सीबीआई जांच की तरफ बढ़ रहा दौलतराम ट्रस्ट से जुड़ा 700 बीघा का भूमि घोटाला
हाई कोर्ट से सीबीआई ने मांगा 02 हफ्ते का समय, 20 अगस्त की सुनवाई होगी अहम, हो सकता है बड़ा निर्णय

Amit Bhatt, Dehradun: देहरादून के बहुचर्चित दौलत राम ट्रस्ट की माजरा स्थित करीब 700 बीघा भूमि से जुड़े मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान नया घटनाक्रम सामने आया है। न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने मामले को इससे जुड़े अन्य प्रकरणों के साथ 20 अगस्त 2026 के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।
हाईकोर्ट के ताजा आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता रीता सूरी एवं अन्य की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा गया। राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता अक्षय लटवाल तथा सीबीआई की ओर से अधिवक्ता सौरव अधिकारी उपस्थित हुए। सीबीआई के अधिवक्ता ने प्रतिशपथ पत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिस पर अदालत ने सहमति जताते हुए अगली सुनवाई 20 अगस्त तय कर दी। यह मामला याची रीता सूरी के वाद WPCRL/957/2025 के साथ WPMS/2086/2012 और WPCRL/937/2013 से भी संबद्ध है।
वर्षों पुराना भूमि विवाद फिर सुर्खियों में
याचिका और वादिनी रीता सूरी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, माजरा स्थित दौलत राम ट्रस्ट की लगभग 700 बीघा भूमि से जुड़े कथित अनियमितताओं और अतिक्रमण का मुद्दा वर्षों से विभिन्न न्यायिक मंचों पर उठाया जाता रहा है। वादिनी का कहना है कि इस मामले को सबसे पहले उनके भाई एवं अधिवक्ता राजेश सूरी ने उजागर किया था। उनका आरोप है कि सरकारी एवं गैर-सरकारी संपत्तियों से जुड़े कथित बड़े घोटालों की शिकायतें किए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद विभिन्न याचिकाएं उत्तराखंड हाईकोर्ट में दायर की गईं।
हत्या के बाद बहन ने संभाली कानूनी लड़ाई
प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि 30 नवंबर 2014 को अधिवक्ता राजेश सूरी की कथित तौर पर जहर देकर हत्या कर दी गई। वादिनी रीता सूरी का कहना है कि भाई की मृत्यु के बाद उन्होंने न्यायालय से संबंधित याचिकाओं में स्वयं पैरवी करने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार किया गया। तब से वह विभिन्न न्यायालयों में मामले की पैरवी कर रही हैं और उनका आरोप है कि उन्हें लगातार दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।
2007 में दर्ज हुई थी एफआईआर
वादिनी के अनुसार, नगर निगम के अधिवक्ता रहते हुए राजेश सूरी ने माजरा भूमि प्रकरण को उठाया था। इसके बाद 29 दिसंबर 2007 को क्लेमेंटटाउन थाने में संबंधित आरोपितों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया। बाद में मामला हाईकोर्ट पहुंचा और वर्ष 2013 में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को मामले की जांच कराने तथा रिपोर्ट प्रस्तुत करने संबंधी निर्देश दिए गए।
स्वतंत्र एजेंसी से जांच की उठी मांग
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी कहा गया है कि ट्रस्ट की भूमि अलग-अलग समय पर विभिन्न व्यक्तियों को हस्तांतरित की गई, इसलिए पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से गहन जांच कराई जानी चाहिए। इसमें तत्कालीन नगर निगम अधिकारी विनोद प्रसाद रतूड़ी की वर्ष 2008 की जांच आख्या का भी हवाला दिया गया है, जिसमें स्वतंत्र जांच एजेंसी की आवश्यकता का उल्लेख होने का दावा किया गया है।
2020 में बनी थी एसआईटी
वादिनी के अनुसार, उत्तराखंड शासन ने 8 जून 2020 को तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अरुण मोहन जोशी के नेतृत्व में एसआईटी गठित की थी और तीन माह में जांच रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे। दावा किया गया है कि एसआईटी ने जांच पूरी कर रिपोर्ट शासन को सौंप दी, लेकिन उस पर अंतिम निर्णय लंबे समय तक लंबित रहा। इस दौरान सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से जानकारी मांगने पर भी यही बताया गया कि रिपोर्ट शासन के विचाराधीन है।
अब CBI जांच की मांग
वादिनी ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि चूंकि प्रकरण कथित रूप से कई राज्यों से जुड़ा है और इसकी प्रकृति गंभीर है, इसलिए इसकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, विशेष रूप से CBI को सौंपी जाए। उनका आरोप है कि राज्य स्तर पर जांच और संबंधित फाइलें वर्षों तक लंबित रहीं, इसलिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
अब इस बहुचर्चित भूमि प्रकरण में सभी की निगाहें 20 अगस्त 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। उस दिन सीबीआई की ओर से जवाब दाखिल किए जाने और मामले में आगे की न्यायिक दिशा स्पष्ट होने की संभावना है।
नोट: इस खबर में वादिनी की प्रेस विज्ञप्ति में लगाए गए आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया न्यायालयी कार्यवाही या उपलब्ध अभिलेखों में इस सामग्री के साथ शामिल नहीं है।



