बिल्डर पुनीत अग्रवाल को जिला बदर होने से रोकने वाला कमिश्नर का आदेश स्टे, हाई कोर्ट ने लगाई रोक
कमिश्नर गढ़वाल ने डीएम देहरादून के मई 2026 के आदेश को कर दिया था निरस्त, फिर लटकी तलवार

Rajkumar Dhiman, Dehradun: देहरादून की एटीएस कॉलोनी में गुंडागर्दी के मामले में बिल्डर पुनीत अग्रवाल को जिला बदर करने के डीएम के आदेश पर रोक लगाने के मामले में नया मोड़ आया है। डीएम देहरादून ने पुनीत को मई 2026 में 06 माह के लिए जिला बदर कर दिया था। इस आदेश को कमिश्नर गढ़वाल ने जुलाई 2026 में निरस्त कर दिया था। अब उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कमिश्नर के आदेश पर ही रोक लगा दी है। जिससे बिल्डर पर फिर कानूनी कार्रवाई की तलवार लटक गई है। यह बात और है कि पुलिस अब तक बिल्डर को जिला बदर करने में पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई थी।
मामले में हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश नियंत्रण गुंडा अधिनियम, 1970 की धारा छह में अपीलीय प्राधिकारी को मामले को जिला मजिस्ट्रेट के पास रिमांड करने की शक्ति नहीं दी गई है।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ ने तीन सितंबर 2026 को हेम शिखा की याचिका पर यह आदेश दिया। अदालत ने फिलहाल 18 जुलाई 2026 को गढ़वाल मंडल के कमिश्नर, कैंप देहरादून की ओर से अपील संख्या 03/2026 में पारित आदेश के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
जिला बदर के आदेश से शुरू हुई खींचतान
मामला उत्तराखंड में लागू गुंडा एक्ट के तहत शुरू हुई कार्रवाई से जुड़ा है। इस प्रकरण में बिल्डर पुनीत अग्रवाल के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई को लेकर जिला मजिस्ट्रेट के स्तर पर कार्रवाई की गई थी। इसके बाद मामले ने अपीलीय स्तर पर प्रवेश किया।
कमिश्नर गढ़वाल की अदालत में अपील संख्या 03/2026 दाखिल हुई। 18 जुलाई को कमिश्नर ने जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को सेट-असाइड करते हुए प्रकरण को दोबारा सुनवाई के लिए डीएम के पास भेज दिया। आदेश में कहा गया था कि रिमांड में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखते हुए मामले को फिर सुना जाए। यही कदम अब हाईकोर्ट में कानूनी कसौटी पर आ गया है।
याचिकाकर्ता ने कहा, कमिश्नर को केस वापस भेजने का अधिकार ही नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अक्षय प्रधान ने हाईकोर्ट में सीधा सवाल उठाया कि गुंडा एक्ट की धारा छह में कमिश्नर को मामले को वापस जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजकर नए सिरे से फैसला कराने की शक्ति नहीं दी गई है। दलील दी गई कि धारा छह के तहत कमिश्नर के पास आदेश को पुष्ट करने, संशोधन के साथ पुष्ट करने अथवा रद करने का अधिकार है। अपील लंबित रहने के दौरान आदेश के संचालन पर शर्तों के साथ रोक लगाने की शक्ति भी है। लेकिन “मामला फिर डीएम के पास भेजो और नए सिरे से फैसला करो” जैसी रिमांड की शक्ति कानून में नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला बना अहम आधार
इस कानूनी दलील के समर्थन में इलाहाबाद हाईकोर्ट के Anil Chaudhary बनाम State of Uttar Pradesh and Others, Criminal Misc. Writ Petition No. 2700/2026 के फैसले का हवाला दिया गया। इस फैसले में भी समान मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था कि गोंडा एक्ट के तहत अपील सुनते समय कमिश्नर के पास मामले को रिमांड करने का अधिकार नहीं है।उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अब इसी दृष्टिकोण से प्रथम दृष्टया सहमति जताई है।
प्रतिवादी ने कहा, याचिका ही सुनवाई योग्य नहीं
मामले में प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता नारायण हर गुप्ता ने याचिका की पोषणीयता पर ही सवाल खड़ा किया। दलील दी गई कि कमिश्नर के आदेश से यदि कोई पक्ष प्रभावित है तो वह राज्य है और राज्य ने कमिश्नर के आदेश को चुनौती नहीं दी है।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता शिकायतकर्ता थी और उसने जिला मजिस्ट्रेट तथा अपीलीय अदालत दोनों के समक्ष हुई कार्यवाही में भाग लिया था। इसलिए वह “aggrieved party” यानी प्रभावित पक्ष है और उसे अदालत में चुनौती देने का अधिकार है।
धारा 6 को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी अहम
सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति आलोक महरा ने रिकॉर्ड और पक्षकारों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि अदालत प्रथम दृष्टया इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय से सहमत है। हाईकोर्ट के अनुसार धारा छह अपीलीय प्राधिकारी को जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखने, उसमें संशोधन करने या उसे रद करने का अधिकार देती है। लेकिन अपीलीय प्राधिकारी मामले को फिर जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजकर गोंडा एक्ट की धारा 3/4 के तहत नए सिरे से गुण-दोष पर निर्णय लेने का निर्देश नहीं दे सकता।
