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हाई कोर्ट पहुंचा फर्जी प्रमाणपत्रों से MBBS सीटें हथियाने का मामला, जनहित याचिका दाखिल

नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने दायर की जनहित याचिका, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों पर सवाल

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड में एमबीबीएस प्रवेश के लिए आयोजित नीट-यूजी काउंसलिंग 2026 में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे और मूल निवास समेत विभिन्न प्रमाणपत्रों के कथित दुरुपयोग का मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट पहुंच गया है। नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने इस प्रकरण में जनहित याचिका दायर कर राज्य गठन से अब तक जारी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित, मूल निवास और जाति-वर्ग से जुड़े प्रमाणपत्रों की जांच कराने की मांग की है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि काउंसलिंग प्रक्रिया में सामने आई गड़बड़ियां केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं हो सकतीं। इनके पीछे प्रमाणपत्र जारी करने से लेकर सत्यापन, प्रवेश और आवंटन तक की पूरी व्यवस्था की जांच जरूरी है।

याचिका में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के 24 अभ्यर्थियों में से 16 के प्रमाणपत्रों को सरकारी पोर्टल पर सत्यापन के दौरान फर्जी, अमान्य, असंगत अथवा उपलब्ध नहीं होने से जुड़ी स्थिति सामने आने का दावा किया गया है। इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड का मूल निवासी होने का दावा करने वाले 524 काउंसलिंग रिकॉर्ड चिह्नित किए गए हैं, जिनमें अभ्यर्थियों की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई के विवरण राज्य से बाहर के संस्थानों से जुड़े बताए गए हैं। याचिकाकर्ता ने इन मामलों की स्वतंत्र जांच और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) से पड़ताल कराने की मांग की है। हालांकि, ये आरोप याचिका में किए गए दावे हैं, जिनकी न्यायिक या जांच एजेंसी से पुष्टि होना बाकी है।

स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के 24 अभ्यर्थी, 16 के प्रमाणपत्रों पर सवाल
याचिका के अनुसार, उत्तराखंड नीट-यूजी काउंसलिंग 2026 की प्रथम चरण की अनंतिम सूची में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के 24 अभ्यर्थियों के नाम शामिल थे। सूची में उनके नीट रोल नंबर, प्रमाणपत्रों की श्रेणी, संबंधित प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्राधिकारी और जारी होने की तारीख जैसी जानकारियां दर्ज थीं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अभ्यर्थियों के आवेदन और प्रमाणपत्रों का उत्तराखंड सरकार के ‘अपणी सरकार’ पोर्टल पर सत्यापन करने पर कई विसंगतियां सामने आईं।

इनमें आवेदन का विवरण नहीं मिलना, प्रमाणपत्र के आवेदन और अभ्यर्थी के नाम में अंतर, प्रमाणपत्र की श्रेणी का मेल नहीं खाना तथा आवेदन निरस्त होने जैसी स्थितियां शामिल हैं। याचिका में उदाहरण के तौर पर प्रियांजल सिंह, अनुष्का बंसल, कार्तिक वत्स, अनुष्का गुप्ता, आर्यन चौहान, मेहक जिंदल, उर्वशी, त्राप्ति, खुशि, कीर्ति चौहान, पार्थ वर्मा और विश्वादित्य सिंह समेत विभिन्न अभ्यर्थियों से जुड़े रिकॉर्ड का उल्लेख किया गया है।

इन विसंगतियों को केवल सामान्य प्रशासनिक त्रुटि मानने के बजाय मूल सरकारी रिकॉर्ड से सत्यापन की आवश्यकता बताई है। उसका कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि प्रमाणपत्र वास्तव में किस प्राधिकारी ने जारी किए, संबंधित अभ्यर्थियों ने उनका इस्तेमाल किस आधार पर किया और काउंसलिंग में उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति किस सत्यापन के बाद मिली।

