उत्तराखंड पुलिस के खिलाफ सीबीआई जांच आगे बढ़ेगी, फर्जी चरस बरामदग्गी की फाइल 06 साल बाद फिर खुली
केलाखेड़ा थाना क्षेत्र में पंडित जी ढाबा संचालक से फर्जी चरस बरामदगी का मामला, दस्तावेजों में हेरफेर और CCTV मिटाने के आरोपों की होगी जांच

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड में 06 वर्ष पुराने एक NDPS मामले में अब पुलिस की कार्रवाई ही जांच के घेरे में आ गई है। वर्ष 2020 में ढाबा संचालक अनिल शर्मा को 97.70 ग्राम चरस के साथ गिरफ्तार करने का दावा करने वाली पुलिस के खिलाफ फर्जी बरामदगी, मारपीट, अवैध हिरासत, दस्तावेजों में हेरफेर और महत्वपूर्ण CCTV फुटेज मिटाने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले की जांच दोबारा अपने हाथ में ले ली है।
CBI की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB), देहरादून ने तीन सितंबर 2026 को केलाखेड़ा थाने में मामला दर्ज किया है। अब जांच का केंद्र यह पता लगाना है कि अनिल शर्मा से वास्तव में मौके पर चरस बरामद हुई थी या पुलिस ने बाद में बरामदगी दर्शाई थी।
ढाबे से उठाने और मारपीट का आरोप
शिकायत के अनुसार पुलिसकर्मी ढाबे पर पहुंचे थे। आरोप है कि वहां मौजूद कर्मचारी के साथ मारपीट की गई और उसका मोबाइल फोन छीन लिया गया। इसके बाद अनिल शर्मा को भी जबरन अपने साथ ले जाया गया। पुलिस ने बाद में 97.70 ग्राम चरस बरामद दिखाते हुए उसके खिलाफ NDPS एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया।
शिकायतकर्ता ने पुलिस की कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल उठाए। आरोप है कि पुलिसकर्मी अगले दिन फिर ढाबे पर पहुंचे और वहां लगे CCTV कैमरों की फुटेज डिलीट कर दी। ढाबे में रखे रजिस्टर के कुछ पन्ने फाड़े जाने का आरोप भी लगाया गया है।
मौके पर नहीं मिली चरस, चौकी पर दिखाई बरामदगी?
मामले की शुरुआती जांच में सामने आए तथ्यों ने पुलिस की बरामदगी की कहानी पर सवाल खड़े किए। जांच में यह दावा सामने आया कि अनिल शर्मा के पास से मौके पर चरस नहीं मिली थी और बाद में पुलिस चौकी पर बरामदगी दर्शाई गई।
जांच के दौरान जनरल डायरी समेत पुलिस के अन्य दस्तावेजों में कथित हेरफेर की बात भी सामने आई। CCTV फुटेज का मामला जांच में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि आरोप है कि घटना से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जानबूझकर मिटाए गए।
2020 में हाईकोर्ट ने CBI जांच का रास्ता खोला
मामला सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 में CBI से प्रारंभिक जांच कराई थी। प्रारंभिक जांच के आधार पर 19 अगस्त 2020 को पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया था।
इसके बाद CBI ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। इनमें आपराधिक साजिश, गलत दस्तावेज तैयार करना, झूठा मुकदमा गढ़ना, साक्ष्य मिटाना, मारपीट और अवैध रूप से हिरासत में रखने से संबंधित धाराएं शामिल थीं। इस कार्रवाई में सब-इंस्पेक्टर प्रकाश चंद्र तामता समेत अन्य पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए थे।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
CBI की जांच को पुलिसकर्मियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। वर्ष 2024 में जांच के एक हिस्से पर रोक भी लगी। हालांकि बाद में याचिका वापस ले ली गई और मामला दोबारा हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा। इस तरह वर्ष 2020 में शुरू हुआ यह विवाद करीब छह वर्ष तक कानूनी प्रक्रिया में उलझा रहा।
11 अगस्त 2026 के आदेश से फिर बदली जांच की दिशा
मामले में निर्णायक मोड़ 11 अगस्त 2026 को आया। हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए राज्य पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं जताया। कोर्ट ने माना कि जब आरोप पुलिसकर्मियों के खिलाफ ही हों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हों, तब उसी पुलिस तंत्र से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा।
इसके बाद हाईकोर्ट ने मूल NDPS मामले के साथ पुलिसकर्मियों पर लगाए गए ज्यादती, फर्जी मुकदमा बनाने और साक्ष्य से छेड़छाड़ के आरोपों से संबंधित मामले को CBI को स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
अब CBI के सामने दो अहम सवाल
इस मामले की आगे की जांच मुख्य रूप से दो बिंदुओं के इर्द-गिर्द रहेगी। पहला यह कि क्या 97.70 ग्राम चरस वास्तव में अनिल शर्मा के कब्जे से बरामद हुई थी?
दूसरा यह कि यदि बरामदगी पुलिस की कार्रवाई का हिस्सा नहीं थी तो क्या CCTV फुटेज, रजिस्टर और पुलिस दस्तावेजों समेत महत्वपूर्ण साक्ष्यों को जानबूझकर मिटाया या बदला गया? इन सवालों के जवाब मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में महत्वपूर्ण होंगे।
पुलिस ने आरोपों से अलग बताई थी कार्रवाई की कहानी
दूसरी ओर पुलिस का पक्ष शिकायतकर्ता के आरोपों से अलग रहा है। पुलिस के अनुसार ढाबे पर चरस और शराब की बिक्री होने की गोपनीय सूचना मिली थी। इसी सूचना के आधार पर कार्रवाई की गई और चरस बरामद की गई।
पुलिस ने CCTV फुटेज को भी आंशिक और बिना ऑडियो वाला बताया था। शिकायतों को बाद में वापस लिए जाने का तर्क भी पुलिस की ओर से दिया गया। हालांकि हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और पुलिस के खिलाफ लगे आरोपों को देखते हुए राज्य पुलिस की जांच को पर्याप्त नहीं माना और CBI जांच का आदेश दिया।
छह साल बाद फिर खुलेगी केस की हर परत
अब छह वर्ष पुराने इस मामले की जांच CBI के जिम्मे है। जांच अधिकारी के रूप में सबहैश चंदर, डायरेक्टर/एसपी स्तर के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई है।
CBI अब कथित बरामदगी की पूरी प्रक्रिया, पुलिस रिकॉर्ड, केस डायरी, जनरल डायरी में दर्ज घटनाक्रम, CCTV फुटेज और उसके डिलीट किए जाने के आरोपों की पड़ताल कर सकती है। घटना के समय ढाबे पर मौजूद लोगों और संबंधित पुलिसकर्मियों के बयान भी जांच में अहम हो सकते हैं।
यानी वर्ष 2020 में शुरू हुआ मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज कथित चरस बरामदगी का मुकदमा नहीं रह गया है। छह साल बाद इसकी जांच का केंद्र खुद पुलिस की कार्रवाई, बरामदगी की वास्तविकता और कथित साक्ष्य मिटाने के आरोप बन गए हैं।



