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कागजों पर खरीद डाला 6.55 करोड़ का माल, सरकार को लगाया करोड़ों का चूना

ई-वेस्ट कारोबार की आड़ में बोगस आईटीसी का खेल, हरिद्वार की फर्म पर एसआईबी की छापेमारी, वसूले 1.18 करोड़ रुपये

Rajkumar Dhiman, Dehradun: ई-वेस्ट कारोबार की आड़ में कागजों पर करोड़ों रुपये की खरीद दिखाकर सरकार को राजस्व का चूना लगाने और बोगस इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) हासिल करने का मामला सामने आया है। राज्य कर विभाग की विशेष अनुसंधान शाखा (एसआईबी) ने हरिद्वार संभाग की एक ई-वेस्ट फर्म के खिलाफ जांच और तलाशी की कार्रवाई की। शुरुआती जांच में फर्म की ओर से करीब 6.55 करोड़ रुपये के माल की खरीद दर्शाई गई, लेकिन इस खरीद की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

मामले में सबसे बड़ा पहलू यह सामने आया कि खरीद के लिए बनाए गए ई-वे बिल में जिन वाहनों से माल उत्तराखंड लाया जाना दर्शाया गया था, आरएफआईडी के आंकड़ों में उन वाहनों का उत्तराखंड में प्रवेश ही नहीं मिला। यानी कागजों पर माल दूसरे राज्यों से उत्तराखंड पहुंच गया, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक निगरानी व्यवस्था के आंकड़े उसकी वास्तविक आवाजाही की पुष्टि नहीं कर रहे थे।

बाहर की फर्मों से खरीद दिखाई, आईटीसी का दावा
विभागीय जांच में फर्म की ओर से बनाए गए ई-वे बिलों से संबंधित जीएसटी और ई-वे बिल पोर्टल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें सामने आया कि फर्म ने दूसरे राज्यों में पंजीकृत फर्मों से माल खरीदना दर्शाया था। इसी खरीद के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का दावा किया गया।

आईटीसी व्यवस्था में वास्तविक खरीद पर चुकाए गए कर का समायोजन कारोबारी अपनी करदेयता के विरुद्ध कर सकता है। ऐसे में यदि खरीद ही वास्तविक नहीं हो और उसके आधार पर आईटीसी ले लिया जाए तो इससे वास्तविक करदेयता कृत्रिम रूप से कम हो जाती है। विभागीय जांच में इसी तरह के बोगस आईटीसी के दावे का संदेह सामने आया।

कागजों में दौड़े वाहन, आरएफआईडी में नहीं मिला उत्तराखंड प्रवेश
पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ई-वे बिल और आरएफआईडी के आंकड़ों के मिलान से सामने आई। फर्म की खरीद से जुड़े ई-वे बिलों में जिन वाहनों के नंबर दर्ज थे, उनकी आरएफआईडी आधारित आवाजाही की जांच कराई गई।

जांच में इन वाहनों का उत्तराखंड राज्य में प्रवेश किया जाना दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इसका सीधा मतलब यह है कि दस्तावेजों में जिन वाहनों के जरिए दूसरे राज्यों से माल उत्तराखंड लाए जाने का दावा किया गया, उनकी इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में राज्य की सीमा में आवाजाही नहीं मिली। यहीं से दर्शाई गई खरीद और वास्तविक माल की आवाजाही के बीच बड़ा अंतर सामने आया।

मौके पर पहुंची टीम तो स्टॉक निकला शून्य
इन तथ्यों के आधार पर संयुक्त आयुक्त अजय कुमार के निर्देशन में जांच टीम गठित की गई। टीम ने फर्म के घोषित व्यापार स्थल पर जांच, तलाशी और अभिग्रहण की कार्रवाई की।

जांच के दौरान मौके पर उपलब्ध दस्तावेजों और फर्म की ओर से दावा की गई आईटीसी का मिलान किया गया। लेकिन जांच टीम को व्यापार स्थल पर किसी प्रकार का स्टॉक नहीं मिला।

यानी जिस फर्म ने करोड़ों रुपये के माल की खरीद अपने रिकॉर्ड में दिखाई थी, उसके घोषित कारोबारी स्थल पर उस माल का कोई भौतिक स्टॉक मौजूद नहीं मिला।

खरीद के दस्तावेज भी नहीं दिखा पाई फर्म
मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह रही कि फर्म दर्शाई गई खरीद से संबंधित आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं करा सकी।

एक तरफ रिकॉर्ड में करीब 6.55 करोड़ रुपये की खरीद दिखाई गई और उस पर आईटीसी का दावा किया गया, दूसरी तरफ जांच के दौरान न तो संबंधित माल का स्टॉक मिला और न ही फर्म उस खरीद से जुड़े आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर सकी। इससे विभाग की जांच में कागजों पर दिखाई गई खरीद की वास्तविकता को लेकर सवाल और गहरे हो गए।

कार्रवाई शुरू होते ही जमा कराए 1.18 करोड़
विभागीय जांच और कार्रवाई के दौरान फर्म की ओर से डीआरसी-03 के माध्यम से कुल 1.18 करोड़ रुपये जमा कराए गए। यह रकम मौके पर ही जमा कराई गई।

जांच अधिकारियों ने जीएसटी अधिनियम-2017 के तहत आवश्यक दस्तावेज भी जब्त किए हैं। इन दस्तावेजों और विभागीय रिकॉर्ड की विस्तृत जांच की जा रही है।

जांच पूरी होने पर तय होगा वास्तविक कर और जुर्माना
राज्य कर विभाग के अनुसार मामले की विस्तृत जांच अभी जारी है। जांच पूरी होने के बाद नियमानुसार कर, ब्याज और अर्थदंड की वसूली की जाएगी।

फिलहाल 6.55 करोड़ रुपये की फर्जी खरीद, वाहनों की आरएफआईडी आवाजाही में सामने आई विसंगति, मौके पर शून्य स्टॉक, खरीद संबंधी दस्तावेजों का उपलब्ध न होना और कार्रवाई के दौरान 1.18 करोड़ रुपये जमा कराया जाना इस पूरे मामले को गंभीर बना रहा है।

अर्थात विभाग की जांच में फिलहाल सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 6.55 करोड़ रुपये का माल कहां गया, बल्कि यह भी है कि जिस माल की वास्तविक आवाजाही का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड नहीं मिला, उसकी खरीद के आधार पर आईटीसी का दावा कैसे किया गया।

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