यह भी कहा गया है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के सभी 24 अभ्यर्थियों के नीट रोल नंबर का प्रथम चरण की काउंसलिंग सूची से मिलान किया गया। इनमें से 16 अभ्यर्थियों के दूसरे चरण की काउंसलिंग के रिकॉर्ड में भी दर्ज होने का दावा किया गया है। ऐसे में प्रमाणपत्रों की जांच का असर केवल आवेदन तक सीमित नहीं, बल्कि सीट आवंटन की प्रक्रिया तक पहुंच सकता है।

195 प्रथम चरण और 329 दूसरे चरण के रिकॉर्ड खंगालने की मांग
याचिका में मूल निवास के दावों से जुड़े रिकॉर्ड का भी विस्तृत उल्लेख है। इसके अनुसार, प्रथम चरण की काउंसलिंग में 195 अभ्यर्थियों की ऐसी प्रविष्टियां चिह्नित की गईं, जिनमें उत्तराखंड का मूल निवास होने का दावा किया गया था, जबकि उनके हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के शैक्षणिक विवरण राज्य से बाहर के संस्थानों से संबंधित थे।

दूसरे चरण की काउंसलिंग में ऐसे 329 रिकॉर्ड चिह्नित किए जाने का दावा है। इस प्रकार कुल 524 काउंसलिंग प्रविष्टियां सत्यापन के दायरे में लाने की मांग की गई है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि प्रथम और दूसरे चरण में एक ही अभ्यर्थी के दोबारा दर्ज होने की स्थिति में रिकॉर्ड का दोहराव हटाकर वास्तविक अभ्यर्थियों की संख्या निर्धारित की जानी चाहिए।

इन रिकॉर्ड में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय और चंडीगढ़ समेत विभिन्न राज्यों के शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख होने का दावा किया गया है। एक प्रविष्टि में भारत से बाहर शिक्षा प्राप्त करने का विवरण भी दर्ज होने की बात कही गई है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि दूसरे राज्य में पढ़ाई करना अपने आप में किसी अभ्यर्थी के उत्तराखंड का मूल निवासी होने के दावे को अमान्य नहीं करता। लेकिन जब मूल निवास, आरक्षण अथवा पात्रता प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठते हैं, तब संबंधित अभ्यर्थियों के मूल दस्तावेजों और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच जरूरी हो जाती है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय की अनंतिम सूची में सीट आवंटन के समय मूल प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की शर्त दर्ज थी। ऐसे में जांच का विषय यह भी होना चाहिए कि संबंधित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन वास्तव में किस स्तर पर और किन अभिलेखों के आधार पर किया गया।

तीन एफआइआर और राजस्व निरीक्षक की शिकायत का हवाला
याचिका में सितंबर 2026 में दर्ज तीन एफआइआर का भी उल्लेख है। इनमें एफआइआर संख्या 86/2026, थाना क्लेमेंट टाउन, एफआइआर संख्या 380/2026, थाना रायपुर, और एफआइआर संख्या 210/2026, थाना वसंत विहार शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त 22 सितंबर 2026 को राजस्व निरीक्षक की ओर से दर्ज शिकायत का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन मामलों में कथित अनियमितताओं की जांच को केवल संबंधित अभ्यर्थियों या कुछ एफआइआर तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि यदि फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्र इस्तेमाल किए गए, तो उन्हें तैयार कराने, जारी करने, सत्यापित करने और प्रवेश प्रक्रिया में स्वीकार करने में किन व्यक्तियों या संस्थाओं की भूमिका रही।

याचिका में राजस्व विभाग के अधिकारियों, पटवारी, लेखपाल, तहसीलदार, उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारियों और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग भी की गई है। साथ ही विश्वविद्यालय, चिकित्सा शिक्षा से जुड़े अधिकारियों और काउंसलिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करने पर जोर दिया गया है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि किसी प्रमाणपत्र में गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो जांच केवल लाभ पाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित दस्तावेज तैयार करने से लेकर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने और प्रवेश प्रक्रिया में इस्तेमाल होने तक की पूरी कड़ी की पड़ताल होनी चाहिए।

