सहकर्मियों के सामने पति को बार-बार अपमान करना मानसिक क्रूरता, फिर भी पत्नी को 40 लाख गुजारा भत्ता क्यों? हाईकोर्ट के फैसले की पूरी कहानी
दो वकीलों का विवाह 2014 में हुआ, 2016 से अलग रह रहे थे, बेटी के लिए 70 लाख और पत्नी को 40 लाख रुपये देने का आदेश

Round The Watch News: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने दो अधिवक्ताओं के करीब एक दशक पुराने वैवाहिक विवाद में परिवार न्यायालय से मिले तलाक को बरकरार रखा है। कोर्ट ने माना कि पत्नी की ओर से पति को उसके मित्रों, सहकर्मियों और वरिष्ठों के सामने बार-बार अपमानित करने तथा उसके पेशे और निजी जीवन से जुड़े फैसलों को लेकर लगातार दबाव बनाने का कथित आचरण असामान्य है। पूरे घटनाक्रम को साथ देखने पर सामान्य वैवाहिक मतभेद से आगे बढ़कर मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। हालांकि, इसी फैसले में कोर्ट ने पति को पूर्व पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता और नाबालिग बेटी के कल्याण व शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये अलग से देने का निर्देश दिया है।
2014 में शादी, 2015 में बेटी, 2016 से अलग
मामला जसलीन कौर सिद्धू बनाम शिखर कक्कर, प्रथम अपील संख्या 84/2024 का है। दोनों पेशे से अधिवक्ता हैं। उनका विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ और 7 सितंबर 2015 को बेटी काव्या का जन्म हुआ। इसके बाद 19 अप्रैल 2016 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने नवंबर 2016 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। देहरादून परिवार न्यायालय ने 5 अप्रैल 2024 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की। पत्नी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने 17 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए परिवार न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।
पति ने लगाए थे ये आरोप
पति की ओर से अदालत में कहा गया कि पत्नी का व्यवहार कई मौकों पर उसके मित्रों, सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अपमानजनक रहा। इसके अलावा उस पर कॉरपोरेट लॉ की नौकरी छोड़कर पत्नी की पसंद के स्थान पर जाने और अपने माता-पिता से दूरी बनाने का दबाव भी डाला गया।
कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि केवल पत्नी का पति से स्थान बदलने या पेशे में बदलाव करने के लिए कहना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है। इसी तरह पति-पत्नी में हर असहमति, कभी-कभार गुस्सा या सामान्य वैवाहिक तनाव भी क्रूरता नहीं बन जाता। इस मामले में अदालत ने अलग-अलग घटनाओं के बजाय उनके लगातार होने और सामूहिक प्रभाव को देखा। अदालत के अनुसार, पेशेवर सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने का असर व्यक्ति की गरिमा और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है। उपलब्ध साक्ष्यों और पूरे वैवाहिक घटनाक्रम को देखते हुए पीठ ने माना कि आचरण सामान्य वैवाहिक मतभेद की सीमा पार कर चुका था।
10 साल की दूरी, कई बार समझौते की कोशिश
इस मामले की सुनवाई केवल परिवार न्यायालय तक सीमित नहीं रही। लंबे समय तक विभिन्न अदालतों में कार्यवाही चली और कई बार दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोशिश हुई। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, मध्यस्थता के कई प्रयास सफल नहीं हो सके। 2026 में भी हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच समझौते के लिए एक और प्रयास किया, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।
सबसे बड़ा सवाल, जब पति की शिकायत सही मानी गई तो उसे 40 लाख क्यों देने पड़े?
यहीं इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आता है। 40 लाख रुपये पत्नी को मानसिक क्रूरता के “हर्जाने” के रूप में नहीं दिए गए हैं। हाईकोर्ट ने तलाक और स्थायी गुजारा भत्ता को दो अलग-अलग कानूनी मुद्दों के रूप में देखा। तलाक इस आधार पर बरकरार रखा गया कि पति ने मानसिक क्रूरता का आधार साबित किया। दूसरी ओर, स्थायी गुजारा भत्ता हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत अलग आर्थिक राहत है।
कोर्ट ने 40 लाख तय करते समय क्या देखा?
