countryScienceआपदा प्रबंधन

नेपाल में ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे आया बर्फ-चट्टान का मलबा

इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के अध्ययन में सामने आई सबसे स्पष्ट तस्वीर

Rajkumar Dhiman, Dehradun: एनआरएससी के उपग्रह विश्लेषण में ग्लेशियर टूटने के बाद नदी अवरुद्ध होने और अचानक पानी-मलबा निकलने की कड़ी सामने आई; आइसीआइएमओडी ने ल्हेंडे खोला में आइस-रॉक एवलांच को संभावित ट्रिगर माना, यूएसजीएस के अनुसार दर्ज 5.2 का भूकंपीय संकेत खुद ग्लेशियल ढहने और मलबा प्रवाह से पैदा हुआ

नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर उपग्रह और वैज्ञानिक अध्ययनों से अब घटनाक्रम की तस्वीर काफी स्पष्ट होने लगी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) के प्रारंभिक विश्लेषण के अनुसार, नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा अलग होकर ढह गया। इसके बाद बर्फ और चट्टान का मलबा नीचे आया, नदी का प्रवाह अस्थायी रूप से बाधित हुआ और पानी-मलबे की अचानक लहर ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में भारी तबाही मचाई। एनआरएससी ने इसे अभी प्रारंभिक आकलन बताया है।

24 और 26 अगस्त की तस्वीरों में दिखा बड़ा बदलाव
एनआरएससी ने रिसोर्ससैट-2ए के एडब्ल्यूआईएफएस सेंसर से 26 अगस्त को करीब सुबह 10:30 बजे भारतीय समय प्राप्त तस्वीरों का घटना से पहले की तस्वीरों से मिलान किया। इसके अलावा यूरोपीय संघ के सेंटिनल-2 और लैंडसैट-9 की तस्वीरों से भी इलाके में हुए बदलाव का अध्ययन किया गया। 24 अगस्त की सेंटिनल-2 तस्वीर में संबंधित ऊंचाई वाला क्षेत्र ग्लेशियर के रूप में दिखाई देता है, जबकि 26 अगस्त के बाद के चित्र में उसी हिस्से में आइस-रॉक एवलांच/ग्लेशियर टूटने का क्षेत्र दिखाई देता है। लैंडसैट-9 की 26 अगस्त की तस्वीर में भी ग्लेशियर के टूटने और ढहने का क्षेत्र चिह्नित किया गया।

उपग्रह तस्वीरों में ग्लेशियर से नीचे की ओर फैला बड़ा अशांत क्षेत्र, भोटेकोशी नदी का सामान्य चैनल से कहीं अधिक चौड़ा होना और आसपास के इलाकों में बाढ़ का फैलाव दिखाई दिया। हालांकि एनआरएससी ने अभी कुल जलमग्न क्षेत्र, मलबे की मात्रा, कुल डिस्चार्ज या बुनियादी ढांचे को हुई क्षति का अंतिम आंकड़ा जारी नहीं किया है। बादलों के कारण प्रभावित क्षेत्र का कुछ हिस्सा भी स्पष्ट नहीं दिखाई देता।

5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे गिरा ग्लेशियर का हिस्सा
अंतरराष्ट्रीय कंपनी प्लैनेट लैब्स की घटना से पहले और बाद की उपग्रह तस्वीरों का विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया। कैलगरी विश्वविद्यालय के पृथ्वी वैज्ञानिक डैन शुगर के अनुसार, ग्लेशियर का निचला हिस्सा करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में आ गिरा। सिक्किम विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग भूविज्ञान विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने उपग्रह तस्वीरों के आधार पर कहा कि ग्लेशियर का पर्याप्त हिस्सा टूटने के साथ चट्टान और तलछट भी नीचे आई।

रॉयटर्स की समीक्षा में घटना से पहले और बाद की तस्वीरों में हरी पहाड़ी ढलान का बड़ा हिस्सा बाद में भूरे मलबे और तलछट से ढका दिखाई दिया। शुगर ने यह भी कहा कि घटना से पहले के करीब 24 घंटों में ऊंचाई वाले क्षेत्र में काफी बर्फ पिघलने के संकेत दिखे, हालांकि उस समय मौसम केंद्र के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे, इसलिए इसे घटना का निश्चित कारण नहीं माना जा सकता।

