आबकारी विभाग की वरिष्ठता पर हाई कोर्ट की रोक, सहायक आबकारी आयुक्त पद पर पदोन्नति फिलहाल थमी
आबकारी निरीक्षक सुजात हसन की याचिका पर कोर्ट ने जारी किया अंतरिम आदेश, पदोन्नति पर बढ़ा इंतजार

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड आबकारी विभाग में वरिष्ठता तय करने को लेकर चल रहा विवाद अब हाई कोर्ट पहुंच गया है। हाई कोर्ट ने आबकारी निरीक्षक संवर्ग की वरिष्ठता सूची को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर होने वाली पदोन्नति पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने राज्य सरकार समेत अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
मामला आबकारी विभाग के सुजात हसन की वरिष्ठता से जुड़ा है। उन्होंने 29 जुलाई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी ओर से 9 मई 2024 और 14 नवंबर 2024 की अनंतिम वरिष्ठता सूची को लेकर दाखिल आपत्तियों को खारिज कर दिया गया था। याचिका में उन्होंने आबकारी निरीक्षक संवर्ग की अंतिम वरिष्ठता सूची में अपनी स्थिति क्रम संख्या 109 से हटाकर 71ए (72) पर तय करने की मांग की है।
विवाद की जड़ क्या है?
सुजात हसन मूल रूप से उर्दू अनुवादक (लिपिकीय संवर्ग) के पद पर नियुक्त हुए थे। बाद में उन्हें आबकारी निरीक्षक के पद पर पदोन्नति मिली। उनकी पदोन्नति के लिए विभागीय पदोन्नति समिति यानी डीपीसी की पहली बैठक 9 जून 2014 को हुई थी, लेकिन प्रशासनिक कारणों से इसे स्थगित करना पड़ा। इसके बाद डीपीसी की बैठक 26 सितंबर 2014 को हुई और याचिकाकर्ता को 27 सितंबर 2014 को आबकारी निरीक्षक पद पर पदोन्नत किया गया। विवाद यह है कि वरिष्ठता सूची में उनकी पदोन्नति को किस क्रम में रखा जाए। इसी क्रम से यह भी प्रभावित होता है कि आगे सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर पदोन्नति के लिए किस कर्मचारी की दावेदारी पहले आएगी।
2024 में बदले वरिष्ठता के नियम ने बढ़ाया विवाद
याचिकाकर्ता की ओर से हाई कोर्ट में मुख्य तर्क उत्तराखंड सरकारी सेवक वरिष्ठता नियमावली, 2002 के नियम 8(3) में वर्ष 2024 में किए गए संशोधन को लेकर दिया गया। सरल भाषा में समझें तो रोटा-कोटा व्यवस्था में पदोन्नति और सीधी भर्ती से आने वाले कर्मचारियों के लिए निर्धारित अनुपात के आधार पर वरिष्ठता तय की जाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि संशोधित नियम के अनुसार यदि सीधी भर्ती और पदोन्नति से आने वाले कर्मचारी एक ही चयन वर्ष में नियुक्त या पदोन्नत हुए हैं, तो रोटा-कोटा व्यवस्था लागू होगी।
सुजात हसन का दावा है कि उनका चयन वर्ष 2013-14 है और इसी चयन वर्ष में सीधी भर्ती से आए कर्मचारियों के साथ उनकी वरिष्ठता तय की जानी चाहिए। उनके अनुसार इस व्यवस्था में पदोन्नत कर्मचारी को संबंधित क्रम में सीधी भर्ती वाले कर्मचारियों से ऊपर स्थान मिलना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने वरिष्ठता सूची में अपनी स्थिति ऊपर करने की मांग की है।
सरकार का क्या कहना है?
