरण नहीं कराया गया। इसके बावजूद ये वाहन सक्रिय स्थिति में दर्ज थे। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि इस आंकड़े में वे वाहन शामिल नहीं हैं जिन्हें एनओसी जारी की गई, स्क्रैप घोषित किया गया या चोरी अथवा रद्द पंजीकरण की श्रेणी में रखा गया। यह स्थिति परमिट प्रबंधन प्रणाली की कमजोरियों को दर्शाती है।
डेटा प्रबंधन में चौंकाने वाली गड़बड़ियां
लेखापरीक्षा में वाहन डेटा प्रबंधन प्रणाली की भी गंभीर खामियां सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार 20 स्कूल बसें संबंधित संस्थानों के बजाय निजी व्यक्तियों के नाम पर पंजीकृत थीं। इसके अलावा 1,110 वाहन ऐसे पाए गए जो एक से अधिक आरटीओ या एआरटीओ कार्यालयों में पंजीकृत थे। यह स्थिति डेटा सत्यापन और रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली में गंभीर त्रुटियों की ओर संकेत करती है।
राजस्व लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहा विभाग
परिवहन विभाग वर्ष 2019 से 2024 के बीच अधिकांश वर्षों में निर्धारित राजस्व लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। केवल वर्ष 2022-23 में ही विभाग अपने लक्ष्य तक पहुंच पाया। यह स्थिति कर वसूली और प्रवर्तन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
361.86 करोड़ का वाहन कर बकाया
कैग रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 65,931 वाहनों पर कुल ₹361.86 करोड़ का वाहन कर बकाया था। इनमें से 18,892 वाहनों से संबंधित ₹176.81 करोड़ की राशि एक वर्ष से अधिक समय से लंबित थी। इतनी बड़ी राशि का लंबे समय तक बकाया रहना राजस्व प्रबंधन की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।
209 करोड़ ग्रीन सेस वसूला, 10 करोड़ ही जारी
वायु प्रदूषण नियंत्रण और शहरी परिवहन सुधार के लिए लागू ग्रीन सेस के उपयोग में भी लापरवाही सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2024 तक ग्रीन सेस के रूप में 209.20 करोड़ रुपये एकत्र किए गए, जबकि सरकार ने इस मद में केवल 10 करोड़ रुपये ही जारी किए। इसका मतलब है कि ग्रीन सेस की बड़ी राशि उपयोग में ही नहीं लाई गई।
ग्रीन सेस दर अपडेट करने में देरी
वाहन सॉफ्टवेयर प्रणाली में ग्रीन सेस की संशोधित दरों को अपडेट करने में 26 दिनों की देरी हुई। इसके कारण 2,960 वाहनों से ग्रीन सेस कम वसूला गया। कैग ने इसे आईटी सिस्टम प्रबंधन में लापरवाही का उदाहरण बताया है।
दुर्घटना राहत कोष में भी कम जमा
वर्ष 2019 से 2024 के दौरान वाहन कर के रूप में सरकार को 3,819 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। नियमों के अनुसार इसका दो प्रतिशत यानी 76.38 करोड़ रुपये दुर्घटना राहत कोष में जमा होना चाहिए था, लेकिन केवल 30.02 करोड़ रुपये ही जमा किए गए। इस प्रकार 46.36 करोड़ रुपये कम जमा किए गए।
सड़क सुरक्षा कोष का भी सीमित उपयोग
मार्च 2024 तक सड़क सुरक्षा कोष में 95.75 करोड़ रुपये जमा हुए, लेकिन विभिन्न विभागों को केवल 39.75 करोड़ रुपये ही जारी किए गए। इससे संकेत मिलता है कि सड़क सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई।
एक व्यक्ति के पास दो-दो ड्राइविंग लाइसेंस
सारथी पोर्टल के डेटा विश्लेषण में पाया गया कि 144 व्यक्तियों को कुल 288 ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए। यानी एक ही व्यक्ति के पास एक से अधिक लाइसेंस थे। कुछ मामलों में दोनों लाइसेंस उत्तराखंड से जारी हुए, जबकि कुछ मामलों में एक लाइसेंस राज्य से और दूसरा किसी अन्य राज्य से जारी किया गया।