कमिश्नर के आदेश पर फिलहाल ब्रेक
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर अंतरिम राहत देते हुए 18 जुलाई 2026 के कमिश्नर गढ़वाल मंडल के आदेश के प्रभाव और संचालन पर अगली तारीख तक रोक लगा दी है। प्रतिवादी को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। अब मामला 22 सितंबर 2026 को फिर अदालत में आएगा।
जिलाधिकारी ने इसलिए 06 महीने के लिए किया है जिला बदर
जिला प्रशासन ने मई 2026 में पुनीत अग्रवाल के खिलाफ उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड गुंडा नियंत्रण अधिनियम के तहत कार्रवाई करते हुए उन्हें छह महीने के लिए जिला बदर किया है। इससे पूर्व बिल्डर का शस्त्र लाइसेंस भी निरस्त कर दिया गया था। प्रशासन का मानना था कि आरोपी की गतिविधियां कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बन रही थीं।
डीआरडीओ वैज्ञानिक के परिवार से मारपीट का मामला बना कार्रवाई का आधार
प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार, 13 अप्रैल को एटीएस कॉलोनी में डीआरडीओ से जुड़े एक परिवार के साथ मारपीट की घटना सामने आई थी। आरोप है कि इस हमले में पीड़ित के कान का पर्दा फट गया था। मामले में महिलाओं और बुजुर्गों के साथ भी अभद्र व्यवहार किए जाने के आरोप लगाए गए थे।
इसके अलावा वर्ष 2025 की दीपावली के दौरान कॉलोनी में बच्चों के सामने लाइसेंसी पिस्टल लहराने का मामला भी जिला प्रशासन के संज्ञान में आया था। उस समय जिलाधिकारी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पहले शस्त्र लाइसेंस निलंबित किया था, जिसे बाद में निरस्त कर दिया गया। इसके बाद जिला बदर की कार्रवाई भी की गई।
कई गंभीर मामलों में दर्ज हैं मुकदमे
प्रशासनिक अभिलेखों के मुताबिक पुनीत अग्रवाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं में पांच आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें डीआरडीओ के वैज्ञानिक से मारपीट, आरडब्ल्यूए पदाधिकारियों को धमकाने, नशे की हालत में उत्पात मचाने, बच्चों पर पिस्टल तानने, गाली-गलौज करने, वाहन से टक्कर मारने का प्रयास और जमीन पर कब्जा करने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
कॉलोनी में इस तरह ‘खौफ’ का पर्याय बनता गया बिल्डर, पत्नी पर भी आरोप
एटीएस कॉलोनी के निवासियों के मुताबिक, वर्ष 2021 से ही पुनीत अग्रवाल का व्यवहार लगातार आक्रामक और दबंगई भरा रहा है। समय-समय पर हुई घटनाओं और विवादों के चलते उनके खिलाफ अब तक पांच मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। कुछ घटनाओं में बिल्डर अग्रवाल के साथ उनकी पत्नी पर भी अभद्रता के आरोप लगाए गए हैं। बकायदे विभिन्न एफआईआर की विषय-वस्तु में उनके नाम का उल्लेख किया गया है।
बिल्डर की गुंडागर्दी का हालिया मामला उस वक्त सामने आया, जब उन्होंने डीआरडीओ से जुड़े एक वैज्ञानिक के साथ मारपीट कर दी। आरोप है कि पहले वैज्ञानिक के माता-पिता के साथ अभद्रता की गई और बाद में विरोध करने पर वैज्ञानिक को अपने परिसर में बुलाकर सहयोगियों के साथ हमला किया गया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। इस मामले में पीड़ित पक्ष की शिकायत पर रायपुर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है।
पुराने मामलों की भी लंबी फेहरिस्त
बिल्डर के खिलाफ सामने आए मामलों का रिकॉर्ड भी गंभीर है। वर्ष 2025 में कॉलोनी के अध्यक्ष के साथ मारपीट और गाली-गलौज का आरोप लगा। इसी साल एक सरकारी अधिकारी के साथ भी हाथापाई का मामला दर्ज हुआ। बच्चों द्वारा पटाखे जलाने जैसी मामूली बात पर पिस्टल तानने की घटना ने भी लोगों को दहशत में डाल दिया था।
उससे पहले 2021 में एक महिला निवासी के साथ गाली-गलौज का मामला सामने आया था, जिसकी शिकायत उच्च स्तर तक पहुंची, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय रहते सख्ती नहीं होने से ही आरोपी के हौसले बढ़ते गए।
अवैध निर्माण और जमीन कब्जाने के आरोप
मारपीट और अभद्रता के मामलों के अलावा, बिल्डर पर अवैध निर्माण और सरकारी जमीन पर कब्जा करने जैसे गंभीर आरोप भी लग चुके हैं। विभिन्न स्तरों पर हुई जांचों में इन आरोपों की पुष्टि होने की बात भी सामने आई है।
पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
जिला बदर की कार्रवाई से पहले भी प्रशासन बिल्डर के खिलाफ कुछ सख्त कदम उठा चुका था। पुनीत का शस्त्र लाइसेंस निरस्त किया जा चुका था और एटीएस सोसाइटी की आमसभा में भी उसकी सदस्यता भी समाप्त कर दी गई थी।