ल्हेंडे खोला में आया आइस-रॉक एवलांच
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (आइसीआइएमओडी) और नेपाल-चीन के साझेदार संस्थानों की प्रारंभिक जांच का केंद्र ल्हेंडे खोला है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्र से आए बर्फ-चट्टान के मलबे का बड़ा हिस्सा इस नदी में गिरा, जो भोटेकोशी की सहायक नदी है। इससे पानी के साथ भारी मात्रा में तलछट और बड़े बोल्डर नीचे की ओर बह निकले। आइसीआइएमओडी ने इसे संभावित आइस एवलांच बताया है, लेकिन इसके सटीक कारण को अभी अपुष्ट माना है।

रॉयटर्स ने नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के हवाले से बताया कि प्लैनेट लैब्स की शुरुआती तस्वीरों में ल्हेंडे नदी में बर्फ और चट्टान के भूस्खलन से मलबा-युक्त बाढ़ शुरू होने के संकेत मिले। यह क्षेत्र रसुवागढ़ी सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व बताया गया।

नदी में बना अवरोध बना दूसरी आपदा का खतरा
एनआरएससी और आइसीआइएमओडी दोनों के आकलन में एक महत्वपूर्ण संभावना सामने आई है—बर्फ और चट्टान का मलबा नदी के संकरे हिस्से में जमा होकर अस्थायी प्राकृतिक बांध बना सकता है। इसके पीछे पानी जमा हुआ और फिर अवरोध टूटने पर अचानक पानी, मलबा और बोल्डर नीचे की ओर निकले होंगे। आइसीआइएमओडी अभी इस संभावित अवरोध के आकार, स्थान और स्थिरता का अध्ययन कर रहा है।

यही कारण है कि आपदा को केवल ग्लेशियर टूटने की घटना नहीं, बल्कि कई चरणों वाली श्रृंखलाबद्ध आपदा माना जा रहा है—ग्लेशियर ढहना, आइस-रॉक एवलांच, नदी अवरोध, पानी का जमा होना और फिर अचानक फ्लैश फ्लड तथा मलबा प्रवाह।

30 मिनट में नौ मीटर बढ़ा त्रिशूली का जलस्तर
आइसीआइएमओडी के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों के अनुसार 26 अगस्त को भोटेकोशी बेसिन में स्थानीय समय करीब सुबह नौ बजे जलस्तर तेजी से बढ़ा। त्रिशूली नदी के गल्छी स्टेशन पर करीब 30 मिनट में जलस्तर नौ मीटर बढ़ गया, जबकि मालेखु में लगभग सात मीटर की वृद्धि दर्ज हुई। कई जलमापन केंद्र बाढ़ में क्षतिग्रस्त या बह गए।

नेपाल के फ्लड फोरकास्टिंग डिवीजन की एक तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ की लहर ने भोटेकोशी-त्रिशूली-नारायणी नदी तंत्र में अनुमानित दो करोड़ घनमीटर अतिरिक्त जल प्रवाह पैदा किया। यह प्रवाह करीब 168 किलोमीटर तक देवघाट पहुंचा और वहां शाम चार बजे जल प्रवाह की चरम दर 5,850 घनमीटर प्रति सेकंड दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार आपदा के शुरुआती चरण में 6,79,000 से अधिक आपात चेतावनी एसएमएस भेजे गए। यह आंकड़ा अभी एक प्रकाशित तकनीकी रिपोर्ट का प्रारंभिक आकलन है, इसलिए इसे अंतिम हाइड्रोलॉजिकल माप नहीं माना जाना चाहिए।

भूकंप ने ग्लेशियर तोड़ा या संकेत खुद ग्लेशियर से बना?
इस मामले में शुरुआती और बाद के वैज्ञानिक आकलनों में महत्वपूर्ण अंतर है। भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार क्षेत्र में 4.9 तीव्रता का भूकंप, करीब 10 किलोमीटर गहराई पर, सुबह 8:22 बजे भारतीय समय दर्ज हुआ था। एनआरएससी के प्रारंभिक आकलन की मीडिया रिपोर्टिंग में इसे ग्लेशियर के ढहने का संभावित ट्रिगर बताया गया।

लेकिन अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अद्यतन विश्लेषण में इस घटना को 5.2 तीव्रता की लैंडस्लाइड/भूस्खलन-संबंधी भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया गया है। यूएसजीएस के अनुसार 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास स्थानीय समय सुबह 8:37 बजे हुई यह भूकंपीय ऊर्जा ग्लेशियल चट्टान और बर्फ के ढहने तथा उसके बाद मलबा प्रवाह से उत्पन्न हुई थी।

