छुट्टी के दिन खुला शासन का दरवाजा! महिला आईएफएस अधिकारी के अवकाश आदेशों पर उठे सवाल
आईएफएस डॉ अभिलाषा सिंह के अवकाश में संशोधन के लिए सरपट दौड़ी फाइल

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड शासन के वन अनुभाग-1 से जारी दो अवकाश स्वीकृति आदेश इन दिनों नौकरशाही के गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। मामला उत्तराखंड वानिकी प्रशिक्षण अकादमी, हल्द्वानी में तैनात महिला आईएफएस अधिकारी डॉ. अभिलाषा सिंह (आइएफएस) के अवकाश से जुड़ा है, जिनके लिए पहले 20 जून 2026 और फिर 11 जुलाई 2026 को शासन स्तर से आदेश जारी किए गए। खास बात यह है कि दूसरा आदेश ऐसे दिन जारी हुआ, जब सचिवालय में साप्ताहिक अवकाश रहता है।
वन अनुभाग-1 की ओर से जारी कार्यालय आदेश 20 जून 2026 के अनुसार, प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) के प्रस्ताव और डॉ. अभिलाषा सिंह के आवेदन के आधार पर उन्हें 18 जून 2026 से 10 जुलाई 2026 तक अर्जित अवकाश स्वीकृत किया गया था। आदेश में 11 और 12 जुलाई 2026 को पड़ने वाले द्वितीय शनिवार और रविवार के सार्वजनिक अवकाश को जोड़ते हुए कुल 23 दिनों का अवकाश स्वीकृत किया गया। यह अवकाश अखिल भारतीय सेवाएं (अवकाश) नियमावली, 1955 के नियम 11(1) के तहत स्वीकृत किया गया था।
इस आदेश में स्पष्ट किया गया था कि 23 दिन के अवकाश के समायोजन के बाद वर्ष 2026 की प्रथम छमाही तक डॉ. अभिलाषा सिंह के अवकाश खाते में 100 दिनों का अर्जित अवकाश शेष रहेगा। साथ ही उनके पदों का कार्यभार उत्तराखंड वानिकी प्रशिक्षण अकादमी के प्रभारी उप निदेशक श्री सूरज तिवारी को सौंपा गया और यह भी उल्लेख किया गया कि इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन अथवा भत्ते देय नहीं होंगे।
असल मामला शुरू होता है अब। इसके बाद प्रमुख वन संरक्षक कार्यालय के 9 जुलाई 2026 तथा डॉ. अभिलाषा सिंह के 23 जून 2026 के अनुरोध पत्र के आधार पर शासन ने 11 जुलाई 2026 को एक और कार्यालय आदेश जारी किया। जिसके माध्यम से पहले स्वीकृत अवकाश अवधि में संशोधन करते हुए 22 जून 2026 से 10 जुलाई 2026 तक की अवधि को 19 दिन मानते हुए अवकाश का पुनर्गणना की गई और इसके बाद 11 जुलाई 2026 से 31 अगस्त 2026 तक कुल 52 दिनों का अतिरिक्त अर्जित अवकाश स्वीकृत कर दिया गया।
यहीं से यह मामला चर्चा और सवालों के केंद्र में आ गया। 11 जुलाई 2026 को जारी संशोधित आदेश ऐसे दिन जारी हुआ, जो द्वितीय शनिवार था और इसे अवकाश का दिन माना जाता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि अवकाश के दिन शासन स्तर पर फाइल प्रक्रिया कैसे पूरी हुई और आदेश जारी करने की आवश्यकता इतनी तात्कालिक क्यों मानी गई।
सरकारी तंत्र में कार्यरत कई अधिकारी और कर्मचारी इस घटनाक्रम को लेकर अनौपचारिक चर्चाएं कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि प्रशासनिक संवेदनशीलता और तत्परता इसी प्रकार सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के मामलों में दिखाई जाए, तो लंबित फाइलों और अनुमोदनों की संख्या में बड़ी कमी आ सकती है।
हालांकि, दोनों आदेश विधिवत शासन स्तर से जारी किए गए हैं और इनमें अखिल भारतीय सेवाएं (अवकाश) नियमावली, 1955 के प्रावधानों का उल्लेख भी किया गया है। लेकिन, छुट्टी के दिन जारी हुए संशोधित आदेश ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि क्या सभी अधिकारियों को ऐसी ही त्वरित प्रशासनिक सुविधा उपलब्ध होती है या फिर यह संवेदनशीलता कुछ चुनिंदा मामलों तक ही सीमित रहती है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि शासन और वन विभाग इस पूरे घटनाक्रम पर कोई औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करते हैं या नहीं।



