Uttarakhandआपदा प्रबंधन

केदारनाथ यात्रा मार्ग पर ग्रेनाइट की चट्टानें, फ्रॉस्ट-एक्शन से खुल जाते जॉइंट

ढालदार पहाड़ी क्षेत्र में चट्टानों के जॉइंट खुलने से गुरुत्वाकर्षण बल होता हावी, लुढ़कती हैं चट्टानें

Round The Watch: केदारनाथ यात्रा के मुख्य पड़ाव गौरीकुंड में 03 अगस्त 2023 को गुरुवार देर रात चट्टान खिसकने हुए हादसे के बाद समूचे यात्रा मार्ग की सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है। इस हादसे में 20 लोग मलबे में दबे हैं, जबकि तीन अन्य के शव प्राप्त कर लिए गए हैं। जिस कारण यह हादसा हुआ है, उस तरह की भौगोलिक व पर्यावरणीय परिस्थिति पूरे यात्रा मार्ग पर अभी भी खतरा बनी है। भूविज्ञानी व एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट का कहना है कि केदारनाथ


केदारनाथ यात्रा मार्ग पर पहाड़ी क्षेत्र में बाहर की तरफ निकली चट्टानें।

यात्रा मार्ग पर अभी कई चट्टानें ऐसी हैं, जो कभी भी खिसक सकती हैं। लिहाजा, उन्होंने पहाड़ी पर बाहर की तरफ निकली चट्टानों के समय-समय पर उचित ढंग से निस्तारण के सुझाव दिए हैं।
गौरीकुंड हादसे के बाद प्रो. एमपीएस बिष्ट ने कुछ शोधार्थियों के माध्यम से यात्रा मार्ग का सर्वे कराया। प्रो. बिष्ट के मुताबिक गौरीकुंड में सेमी गांव के पास जहां हादसा हुआ, वहां का लैटिट्यूड 30.512407° व लौंगिट्यूड 79.0841° है। इस क्षेत्र में कई और चट्टानें मौजूद हैं, जो पहाड़ी पर बाहर की तरफ निकली हुई हैं। उन्होंने कहा कि केदारनाथ क्षेत्र में ग्रेनाइट की चट्टाने हैं। जो जॉइंट के साथ आपस में चिपकी होती हैं। माइनस डिग्री के तापमान में फ्रॉस्ट-एक्शन (जमाव वाली ठंड की कार्रवाई) के चलते चट्टानों के जॉइंट चटकने लगते हैं। इसके चलते ढाल वाली चट्टानों में उनके जॉइंट गुरुत्व बल के हावी होने कारण तेजी से नीचे की तरफ दबाव बनाते हुए खुलने लगते हैं। इस तरह चट्टान निचले क्षेत्रों में तबाही मचाते हुए लुढ़कने लगती है। इस स्थिति को देखते हुए ग्रेनाइट चट्टानों के निस्तारण की ठोस व्यव्यस्था की जानी चाहिए। साथ ही चट्टान वाले क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

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