23 प्रतिशत बच्चों की लंबाई उम्र के मुकाबले कम, दून के इस गांव में सामने आई पोषण की तस्वीर
जौलीग्रांट स्थित स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन में सामने आई हकीकत

Rajkumar Dhiman, Dehradun: राजधानी देहरादून के ग्रामीण क्षेत्र रानीपोखरी में 3 से 6 वर्ष के बच्चों की वृद्धि, पोषण और विकास को लेकर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आई है। 100 बच्चों पर किए गए अध्ययन में जहां अधिकांश बच्चों की वृद्धि सामान्य पाई गई, वहीं 23 प्रतिशत बच्चों का कद उनकी उम्र के मुकाबले कम और 16 प्रतिशत बच्चों का वजन उनकी लंबाई के मुकाबले कम मिला। वहीं 10 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कम वजन की श्रेणी में पाए गए।
अध्ययन में बच्चों की वृद्धि का आकलन विश्व स्वास्थ्य संगठन के बाल वृद्धि मानकों के आधार पर किया गया, जबकि विकासात्मक स्थिति की जांच के लिए ट्रिवेंद्रम विकासात्मक जांच चार्ट का इस्तेमाल किया गया। शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंटेम्परेरी पीडियाट्रिक्स के अगस्त 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है।
रानीपोखरी में घर-घर जाकर हुआ सर्वे
“ग्रोथ एंड डेवलपमेंट स्टेटस ऑफ प्रीस्कूल चिल्ड्रन इन ए रूरल कम्युनिटी ऑफ देहरादून, उत्तराखंड : ए क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” शीर्षक वाले अध्ययन में रानीपोखरी के 100 बच्चों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने जून से अगस्त 2024 के दौरान घर-घर जाकर आंकड़े जुटाए।
अध्ययन में 46 लड़के और 54 लड़कियां थीं। 49 बच्चे 3 से 4 वर्ष तथा 51 बच्चे 4 से 5 वर्ष आयु वर्ग में थे। जन्म क्रम के लिहाज से 42 पहले, 39 दूसरे, 16 तीसरे और 3 चौथे क्रम के बच्चे थे।
23 बच्चों का कद उम्र के हिसाब से कम
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार उम्र के अनुपात में कद के आकलन में 77 प्रतिशत बच्चे सामान्य, 14 प्रतिशत स्टंटेड और 9 प्रतिशत गंभीर रूप से स्टंटेड मिले। यानी कुल 23 प्रतिशत बच्चे उम्र के अनुपात में कम कद वाले थे।
16 बच्चों में मोटापा
लंबाई के अनुपात में वजन के आकलन में 74 प्रतिशत बच्चे सामान्य, 10 प्रतिशत वेस्टेड, 6 प्रतिशत गंभीर रूप से वेस्टेड, 6 प्रतिशत अधिक वजन और 4 प्रतिशत मोटापे की श्रेणी में थे। यानी कुल 16 प्रतिशत बच्चों में वेस्टिंग मिली।
उम्र के अनुपात में वजन में 90 प्रतिशत बच्चे सामान्य, 2 प्रतिशत कम वजन और 8 प्रतिशत गंभीर रूप से कम वजन वाले थे। इस तरह कुल 10 प्रतिशत बच्चे कम वजन की श्रेणी में थे।
89 प्रतिशत परिवारों की आय 30 हजार तक
पारिवारिक आय में 3 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10 हजार रुपये से कम, 35 प्रतिशत की 10 से 20 हजार रुपये, 51 प्रतिशत की 20 से 30 हजार रुपये और 11 प्रतिशत की 30 हजार रुपये से अधिक थी। यानी 89 प्रतिशत परिवारों की आय 30 हजार रुपये या उससे कम थी। परिवार के स्वरूप में 44 प्रतिशत बच्चे संयुक्त, 39 प्रतिशत एकल और 17 प्रतिशत विस्तारित परिवारों से थे।
माताओं में 66 प्रतिशत गृहिणी
