बदरीनाथ धाम चढ़ावा प्रकरण में प्रमोद नौटियाल को हाईकोर्ट से जमानत, जांच में देरी पर उठे सवाल
थाली भेंट की गणना के दौरान धनराशि और धार्मिक सामग्री ले जाने के आरोप में 12 जुलाई को हुई थी गिरफ्तारी

Round The Watch News: बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई जाने वाली थाली भेंट की गणना में कथित हेराफेरी के बहुचर्चित मामले में आरोपित प्रमोद नौटियाल को उत्तराखंड हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने 06 नवंबर को उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने मामले की विवेचना पूरी होने, आरोपपत्र दाखिल किए जाने, कथित बरामदगी की परिस्थितियों और न्यायिक हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए राहत दी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय वह मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रही है।
दो जुलाई को गणना के दौरान सामने आया था मामला
बदरीनाथ धाम में 02 जुलाई 2026 को श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई थाली भेंट की नकदी और अन्य सामग्री की गणना के दौरान कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया था। उस समय बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष के वैयक्तिक सहायक के रूप में कार्यरत प्रमोद नौटियाल पर आरोप लगा कि उन्होंने गणना स्थल से नकदी और अन्य भेंट सामग्री को अपने कब्जे में लिया।
प्रारंभिक विभागीय जांच में आरोप लगाया गया कि दो जुलाई को सुबह करीब नौ से साढ़े नौ बजे के बीच थाली भेंट की गणना के दौरान अनियमितता हुई। इस प्रकरण के सामने आने के बाद मंदिर समिति ने जांच शुरू कराई। तीन जुलाई को भैरव सेना की ओर से भी मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी को लिखित शिकायत दी गई थी। इसके बाद चार सदस्यीय विभागीय जांच समिति गठित की गई।
जांच के दौरान गणना कक्ष की सीसीटीवी फुटेज देखी गई। जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, फुटेज में प्रमोद नौटियाल कथित तौर पर मोबाइल फोन के नीचे नोटों की गड्डी छिपाकर गणना कक्ष से बाहर जाते दिखाई दिए। पुलिस की जांच में यह भी आरोप सामने आया कि उन्होंने अलग-अलग समय पर 500 रुपये के नोट, सोने-चांदी के सिक्कों के पैकेट, शालिग्राम शिला और केसर का पैकेट अपने कब्जे में लिया था।
विभागीय जांच में पांच दिनों के भीतर आठ बार चढ़ावे और दान सामग्री में हेराफेरी किए जाने का आरोप भी सामने आया था। साथ ही कुछ अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी। हालांकि, इन आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होना है। Jagran +1
निलंबन से गिरफ्तारी तक ऐसे बढ़ा मामला
प्रकरण सामने आने के बाद मंदिर समिति ने प्रमोद नौटियाल को गणना और प्रोटोकाल संबंधी जिम्मेदारियों से हटा दिया। छह जुलाई को उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसी दौरान शासन ने मंडलायुक्त आनंद स्वरूप की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति भी गठित की।
आठ जुलाई को बीकेटीसी के प्रभारी मंदिर अधिकारी युद्धवीर पुष्पवान की लिखित शिकायत पर बदरीनाथ कोतवाली में एफआइआर संख्या 06/2026 दर्ज की गई। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 306 और 316(5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए चमोली पुलिस ने विशेष जांच दल (एसआइटी) गठित किया। एसआइटी ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए तथा सीसीटीवी फुटेज की जांच की।
पुलिस की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, 12 जुलाई की रात करीब 10 बजे प्रमोद नौटियाल को देहरादून स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
इस प्रकरण में सीसीटीवी रिकॉर्ड को लेकर भी सवाल उठे थे। मीडिया रिपोर्टों में सामने आया था कि जांच के दौरान लगभग डेढ़ महीने का रिकॉर्ड ही उपलब्ध था, जबकि उससे पहले की करीब 32 दिनों की फुटेज उपलब्ध नहीं थी। इस कारण यह सवाल भी उठा कि मंदिर में चढ़ावे की गणना से संबंधित पुराने रिकॉर्ड किस परिस्थिति में उपलब्ध नहीं हो पाए।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने क्या दलीलें दीं?