फैसले में अदालत ने विशेष रूप से यह दर्ज किया कि पत्नी पेशेवर रूप से योग्य अधिवक्ता हैं और सरकारी अधिवक्ता के रूप में काम कर चुकी हैं तथा अपना भरण-पोषण करने में सक्षम हैं। इसके बावजूद अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए 40 लाख रुपये की एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता राशि को उचित माना। अर्थात अदालत का तर्क यह नहीं था कि पत्नी बिल्कुल आयहीन या पति पर पूरी तरह निर्भर थीं। उलटे, उनकी योग्यता और कमाने की क्षमता को अदालत ने ध्यान में रखा। इसके बाद भी धारा 25 के तहत स्थायी आर्थिक व्यवस्था के रूप में 40 लाख रुपये तय किए गए। यह रकम पति के खिलाफ मानसिक क्रूरता का जुर्माना नहीं है। इसी तरह इसे पत्नी के पक्ष में किसी अदालत द्वारा घोषित “हर्जाना” भी नहीं कहा जाना चाहिए।
पहले भी पति से बेटी के लिए मासिक भुगतान कराया गया था
इस मामले में पहले की कार्यवाही में भी आर्थिक सहायता का प्रश्न उठा था। 2022 में हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में पति की बाद की नौकरी से 3.50 लाख रुपये प्रतिमाह आय स्वीकार किए जाने का उल्लेख है। उस समय अदालत ने पत्नी को बेटी के निर्वाह के लिए 50 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भुगतान का निर्देश दिया था। यह अंतरिम भरण-पोषण अंतिम 40 लाख रुपये से अलग था। यानी वर्षों तक चली मुकदमेबाजी के दौरान बेटी और परिवार की आर्थिक जरूरतों को लेकर अलग-अलग आदेश होते रहे।
बेटी के लिए 70 लाख, यह पत्नी का पैसा नहीं
हाईकोर्ट ने मां के पास रह रही नाबालिग बेटी की कस्टडी मां के पास ही रखने का फैसला किया, जबकि पिता के मुलाकात और अभिभावकीय भागीदारी के अधिकार बनाए रखे। बेटी की शिक्षा और कल्याण के लिए पति को 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया गया। इसलिए 70 लाख रुपये को पत्नी को दिया गया गुजारा भत्ता नहीं माना जा सकता। यह बेटी के भविष्य, शिक्षा और कल्याण के लिए निर्धारित राशि है।
कुल 1.10 करोड़, लेकिन दोनों रकम का उद्देश्य अलग
राशि, किसके लिए, उद्देश्य
₹40 लाख, पूर्व पत्नी, धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता
₹70 लाख, नाबालिग बेटी, शिक्षा, कल्याण और भविष्य की जरूरतें
कुल ₹1.10 करोड़, पत्नी और बेटी, दो अलग कानूनी मदों में भुगतान
पत्नी की आय का क्या हुआ?
पत्नी पहले Assistant Advocate General के रूप में काम कर चुकी थीं। पुराने अंतरिम भरण-पोषण मामले में उनकी अपनी पेशेवर आय का मुद्दा भी अदालत के सामने आया था। वर्ष 2022 के आदेश में उनकी पेशेवर स्थिति और पति की आय पर चर्चा हुई थी। बाद के अंतिम फैसले में भी हाईकोर्ट ने पत्नी की पेशेवर योग्यता और स्वयं को संभालने की क्षमता को स्पष्ट रूप से ध्यान में रखा। इसलिए इस फैसले को केवल इस रूप में पेश करना कि “पत्नी बेरोजगार थी, इसलिए पति को 40 लाख रुपये देने पड़े”, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
अदालत का मूल संदेश
इस फैसले में दो अलग कानूनी सिद्धांत एक साथ दिखाई देते हैं। पहला, मानसिक क्रूरता साबित होने पर पति को तलाक मिल सकता है, भले ही मामला शारीरिक हिंसा का न हो। दूसरा, तलाक का फैसला और स्थायी गुजारा भत्ता अलग प्रश्न हैं, क्योंकि किसी पक्ष के पक्ष में तलाक होने से दूसरे पक्ष की धारा 25 के तहत आर्थिक राहत की संभावना अपने आप समाप्त नहीं होती। फैसले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि 40 लाख रुपये को “क्रूरता का हर्जाना” समझना गलत होगा। यह तलाक के बाद पत्नी के लिए धारा 25 के तहत निर्धारित स्थायी गुजारा भत्ता है, जबकि 70 लाख रुपये बेटी के लिए अलग से तय किए गए हैं। अदालत ने पत्नी की पेशेवर योग्यता और कमाने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए भी 40 लाख रुपये की एकमुश्त राशि को उचित माना।



