इलाके पर कब्जे को लेकर रातभर गूंजती रही बाघों की दहाड़, सुबह 20 मीटर की दूरी पर दोनों के मिले शव
कार्बेट टाइगर रिजर्व में क्षमता से अधिक बाघ होने के कारण अब आसपास के क्षेत्रों में भी इलाके पर कब्जे को लेकर तेज हो रहा टकराव

Amit Bhatt, Dehradun: हल्द्वानी वन प्रभाग के छकाता रेंज में सुबह उस समय सनसनी फैल गई, जब जंगल के भीतर दो वयस्क नर बाघ मृत मिले। दोनों बाघों के शव गुमाल गांव के पास जंगल में लगभग एक किलोमीटर अंदर और एक-दूसरे से सिर्फ 20 मीटर की दूरी पर पड़े मिले। इस दुर्लभ घटना ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों को भी हैरान कर दिया है।
रातभर सुनाई देती रही लड़ाई और दहाड़ की आवाज
गुमाल गांव के ग्रामीणों के मुताबिक शनिवार रात जंगल से लंबे समय तक बाघों की तेज दहाड़ और संघर्ष की आवाजें सुनाई देती रहीं। देर रात तक यह आवाजें आती रहीं, लेकिन अचानक सब कुछ शांत हो गया। रविवार सुबह जब कुछ ग्रामीण जंगल की ओर गए तो उन्होंने दो बाघों के शव पड़े देखे। इसके बाद तत्काल वन विभाग को सूचना दी गई।
वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, खून और संघर्ष के मिले निशान
सूचना मिलते ही वन क्षेत्राधिकारी (आरओ) मनीष कुमार, वरिष्ठ वन अधिकारी और पशु चिकित्सकों की टीम मौके पर पहुंची। जांच के दौरान घटनास्थल पर बड़ी मात्रा में खून, पंजों के गहरे निशान और घसीटे जाने के स्पष्ट प्रमाण मिले, जिससे यह संकेत मिला कि दोनों बाघों के बीच बेहद हिंसक संघर्ष हुआ था।
दोनों बाघों की उम्र अलग-अलग, गंभीर चोटों से हुई मौत की आशंका
वन विभाग की प्रारंभिक जांच के अनुसार एक नर बाघ की उम्र करीब 3 से 4 वर्ष और दूसरे की 4 से 5 वर्ष के बीच आंकी गई है। पोस्टमार्टम से पहले की जांच में पाया गया कि संघर्ष के दौरान एक बाघ की गर्दन की मुख्य नस बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी, जबकि दूसरे बाघ के बाएं पिछले पैर की जांघ की नस गंभीर रूप से कट गई थी। इसके अलावा एक बाघ की गर्दन और दूसरे की कमर पर गहरे घाव मिले हैं।
अवैध शिकार की आशंका नहीं
डॉक्टरों ने बताया कि दोनों बाघों के सभी अंग, पंजे और नाखून पूरी तरह सुरक्षित मिले हैं। शरीर के किसी हिस्से को काटने या निकालने के कोई संकेत नहीं मिले। ऐसे में प्रथमदृष्टया अवैध शिकार की संभावना नहीं मानी जा रही है।
वीडियोग्राफी के साथ हुआ पोस्टमार्टम, डीएनए सैंपल जांच के लिए भेजे
घटना की गंभीरता को देखते हुए हल्द्वानी वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) कुंदन कुमार स्वयं मौके पर पहुंचे। वन विभाग की टीम ने घटनास्थल से आवश्यक साक्ष्य और जैविक नमूने एकत्र किए।
दोनों बाघों का पोस्टमार्टम पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी के साथ कराया गया। साथ ही डीएनए सैंपल और अन्य नमूनों को फॉरेंसिक जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया गया है, ताकि मौत के वास्तविक कारणों की वैज्ञानिक पुष्टि हो सके।
बाघों की बढ़ती संख्या से बढ़ रहा टेरिटरी का संघर्ष
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है। अब उनकी मौजूदगी केवल तराई क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि नौकुचियाताल, सातताल, भीमताल, ओखलकांडा और धारी जैसे पहाड़ी इलाकों के जंगलों में भी उनकी सक्रियता बढ़ी है।
विशेषज्ञों के अनुसार सीमित क्षेत्र में अधिक बाघ होने के कारण अपने-अपने इलाके (टेरिटरी) पर कब्जा बनाए रखने को लेकर नर बाघों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। कई बार ऐसे संघर्ष इतने हिंसक हो जाते हैं कि उनमें एक या दोनों बाघों की मौत तक हो जाती है।
डीएफओ ने क्या कहा
डीएफओ कुंदन कुमार ने बताया कि प्रारंभिक जांच में दोनों नर बाघों की मौत आपसी क्षेत्रीय संघर्ष (Territorial Fight) का परिणाम प्रतीत हो रही है। हालांकि मौत के वास्तविक कारणों की अंतिम पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही की जाएगी। फिलहाल सभी पहलुओं से जांच जारी है।