विश्वविद्यालय ने 20 अभ्यर्थियों का अनंतिम आवंटन निरस्त किया
याचिका में हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय और उत्तराखंड केंद्रीकृत काउंसलिंग बोर्ड की ओर से जारी चार नोटिसों का उल्लेख किया गया है। ये नोटिस 28 सितंबर, 29 सितंबर, 30 सितंबर और छह अक्टूबर 2026 को जारी किए जाने का दावा है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इन नोटिसों में संबंधित संस्थानों और जिलाधिकारियों से प्राप्त सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर 20 अभ्यर्थियों का अनंतिम सीट आवंटन निरस्त किए जाने का उल्लेख है। इनमें मूल निवास, जाति और उपश्रेणी से जुड़े प्रमाणपत्रों का सत्यापन शामिल था।

इन आदेशों को प्रमाणपत्रों के सत्यापन से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि, 20 अभ्यर्थियों का अनंतिम आवंटन निरस्त होने और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के 24 अभ्यर्थियों में 16 के प्रमाणपत्रों पर सवाल उठने के दावों को अलग-अलग संदर्भों में देखा जाना चाहिए। याचिका में उपलब्ध विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों समूह पूरी तरह एक ही हैं।

एमबीबीएस सीट के बदले 45 लाख रुपये की व्यवस्था का भी उल्लेख
याचिका में 21 से 26 सितंबर के बीच सामने आई मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है। इनमें स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्र के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) से तैयार तस्वीर के कथित इस्तेमाल और एमबीबीएस सीट के बदले करीब 45 लाख रुपये की व्यवस्था होने के आरोपों का उल्लेख है।

याचिकाकर्ता ने इन रिपोर्टों को जांच की आवश्यकता रेखांकित करने वाली सूचनाओं के रूप में प्रस्तुत किया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि मीडिया रिपोर्ट अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं हैं। आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र जांच और संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन से ही हो सकती है।

इसलिए याचिका में केवल प्रवेश वर्ष 2026 के मामलों की जांच नहीं, बल्कि राज्य गठन के बाद से अब तक सरकारी लाभ, चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश, रोजगार, भर्ती और आरक्षण में इस्तेमाल किए गए संबंधित प्रमाणपत्रों की पड़ताल की मांग की गई है।

डॉक्टरों की कमी और 52,942 मरीजों के रेफरल का भी हवाला
याचिका में चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति का उल्लेख करते हुए दो आरटीआइ जवाबों का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, 26 सितंबर 2026 को प्राप्त सूचना में दावा किया गया कि उत्तराखंड के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों से 52,942 मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफर किया गया था। याचिकाकर्ता ने इसे राज्य में आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता से जुड़ी समस्या के संदर्भ में प्रस्तुत किया है।

30 सितंबर 2026 के एक अन्य आरटीआइ जवाब के हवाले से सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पदों के मुकाबले रिक्तियों की स्थिति भी उठाई गई है। याचिका के अनुसार, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में लगभग 86 प्रतिशत, उपजिला अस्पतालों में 52 प्रतिशत और जिला अस्पतालों में 36 प्रतिशत की कमी का उल्लेख किया गया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब राज्य के स्वास्थ्य तंत्र में डॉक्टरों और आवश्यक सुविधाओं की कमी है, तब एमबीबीएस की सीमित सीटों का आवंटन पात्रता और आरक्षण के नियमों के अनुरूप होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि अपात्र व्यक्ति गलत दस्तावेजों के आधार पर सीट हासिल करता है, तो किसी पात्र अभ्यर्थी के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि, याचिका में उद्धृत आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि किसी विशेष सीट पर फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर प्रवेश हुआ है। इसी कारण याचिकाकर्ता ने दस्तावेजों, पात्रता और सीट आवंटन की पूरी प्रक्रिया की जांच कराने की मांग की है।