राज्य सरकार की ओर से इस दलील का विरोध किया गया। सरकार का कहना है कि संबंधित सीधी भर्ती संयुक्त अधीनस्थ सेवा चयन परीक्षा-2010 के माध्यम से हुई थी। इसकी संशोधित अधियाचना 26 मार्च 2012 को भेजी गई थी और सरकार के अनुसार इसका चयन वर्ष 2011-12 था। सरकार के मुताबिक इन सीधी भर्ती के कर्मचारियों की नियुक्ति 12 सितंबर 2013 को हुई थी। इसलिए उन्हें याचिकाकर्ता के साथ एक ही चयन वर्ष का कर्मचारी नहीं माना जा सकता। यानी पूरे विवाद का मूल सवाल यह है कि सीधी भर्ती के लिए अधियाचना कब भेजी गई थी या कर्मचारियों की वास्तविक नियुक्ति किस चयन वर्ष में मानी जाएगी?
हाई कोर्ट ने शुरुआती तौर पर क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रारंभिक तौर पर 2024 में संशोधित नियम 8(3) की व्याख्या करते हुए कहा कि रोटा-कोटा व्यवस्था लागू होने के लिए यह देखना होगा कि पदोन्नति और सीधी भर्ती से नियुक्ति एक ही चयन वर्ष में हुई या नहीं। कोर्ट की प्रारंभिक राय के अनुसार सीधी भर्ती के लिए पहले भेजी गई अधियाचना अपने आप में इस स्थिति को नहीं बदलती। यानी केवल यह तथ्य कि सीधी भर्ती की प्रक्रिया के लिए अधियाचना पहले भेज दी गई थी, रोटा-कोटा लागू होने के सवाल का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता।
किसके हित में आया अंतरिम आदेश?
अभी इसे किसी पक्ष की अंतिम जीत नहीं कहा जा सकता। हाई कोर्ट ने फिलहाल वरिष्ठता का अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन अंतरिम आदेश का तत्काल प्रभाव याचिकाकर्ता सुजात हसन के पक्ष में गया है, क्योंकि अदालत ने सहायक आबकारी आयुक्त पद पर पदोन्नति पर रोक लगा दी है। इसका मतलब यह है कि जब तक मामले में आगे सुनवाई नहीं होती और अदालत कोई नया आदेश नहीं देती, तब तक संबंधित पदों पर प्रस्तावित पदोन्नति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी। इससे याचिकाकर्ता की वरिष्ठता संबंधी आपत्ति पर फैसला होने तक मौजूदा स्थिति को बनाए रखने का अवसर मिला है।
अब आगे क्या होगा?
राज्य सरकार और अन्य पक्षकारों को हाई कोर्ट के नोटिस का चार सप्ताह में जवाब देना होगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि 2024 में संशोधित वरिष्ठता नियम के तहत याचिकाकर्ता को वरिष्ठता सूची में मांगी गई स्थिति मिलनी चाहिए या नहीं। इसलिए फिलहाल सुजात हसन की वरिष्ठता क्रम संख्या 109 से 71ए (72) करने की मांग स्वीकार नहीं हुई है। अदालत ने केवल पदोन्नति प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई है और मामले के अंतिम निर्णय के लिए पक्षकारों से जवाब मांगा है।
रोटा-कोटा नियम को बहुत सरल भाषा में ऐसे समझिए
जब किसी सरकारी पद पर भर्ती दो रास्तों से होती है, सीधी भर्ती (Direct Recruitment) और पदोन्नति (Promotion) तो दोनों के लिए पदों का एक निश्चित अनुपात/कोटा तय हो सकता है। इसी व्यवस्था को रोटा-कोटा कहा जाता है। मान लीजिए किसी संवर्ग में 10 पद हैं और नियम के अनुसार 5 पद सीधी भर्ती से आएंगे, 5 पद पदोन्नति से आएंगे तो इन दोनों समूहों के कर्मचारियों की वरिष्ठता तय करते समय केवल यह नहीं देखा जाता कि कौन पहले नियुक्त हुआ। नियम में निर्धारित अनुपात के अनुसार दोनों धाराओं के कर्मचारियों को क्रम में जगह दी जाती है। इसीलिए इसे रोटा (बारी/क्रम) + कोटा (निर्धारित हिस्सा) कहा जाता है।