इसलिए फिलहाल सबसे सावधान वैज्ञानिक निष्कर्ष यही है कि भूकंप ने ग्लेशियर को तोड़ा, यह अभी सिद्ध नहीं है। इसके उलट यूएसजीएस का वर्तमान वर्गीकरण संकेत देता है कि जिसे शुरुआती तौर पर भूकंप समझा गया, वह स्वयं ग्लेशियर-चट्टान के ढहने से पैदा हुआ भूकंपीय संकेत था। आइसीआइएमओडी भी कह रहा है कि उसके पास दर्ज असामान्य भूकंपीय संकेतों और बाढ़ के बीच अभी कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है।

ग्लेशियर का नाम और प्रकार
उपलब्ध एनआरएससी सामग्री में प्रभावित ग्लेशियर का कोई निश्चित स्थानीय नाम नहीं दिया गया है। एनआरएससी संबंधी एक रिपोर्ट में इसे सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) बताया गया है। सर्क ग्लेशियर पर्वत की कटोरे जैसी अवसादयुक्त जगह में जमा बर्फ से बनता है और ऊपरी ढलानों से हिमस्खलन द्वारा भी पोषित हो सकता है।

इसलिए किसी विशिष्ट ग्लेशियर का नाम अंतिम रूप से बताना अभी जल्दबाजी होगी। रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित उपग्रह तस्वीरों में स्थान को लांगटांग क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है, लेकिन एनआरएससी ने अपने प्रारंभिक आकलन में ग्लेशियर का आधिकारिक नाम नहीं दिया है।

गर्मी और जलवायु परिवर्तन की भूमिका
रॉयटर्स के विशेषज्ञ विश्लेषण में घटना से पहले गर्म परिस्थितियों और तेजी से बर्फ पिघलने के संकेत मिले हैं। संयुक्त राष्ट्र के 2023 के आंकड़ों के अनुसार नेपाल के हिमाच्छादित पर्वतों ने तीन दशक से कुछ अधिक समय में करीब एक-तिहाई बर्फ खोई है। इसी रिपोर्ट में कहा गया कि नेपाल के ग्लेशियर पिछले दशक में उससे पहले के दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक तेजी से पिघले। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इन दीर्घकालिक बदलावों के आधार पर 26 अगस्त की घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना अभी उचित नहीं है।

दूसरी बाढ़ का खतरा भी
पहली आपदा के बाद खतरा खत्म नहीं हुआ। चीन-नेपाल सीमा के ऊपरी क्षेत्र में मलबे से एक और अवरोध झील बनने की सूचना है। तकनीकी रिपोर्ट और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार इसमें लाखों घनमीटर पानी जमा हो रहा है और इसके टूटने पर भोटेकोशी-त्रिशूली तंत्र में दूसरी बाढ़ की आशंका है। यही वजह है कि आइसीआइएमओडी ने संभावित अवरोध की निगरानी और सीमा-पार चेतावनी प्रणाली की जरूरत पर जोर दिया है।

वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सबक
इस घटना ने हिमालय में क्रायोस्फियर से जुड़ी श्रृंखलाबद्ध आपदाओं का खतरा सामने ला दिया है। आइसीआइएमओडी के अनुसार ग्लेशियर, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों में बदलाव के साथ ऐसे खतरे अधिक स्पष्ट हो रहे हैं। संस्था ने सीमा-पार रीयल-टाइम निगरानी, उपग्रह, भूकंपीय और जलस्तर आंकड़ों को जोड़ने तथा स्थानीय समुदायों तक तत्काल चेतावनी पहुंचाने की जरूरत बताई है।

खैर, अभी तक उपलब्ध सबसे मजबूत वैज्ञानिक तस्वीर यह है कि करीब 5,200 मीटर ऊंचाई पर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटा, करीब 1,200 मीटर नीचे गिरा और बर्फ-चट्टान का मलबा ल्हेंडे खोला में पहुंचा। संभावित नदी अवरोध के बाद पानी और मलबे की अचानक लहर भोटेकोशी से त्रिशूली और आगे नारायणी तक पहुंची। एनआरएससी के उपग्रह चित्र इस क्रम को समर्थन देते हैं, जबकि आइसीआइएमओडी इसे अभी जांचाधीन संभावित आइस-रॉक एवलांच मान रहा है और यूएसजीएस ने दर्ज भूकंपीय संकेत को ग्लेशियल ढहने/मलबा प्रवाह से जोड़ा है। मलबे की कुल मात्रा, वास्तविक जलाशय क्षमता, घटना का मूल ट्रिगर और जलवायु परिवर्तन की प्रत्यक्ष भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष के लिए विस्तृत मैदानी अध्ययन अभी बाकी है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button