
Rajkumar Dhiman, Dehradun: घपले और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से घिरे अर्बन कोऑपरेटिव बैंक देहरादून के खाताधारकों का सब्र आखिरकार जवाब दे गया। बैंक पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से लगाया गया प्रतिबंध करीब सात महीने बाद भी जारी है। निकासी पर रोक के चलते हजारों खाताधारकों की जमा पूंजी बैंक में फंसी हुई है। लगातार इंतजार और स्पष्ट समाधान न मिलने से नाराज बड़ी संख्या में खाताधारक रविवार को डीएल रोड स्थित बैंक के चेयरमैन के आवास पर पहुंच गए।
देखते ही देखते वहां जमकर हंगामा शुरू हो गया। हालात बिगड़ने की आशंका पर पुलिस मौके पर पहुंची तो प्रदर्शन कर रहे खाताधारकों और पुलिस के बीच भी झड़प हो गई। खाताधारकों ने पूर्व चेयरमैन राकेश ममगाईं और वर्तमान चेयरमैन मयंक ममगाईं के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी जमा रकम वापस दिलाने की मांग उठाई।
किसी की छह करोड़ की जमा, तो किसी के सामने बच्चों की फीस का संकट
प्रदर्शन कर रहे खाताधारकों का कहना था कि बैंक में उनकी जिंदगी भर की कमाई फंसी है। निकासी पर प्रतिबंध के कारण वे गंभीर आर्थिक संकट में पहुंच चुके हैं।
एक खाताधारक ने बताया कि उसके करीब छह करोड़ रुपये बैंक में अटके हुए हैं। वहीं कुछ अन्य खाताधारकों ने कहा कि स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि वे अपने बच्चों की स्कूल फीस तक जमा नहीं कर पा रहे हैं।
कारोबारियों और ठेकेदारों की परेशानी भी कम नहीं है। उनका कहना है कि बैंक में पैसा फंसा होने से रोजमर्रा के कारोबार, कर्मचारियों के भुगतान और अन्य वित्तीय लेनदेन पर सीधा असर पड़ रहा है।
खाताधारकों ने बैंक प्रबंधन की कथित लापरवाही और अनियमितताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि गलत फैसलों और कथित गड़बड़ियों का बोझ अब उन लोगों को उठाना पड़ रहा है, जिन्होंने भरोसा करके बैंक में अपनी रकम जमा की थी।
घंटों के हंगामे के बाद बाहर आए चेयरमैन
खाताधारक बैंक की स्थिति पर स्पष्ट जवाब और अपनी जमा राशि की वापसी की मांग को लेकर चेयरमैन से बातचीत पर अड़े रहे। काफी देर बाद वर्तमान चेयरमैन मयंक ममगाईं बाहर आए।
उन्होंने खाताधारकों को आश्वासन दिया कि बुधवार को सभी को बुलाकर बैंक की मौजूदा स्थिति के संबंध में पूरी जानकारी दी जाएगी। इसके बाद प्रदर्शन कर रहे लोगों का गुस्सा कुछ शांत हुआ।
प्रदर्शन में संजीव गुप्ता, आलोक अग्रवाल, मंचन बाला, रचना पवार, आर्यन वालिया, सागर वालिया, गोलू मल्होत्रा और अचिन गुप्ता समेत बड़ी संख्या में खाताधारक मौजूद रहे।
फारेंसिक ऑडिट ने खोली वित्तीय गड़बड़ियों की परतें
बैंक की वित्तीय स्थिति पर उठे सवालों के बीच किए गए फारेंसिक ऑडिट में बैंक के खातों, लेजर एंट्री और वित्तीय रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ियां सामने आने की बात कही गई है। इसके बाद बैंक के पांच पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हो चुका है।
बैंक की मुख्य शाखा के प्रबंधक रिंकू गौतम की शिकायत पर कोतवाली देहरादून पुलिस ने तत्कालीन सचिव आरके बंसल, सॉफ्टवेयर इंजीनियर गणेश चंद्र वार्ष्णेय, तत्कालीन शाखा प्रबंधक महावीर सिंह, संजय गुप्ता और कार्यकारी शाखा प्रबंधक विजय मोहन भट्ट को नामजद किया है।
मुकदमे में आरोप है कि आरोपितों ने कथित मिलीभगत से बैंक के रिकॉर्ड में फर्जी प्रविष्टियां कीं, बैंक की धनराशि का दुरुपयोग किया और नियमों के विपरीत निजी खातों में लेनदेन कर अनुचित लाभ हासिल किया। पुलिस इन आरोपों की जांच कर रही है।
2013-14 से शुरू हुई गड़बड़ियों की कहानी?