सीबीआइ जांच, प्रमाणपत्रों का सत्यापन और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर जनहित याचिका में हाई कोर्ट से कई राहत देने का अनुरोध किया है। याचिका में प्रमुख रूप से मांग की गई है कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक जारी मूल निवास, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित, जाति-वर्ग और अन्य पात्रता प्रमाणपत्रों की जांच कराई जाए। यह भी पता लगाया जाए कि किन प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल शिक्षा, चिकित्सा प्रवेश, सरकारी नौकरी, भर्ती, आरक्षण और अन्य सार्वजनिक लाभ हासिल करने के लिए किया गया।

इसके साथ ही नीट-यूजी काउंसलिंग 2026 के प्रथम और दूसरे चरण के 524 चिह्नित रिकॉर्ड का सत्यापन कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने संबंधित मूल दस्तावेजों, प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्राधिकारियों के रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेखों और विश्वविद्यालय की सत्यापन प्रक्रिया की जांच का अनुरोध किया है।

याचिका में केंद्रीय जांच ब्यूरो से हाई कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग भी की गई है। इसमें पहले से दर्ज एफआइआर की जांच के साथ-साथ कथित अनियमितताओं की व्यापक कड़ी की पड़ताल करने का अनुरोध है। याचिकाकर्ता ने सरकारी पोर्टल के लॉग, आवेदन, अपलोड किए गए दस्तावेज, डिजिटल हस्ताक्षर, प्रमाणपत्र जारी करने के रिकॉर्ड और विश्वविद्यालय के सत्यापन व काउंसलिंग संबंधी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सुरक्षित रखने की आवश्यकता भी बताई है।

याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि सभी 524 काउंसलिंग प्रविष्टियों को एक साथ निरस्त करने की मांग नहीं की गई है। मांग यह है कि मूल दस्तावेजों के आधार पर वास्तविक गड़बड़ियों की पहचान हो और जिन मामलों में अनियमितता प्रमाणित हो, उनमें नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

राज्य सरकार से लेकर सीबीआइ और चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय तक पक्षकार
इस मामले में नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट याचिकाकर्ता है। ट्रस्ट की ओर से प्रार्थना नैथानी और अविदित नौटियाल अधिवक्ता के रूप में दर्ज हैं। याचिका में कुल नौ प्रतिवादियों का उल्लेख है। इनमें उत्तराखंड सरकार के गृह विभाग, चिकित्सा शिक्षा विभाग और राजस्व विभाग के सचिव शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कार्मिक एवं सतर्कता विभाग के सचिव, केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक, उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक, देहरादून के जिलाधिकारी, हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय के कुलसचिव और विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक को भी पक्षकार बनाया गया है।

याचिका के अनुसार, गृह, चिकित्सा शिक्षा, राजस्व तथा कार्मिक एवं सतर्कता विभाग के सचिवों के माध्यम से उत्तराखंड सरकार को प्रतिवादी बनाया गया है। सीबीआइ के निदेशक और पुलिस महानिदेशक को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है, ताकि जांच की मांग और संबंधित विभागों की भूमिका पर विचार किया जा सके।

हाई कोर्ट की ई-कोर्ट्स वेबसाइट पर उपलब्ध केस डिटेल के अनुसार, मामला रिट पिटीशन (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) श्रेणी में दर्ज है। स्क्रीनशॉट में फाइलिंग नंबर 9482/2026, रजिस्ट्रेशन नंबर 144/2026 और सीएनआर नंबर UKHC01-018233-2026 दर्ज है। फाइलिंग और रजिस्ट्रेशन की तारीख नौ अक्टूबर 2026 है। मामला डिवीजन बेंच के समक्ष दर्ज है और जिले के रूप में देहरादून का उल्लेख है। अंतरिम राहत के लिए दायर आवेदन की स्थिति अभी लंबित दिखाई गई है। अब मामले में आगे की न्यायिक कार्यवाही और संबंधित पक्षों का पक्ष महत्वपूर्ण होगा।

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