माताओं में 66 प्रतिशत गृहिणी, 31 प्रतिशत रोजगार में और 3 प्रतिशत बेरोजगार थीं। पिताओं में 63 प्रतिशत नौकरी, 35 प्रतिशत स्वरोजगार और 2 प्रतिशत बेरोजगार थे।
माताओं की शिक्षा में 8 प्रतिशत अशिक्षित, 6 प्रतिशत प्राथमिक, 44 प्रतिशत हाईस्कूल, 36 प्रतिशत इंटरमीडिएट, 1 प्रतिशत स्नातक और 5 प्रतिशत परास्नातक थीं। पिताओं में 2 प्रतिशत अशिक्षित, 2 प्रतिशत प्राथमिक, 18 प्रतिशत हाईस्कूल, 40 प्रतिशत इंटरमीडिएट, 21 प्रतिशत स्नातक और 17 प्रतिशत परास्नातक थे।
54 प्रतिशत बच्चे शाकाहारी
आहार के लिहाज से 54 प्रतिशत बच्चे शाकाहारी, 29 प्रतिशत मांसाहारी और 17 प्रतिशत अंडाहारी थे। किसी बच्चे को वृद्धि और विकास के लिए चिकित्सकीय रूप से निर्धारित अनुपूरक नहीं दिया जा रहा था। टीकाकरण में 76 प्रतिशत बच्चे पूर्ण टीकाकृत, जबकि 24 प्रतिशत आंशिक रूप से टीकाकृत मिले।
जन्म वजन में भी सामने आए आंकड़े
जन्म वजन के अनुसार 2 प्रतिशत बच्चों का वजन 1.5 किलोग्राम से कम, 51 प्रतिशत का 1.5 से 2 किलोग्राम, 36 प्रतिशत का 2 से 2.5 किलोग्राम और 11 प्रतिशत का 2.5 किलोग्राम से अधिक था। हालांकि जन्म वजन और वर्तमान पोषण स्थिति के बीच महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला। इसका परिणाम χ² = 0.18, पी = 0.67 रहा।
6 महीने पर दूध छुड़ाने और पोषण में संबंध
68 प्रतिशत बच्चों का दूध छुड़ाना 6 महीने की उम्र में और 32 प्रतिशत का 6 महीने के बाद हुआ। शोध में दूध छुड़ाने के समय और पोषण स्थिति के बीच सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण संबंध मिला। χ² = 5.56, पी = 0.018 रहा।
हालांकि अध्ययन क्रॉस-सेक्शनल होने के कारण इससे यह साबित नहीं होता कि दूध छुड़ाने का समय ही पोषण की स्थिति का कारण है।
विकासात्मक स्थिति की भी हुई जांच
बच्चों के विकासात्मक मील के पत्थरों की जांच ट्रिवेंद्रम विकासात्मक जांच चार्ट के माध्यम से की गई। कुछ बच्चों में एक या अधिक विकासात्मक क्षेत्रों में देरी के संकेत मिले। ऐसे बच्चों के आगे विस्तृत विकासात्मक मूल्यांकन की जरूरत बताई गई है। स्क्रीनिंग में देरी का संकेत किसी बीमारी का अंतिम निदान नहीं है।
शोधकर्ताओं ने नियमित निगरानी पर दिया जोर
अध्ययन हिमालयन कॉलेज ऑफ नर्सिंग, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय, देहरादून के शोधकर्ताओं ने किया। शोध दल में नैंसी बलूनी, अंचल रतूड़ी, मोहित कुमार, श्रुति उनियाल, शालिनी पंवार, रितिका, सार्थक वत्स, आकांक्षा कुकरेती, संध्या यादव, अनशवी राणा, चंदन कुमार और डॉ. नम्रता पुंडीर शामिल हैं। शोध का मुख्य संदेश है कि ग्रामीण बच्चों में केवल वजन नहीं, बल्कि उम्र के अनुसार कद, लंबाई के अनुसार वजन और विकासात्मक मील के पत्थरों की नियमित निगरानी जरूरी है।
अध्ययन की सीमा
यह अध्ययन रानीपोखरी के 100 बच्चों पर सुविधा-आधारित नमूना पद्धति से किया गया है। इसलिए 23 प्रतिशत स्टंटिंग और 16 प्रतिशत वेस्टिंग को पूरे रानीपोखरी, देहरादून या उत्तराखंड के बच्चों की दर नहीं माना जा सकता। फिर भी इसे एक संकेत मानकर अध्ययन का दायरा बढ़ाया जा सकता है।