प्रमोद नौटियाल की ओर से अधिवक्ता संदीप तिवारी ने हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी। छह नवंबर को न्यायमूर्ति आलोक महरा की अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई महत्वपूर्ण दलीलें रखीं।
बचाव पक्ष का कहना था कि प्रमोद नौटियाल को प्रारंभिक जांच के आधार पर गलत तरीके से फंसाया गया है। जिस कथित घटना को लेकर मुकदमा दर्ज हुआ, उसमें जांच के दौरान उनके खिलाफ दिखाई गई बरामदगी की परिस्थितियां भी संदेह पैदा करती हैं।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि प्रमोद नौटियाल को 12 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था, जबकि उनके निशानदेही पर पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी 28 जुलाई को दिखाई गई। यानी गिरफ्तारी के 16 दिन से अधिक समय बाद यह बरामदगी हुई।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि पांच हजार रुपये की बरामदगी बदरीनाथ मंदिर परिसर की एक धर्मशाला के कमरे से दिखाई गई है। यह कमरा सार्वजनिक रूप से श्रद्धालुओं और अन्य लोगों की पहुंच में था। ऐसे में बरामदगी को इसी तथ्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
इसके अलावा, गिरफ्तारी के समय प्रमोद नौटियाल के घर से शालिग्राम मिलने का उल्लेख करते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि इन वस्तुओं के अलावा उनके घर या कब्जे से कोई दूसरी आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वह देहरादून के स्थायी निवासी हैं, समाज में उनकी जड़ें मजबूत हैं और उनके फरार होने की आशंका नहीं है। विवेचना पूरी हो चुकी है तथा पुलिस आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। ऐसे में अब उन्हें जेल में रखने की आवश्यकता नहीं है। मुकदमे का ट्रायल पूरा होने में भी लंबा समय लग सकता है।
सरकार ने किया जमानत का विरोध, लेकिन इन तथ्यों पर नहीं जताया विवाद
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। हालांकि, राज्य की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी गिरफ्तारी के काफी समय बाद दिखाई गई है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि मामले की विवेचना पूरी हो चुकी है तथा आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।
अदालत ने विशेष रूप से पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी की परिस्थितियों पर ध्यान दिया। यह बरामदगी धर्मशाला के उस कमरे से दिखाई गई थी, जिसके सार्वजनिक रूप से सुलभ होने की दलील बचाव पक्ष ने दी थी। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि प्रमोद नौटियाल की गिरफ्तारी 12 जुलाई को हुई थी, जबकि कथित बरामदगी 28 जुलाई को की गई।
इन तथ्यों के साथ आरोपों की प्रकृति, मुकदमे की मौजूदा स्थिति और न्यायिक हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि प्रमोद नौटियाल जमानत पाने का मामला बनाते हैं। इसके बाद अदालत ने उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने प्रमोद नौटियाल को निजी मुचलके और समान राशि के दो विश्वसनीय जमानतदार प्रस्तुत करने पर संबंधित न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार रिहा करने का आदेश दिया है।
जमानत के बाद पूरे प्रकरण की समीक्षा: किन सवालों के जवाब अभी बाकी?
प्रमोद नौटियाल को जमानत मिलने के बाद बदरीनाथ धाम के चढ़ावा प्रकरण में कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर कई महत्वपूर्ण सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। हाईकोर्ट के आदेश को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि अदालत ने किन तथ्यों को जमानत का आधार बनाया और किन पहलुओं पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है।
जमानत का आधार पांच हजार रुपये की बरामदगी की परिस्थितियां बनीं
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी है। गिरफ्तारी 12 जुलाई को हुई और बरामदगी 28 जुलाई को दिखाई गई। यानी दोनों के बीच 16 दिन से अधिक का अंतर था। इसके अलावा बरामदगी धर्मशाला के ऐसे कमरे से दिखाई गई, जहां आम लोगों और श्रद्धालुओं की पहुंच होने की दलील दी गई। अदालत ने इन परिस्थितियों को जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना। सीसीटीवी फुटेज और पांच हजार रुपये की बरामदगी दो अलग-अलग साक्ष्य हैं।
इस प्रकरण में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया था। फुटेज के आधार पर नकदी और अन्य सामग्री ले जाने के आरोप लगाए गए। वहीं, जमानत आदेश में अदालत ने पांच हजार रुपये की बरामदगी की परिस्थितियों पर विशेष रूप से चर्चा की है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने सीसीटीवी फुटेज को खारिज कर दिया है। आदेश में फुटेज की प्रामाणिकता अथवा उसमें दिखाई देने वाली गतिविधियों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
चार्जशीट दाखिल होना जांच पूरी होने का संकेत है, आरोप साबित होने का नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि पुलिस विवेचना पूरी कर आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। ऐसे में अब आरोपी को जेल में रखने की आवश्यकता पर विचार करते हुए अदालत ने जमानत दी। लेकिन चार्जशीट दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि उसमें लगाए गए सभी आरोप न्यायालय में प्रमाणित हो गए हैं। इसका फैसला ट्रायल के दौरान होगा।
अन्य कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका का सवाल अभी महत्वपूर्ण
विभागीय जांच की शुरुआती रिपोर्ट में पांच दिनों के दौरान आठ बार कथित हेराफेरी की बात सामने आई थी। कुछ अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध बताई गई थी। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस ने अपनी अंतिम विवेचना में इन पहलुओं को किस तरह शामिल किया है। क्या इस प्रकरण में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका प्रमाणित हुई? क्या किसी को आरोपी बनाया गया? इन सवालों का जवाब आरोपपत्र और आगे की न्यायिक कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।
सीसीटीवी के पुराने रिकॉर्ड का मामला भी जांच के दायरे में
जांच के दौरान उपलब्ध सीसीटीवी रिकॉर्ड की अवधि और उससे पहले की फुटेज उपलब्ध नहीं होने का मुद्दा सामने आया था। यदि कुछ दिनों की फुटेज उपलब्ध नहीं थी तो यह भी महत्वपूर्ण है कि उसका कारण क्या था और रिकॉर्ड के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी। यह पहलू केवल एक कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं, बल्कि मंदिर की वित्तीय निगरानी व्यवस्था से भी जुड़ा है।
मंदिर की दान व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही जरूरी
इस घटना के बाद मंदिर समिति ने गणना स्थल पर बिना जेब वाली ड्रेस अनिवार्य करने और सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम उठाए थे। लेकिन केवल कैमरे बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। नकदी और सोने-चांदी की गणना के दौरान एक से अधिक कर्मचारियों की मौजूदगी, प्रत्येक सामग्री का लिखित रिकॉर्ड, नियमित मिलान और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं।