फारेंसिक ऑडिट में वर्ष 2013-14 से 2015-16 के बीच के वित्तीय लेनदेन और रिकॉर्ड की जांच के दौरान कई संदिग्ध गतिविधियां सामने आने की बात कही गई है। बैंक की मौजूदा वित्तीय बदहाली की जड़ें भी इसी दौर से जुड़ी बताई जा रही हैं।
आरोप है कि उस समय मशीनरी यानी बुलडोजर की खरीद और अन्य मदों के नाम पर चुनिंदा लोगों को बड़े स्तर पर ऋण बांटे गए। बाद में इन ऋणों की वसूली प्रभावित होती चली गई। आरोप यह भी है कि खराब ऋणों की प्रभावी वसूली नहीं की गई और जोखिम प्रबंधन से जुड़े नियमों का पर्याप्त पालन नहीं हुआ।
सबसे बड़ा सवाल बैंक के वित्तीय खातों को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि बैंक घाटे की स्थिति में पहुंचने के बावजूद खातों में लाभ दर्शाता रहा। इससे बैंक की वास्तविक आर्थिक स्थिति लंबे समय तक सामने नहीं आ सकी।
38 करोड़ का एनपीए, 124 करोड़ से ज्यादा की जमा राशि फंसी
बैंक की मुश्किलों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 38 करोड़ रुपये का एनपीए सामने आ चुका है। दूसरी ओर लगभग नौ हजार खाताधारकों की 124 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि संकट में है।
इन खाताधारकों में नगर निगम देहरादून, नगर निगम से जुड़े ठेकेदार, लोक निर्माण विभाग के ठेकेदार और विभिन्न कारोबारी भी शामिल बताए जा रहे हैं।
ऐसे खाताधारकों के लिए बैंक से रकम की निकासी बंद होना सिर्फ व्यक्तिगत बचत के फंसने तक सीमित नहीं है। इससे ठेकेदारों के भुगतान, कारोबारियों के लेनदेन और रोजमर्रा की वित्तीय व्यवस्था तक प्रभावित हो रही है।
प्रोविजनिंग पर भी गंभीर सवाल
बैंक की वित्तीय स्थिति को लेकर प्रोविजनिंग भी महत्वपूर्ण सवाल बनकर सामने आई है। बैंकिंग नियमों के अनुसार जोखिम वाले और फंसे हुए ऋणों के संभावित नुकसान के लिए आवश्यक ऋण हानि प्रावधान किया जाना होता है।
आरोप है कि बैंक प्रबंधन ने इस प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया। इसके चलते फंसे हुए कर्ज का वास्तविक वित्तीय प्रभाव लंबे समय तक खातों में स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ सका।
खाताधारकों का सवाल है कि यदि खराब ऋणों की वास्तविक स्थिति और उनके अनुरूप प्रोविजनिंग समय रहते की जाती, तो बैंक की वित्तीय कमजोरी का पता काफी पहले चल सकता था।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैंक की वित्तीय हालत वर्षों तक बिगड़ती रही तो इसकी भनक समय रहते खाताधारकों और संबंधित जिम्मेदार संस्थाओं को क्यों नहीं लगी?
करीब सात महीने से प्रतिबंध झेल रहे बैंक के खाताधारक अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि अपनी जमा पूंजी के भविष्य को लेकर स्पष्ट जवाब और ठोस समाधान चाहते हैं।