ड्राइविंग लाइसेंस प्रारूप में भी खामियां
परिवहन विभाग द्वारा जारी ड्राइविंग लाइसेंस का प्रारूप केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। लाइसेंस में अंगदान की सहमति, दिव्यांग वाहन की जानकारी, पर्वतीय वैधता और आपातकालीन संपर्क नंबर जैसी महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए स्थान नहीं था।
पर्वतीय लाइसेंस प्रक्रिया में गंभीर खामी
पर्वतीय क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन संचालन के लिए आवश्यक पर्वतीय पृष्ठांकन प्रक्रिया में भी खामी सामने आई। लेखापरीक्षा में पाया गया कि बाहरी राज्यों के चालक केवल ऑनलाइन आवेदन कर शुल्क जमा कर रहे थे और बिना किसी दक्षता परीक्षण के उन्हें पर्वतीय पृष्ठांकन जारी किया जा रहा था। इससे यह पूरी प्रक्रिया केवल राजस्व अर्जन का माध्यम बनती दिखाई दी।
एएनपीआर कैमरों का सीमित उपयोग
राज्य में मई 2023 में लगाए गए ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (एएनपीआर) कैमरों का भी अपेक्षित उपयोग नहीं हो पाया। रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2024 तक 32,19,518 वाहनों की जांच हुई और 4,19,052 उल्लंघन दर्ज किए गए, लेकिन इनमें से केवल 16,052 मामलों यानी मात्र 3.8 प्रतिशत को ही प्रवर्तन कार्रवाई के लिए भेजा गया।
अधिकतर चालान मामूली उल्लंघनों के
जारी किए गए चालानों में 87.7 प्रतिशत चालान हेलमेट न पहनने और ट्रिपल राइडिंग जैसे मामलों के लिए थे। अन्य गंभीर यातायात उल्लंघनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।
1.65 लाख चालान अदालत तक नहीं पहुंचे
कैग रिपोर्ट के अनुसार 2019 से 2024 के बीच 58.02 करोड़ रुपये के 1,65,861 चालान अदालत को भेजे ही नहीं गए और लंबे समय तक लंबित पड़े रहे। यह प्रवर्तन व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।
जब्त वाहनों की नीलामी में भी देरी
प्रवर्तन कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए कई वाहन तीन वर्ष से अधिक समय तक खुले में पड़े रहे और उनकी समय पर नीलामी नहीं की गई। इससे संपत्ति प्रबंधन और वित्तीय नियंत्रण प्रणाली की कमजोरी उजागर हुई।
नशे में ड्राइविंग जांच उपकरण भी बेकार पड़े
जुलाई 2018 में खरीदे गए 40 एल्कोमीटर का भी समय पर उपयोग नहीं किया गया। इनमें से 22 उपकरण दिसंबर 2018 में वितरित किए गए, जबकि शेष 18 उपकरण पांच साल से अधिक देरी के बाद जारी किए गए।
प्रदूषण जांच केंद्रों का निरीक्षण नहीं
वर्ष 2019 से 2024 के दौरान चयनित इकाइयों में प्रदूषण जांच केंद्रों का कोई निरीक्षण नहीं किया गया। वाहन डेटा के विश्लेषण में 15 ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें वाहन की पंजीकरण तिथि, खरीद तिथि से पहले दर्ज थी। यह आईटी सिस्टम की सत्यापन प्रक्रिया में गंभीर खामी को दर्शाता है।
सुधार के लिए कैग की अहम सिफारिशें
कैग ने व्यवस्था में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वाहन की फिटनेस समाप्त होने पर वाहन मालिकों को एसएमएस अलर्ट भेजे जाएं, परमिट समाप्त होने पर भी स्वचालित सूचना प्रणाली विकसित की जाए, ग्रीन सेस के उपयोग के लिए वार्षिक कार्ययोजना बनाई जाए, आईटी सिस्टम और डेटा सत्यापन को मजबूत किया जाए तथा सड़क सुरक्षा और प्रवर्तन तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जाए।



