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हैरान करने वाला आदेश, महिला का सीना दबाना और उतारने की कोशिश रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई कड़ी नाराजगी, कहा, जज संवेदनशील बनें, रिसर्च के बिना न दें फैसले

Round The watch Research Desk: यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशील होना चाहिए और कानून व न्यायिक मिसालों का गहन अध्ययन करने के बाद ही निर्णय देना चाहिए।

यह टिप्पणी उस फैसले के संदर्भ में आई है, जिसमें पटना हाईकोर्ट ने कहा था कि बंद कमरे में महिला का सीना दबाना और उसकी सलवार उतारने का प्रयास अपने आप में रेप के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता। हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था।

CJI सूर्यकांत ने जताई हैरानी
14 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों को यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि बिना पर्याप्त कानूनी पड़ताल के फैसले नहीं दिए जाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करेगा और इस संबंध में विस्तृत आदेश जारी करेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मामले की सुनवाई के दौरान उठा मुद्दा
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट उस मामले की सुनवाई कर रहा था जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़की का स्तन पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना रेप का प्रयास नहीं माना जा सकता। इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया।

इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी (NJA) की विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार यौन अपराध मामलों की सुनवाई संबंधी संवेदनशीलता गाइडलाइन को भी मंजूरी प्रदान की और देश की सभी अदालतों को इसका पालन करने का निर्देश दिया।

क्या है बिहार का पूरा मामला
यह मामला बिहार के बांका जिले का है। 20 जनवरी 2008 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, एक युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो गई थी।

आरोप है कि स्टूडियो संचालक हिमांशु फोटो खींचने के बहाने युवती को अंदर ले गया और उसके पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा। कमरे का दरवाजा बंद करने के बाद आरोपी ने अपने कपड़े उतार दिए, युवती की सलवार उतारने का प्रयास किया, उसका सीना दबाया और कथित तौर पर रेप करने की नीयत से जबरन अश्लील हरकतें कीं।

निचली अदालत ने सुनाई थी तीन साल की सजा
सुनवाई के बाद वर्ष 2013 में बांका की ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास और अवैध रूप से बंधक बनाने का दोषी ठहराया। अदालत ने उसे तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में 13 साल तक चली सुनवाई
आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट में दलील दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई और इसका उचित कारण नहीं बताया गया। वहीं पीड़िता की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने सभी गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध किया था तथा आरोपी का अपराध अत्यंत गंभीर था। करीब 13 वर्ष तक चली सुनवाई के बाद 9 जुलाई 2026 को पटना High Court के न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह ने आरोपी को बरी कर दिया।

किन आधारों पर आरोपी को मिली राहत
पेनिट्रेशन या उसके प्रयास का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी ने युवती के साथ बल प्रयोग किया, कमरे का दरवाजा बंद किया, सलवार उतारने का प्रयास किया और उसका सीना दबाया। लेकिन अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी ने रेप करने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया जिसे भारतीय कानून के तहत “रेप का प्रयास” कहा जा सके। मेडिकल साक्ष्य भी इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करते।

जांच और साक्ष्यों में कई कमियां
अदालत ने कहा कि मामले में गंभीर जांच संबंधी खामियां थीं। पांच गवाहों में केवल एक स्वतंत्र गवाह था, जो मुकदमे के दौरान अपने बयान से मुकर गया। चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से जिरह नहीं कराई गई। चिकित्सा अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया।

मुख्य गवाह केवल पीड़िता के माता-पिता
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के प्रमुख गवाह पीड़िता के माता-पिता थे, जिनका मुकदमे के परिणाम से सीधा संबंध था। अदालत ने यह भी माना कि एफआईआर में देरी का स्पष्टीकरण स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि पीड़िता के अनुसार थाना प्रभारी ने पहले दिन मुकदमा दर्ज करने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण अगले दिन एफआईआर दर्ज हुई।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
पटना हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यौन अपराधों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है, लेकिन इसके लिए उसका बयान पूरी तरह विश्वसनीय और विरोधाभासों से मुक्त होना चाहिए। हाईकोर्ट का कहना था कि इस मामले में पीड़िता के बयानों में कुछ विरोधाभास पाए गए, इसलिए स्वतंत्र पुष्टि के बिना आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बनवाई नई गाइडलाइन
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में कहा था कि नाड़ा तोड़ना और निजी अंग पकड़ना केवल अपराध की तैयारी है, रेप का प्रयास नहीं। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को पलटते हुए कहा कि ऐसे कृत्य परिस्थितियों के आधार पर रेप के प्रयास की श्रेणी में आ सकते हैं। इसके बाद शीर्ष अदालत ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी को यौन अपराधों की सुनवाई के लिए व्यापक गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य न्यायाधीशों में संवेदनशीलता, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण और गरिमापूर्ण न्यायिक प्रक्रिया विकसित करना है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि गाइडलाइन भारतीय सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की जाए।

विशेषज्ञ समिति को क्या-क्या निर्देश दिए गए
सुप्रीम कोर्ट ने समिति से कहा था कि विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों में प्रचलित उन अपमानजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान की जाए, जिनका इस्तेमाल अक्सर यौन अपराधों के मामलों में होता है।

अदालत का मानना था कि ऐसे शब्दों को समझने और रिकॉर्ड करने से पीड़ित अपने साथ हुई प्रताड़ना का अधिक सटीक विवरण दे सकेंगे तथा पुलिस, अभियोजन और अदालतें अपराध की गंभीरता को बेहतर ढंग से समझ पाएंगी।

गाइडलाइन कहां लागू होगी
14 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए निर्देश दिया कि इन गाइडलाइन को सुप्रीम कोर्ट, सभी हाईकोर्ट और जिला अदालतों की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाए।

इसके अलावा नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी, सभी राज्य न्यायिक अकादमियों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों तथा अन्य विधि शिक्षण संस्थानों को भी यह गाइडलाइन भेजने का आदेश दिया गया।

भारतीय कानून में ‘रेप की तैयारी’ और ‘रेप के प्रयास’ में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने 25 अक्टूबर 2021 के एक फैसले में दोनों अवधारणाओं का अंतर स्पष्ट किया था। रेप की तैयारी वह चरण है, जब अपराध की योजना बनाई जाती है, साधन जुटाए जाते हैं या अपराध करने का इरादा विकसित किया जाता है। यह अपराध शुरू होने से पहले की अवस्था होती है।

रेप का प्रयास तब माना जाता है, जब तैयारी पूरी होने के बाद आरोपी अपराध को अंजाम देने की दिशा में प्रत्यक्ष और ठोस कदम उठा देता है। यदि किसी कारण अपराध पूरा नहीं हो पाता, तब भी कानून ऐसे प्रयास को दंडनीय मानता है, क्योंकि अपराध करने का स्पष्ट इरादा और सक्रिय कार्रवाई दोनों मौजूद होते हैं।

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