पूर्व सैन्य अधिकारियों समेत 16 आरोपियों के खिलाफ दून पुलिस को नहीं मिले प्रमाण, डिफेंस कॉलोनी भूमि प्रकरण में एफआर
183.89 एकड़ जमीन पर 680 भूखंडों से शुरू हुआ मामला, 1991 तक संख्या 769 पहुंची, 125 सदस्यों को 18,281 वर्गमीटर भूमि आवंटन की भी हुई जांच

Aryan Walia, Dehradun: देहरादून में डिफेंस कॉलोनी की जमीन और भूखंडों के आवंटन से जुड़े बहुचर्चित मामले में पुलिस ने 16 नामजद आरोपितों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल कर दी है। नेहरू कालोनी थाने में दर्ज प्राथमिकी संख्या 0055/2025, दिनांक 9 फरवरी 2025, में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। विवेचना में पुलिस ने जमीन के मूल लेआउट, अतिरिक्त भूखंडों के आवंटन, समिति के प्रस्तावों, सदस्यों को भूमि आवंटन और संबंधित दस्तावेजों की जांच की।
16 लोग नामजद, लेकिन आरोपपत्र नहीं
मामले में द सैनिक सहकारी आवास समिति लिमिटेड, डिफेंस कॉलोनी के तत्कालीन पदाधिकारियों समेत 16 लोगों को नामजद किया गया था। जिनमें सेवानिवृत्त कर्नल आरएस कली, तत्कालीन प्रशासक वीरभान सिंह, सेवानिवृत्त कर्नल एसएम गुसाईं, सेवानिवृत्त कर्नल आरएस पैन्यूली, पूर्व कैप्टन टीपी कुंडलिया, सेवानिवृत्त कर्नल एसएल पैन्यूली, सेवानिवृत्त कमांडेंट एसएस रावत, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल एएस कंडारी, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल पीएस राणा, सेवानिवृत्त पीओएमए वीके नौटियाल, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल सीपी सती, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल जीएस बिष्ट, सेवानिवृत्त स्क्वाड्रन लीडर एसएस बिष्ट, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल एएस बिष्ट, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल एसपी नेगी और सेवानिवृत्त मेजर एमएस नेगी के नाम शामिल हैं।
680 भूखंडों से शुरू हुआ सफर, संख्या 769 तक पहुंची
पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में डिफेंस कॉलोनी की जमीन का पूरा इतिहास भी दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 1968 के मूल मानचित्र में 183.89 एकड़ भूमि पर 680 भूखंडों का प्रावधान था। इनमें 53 प्रतिशत भूखंड काटे गए थे, जबकि 47 प्रतिशत भूमि खाली छोड़ी गई थी।
इसके बाद वर्ष 1967 से 1986 के बीच 48 अतिरिक्त भूखंड काटे गए। वर्ष 1986 में समिति ने अतिरिक्त भूखंडों को शामिल करते हुए लेआउट योजना मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण को दी। इससे भूखंडों की संख्या 728 हो गई।
वहीं, वर्ष 1986 से 1991 के बीच समिति की आम सभा में पारित प्रस्तावों के आधार पर 41 और अतिरिक्त भूखंड काटे गए। इस तरह कुल भूखंडों की संख्या 769 तक पहुंच गई। रिपोर्ट में समिति की जमीन का उपयोग सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की आवासीय जरूरतों के लिए किए जाने तथा समिति में 769 परिवारों के सदस्य के रूप में पंजीकृत होने का भी उल्लेख है।
125 सदस्यों को 18,281 वर्गमीटर भूमि का आवंटन
विवेचना के दौरान समिति की ओर से 125 सदस्यों को कुल 18,281 वर्गमीटर भूमि रियायती दर पर आवंटित किए जाने की बात सामने आई। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार यह भूमि सार्वजनिक अथवा मनोरंजन उपयोग के लिए आरक्षित भूमि नहीं थी, बल्कि समिति की सीमा में स्थित भूमि थी।
इन भूखंडों का उपनिबंधक, देहरादून के कार्यालय में संबंधित सदस्यों के नाम पंजीकरण कराया गया। इसके एवज में प्राप्त धनराशि समिति के खाते में जमा कराई गई। यही भूमि आवंटन शिकायत और पुलिस जांच का प्रमुख हिस्सा रहा।
तीन शिकायतकर्ताओं ने उठाए थे सवाल
मामले में कर्नल सेवानिवृत्त रमेश प्रसाद सिंह, लेफ्टिनेंट कर्नल सेवानिवृत्त त्रिजीवन सिंह पयाल और विजय मोहन नाथ शिकायतकर्ताओं के रूप में सामने आए। शिकायत में समिति की जमीन, अतिरिक्त भूखंडों के आवंटन और उससे संबंधित दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए गए थे। पुलिस ने विवेचना के दौरान शिकायत से जुड़े दस्तावेजों के साथ पूर्व में हुई न्यायिक और विभागीय कार्यवाही को भी जांच का हिस्सा बनाया।
हाईकोर्ट से सहकारी विभाग तक पहुंचा मामला
रिपोर्ट के अनुसार मामले से संबंधित जनहित याचिका संख्या 133/2021 हाईकोर्ट में दाखिल हुई थी, जिसे 3 सितंबर 2024 को प्रथम सुनवाई के दिन खारिज कर दिया गया। इसके बाद निबंधक सहकारी समितियां, उत्तराखंड के स्तर पर भी वाद संख्या 113/2024, दिनांक 27 नवंबर 2024 में मामले पर विचार किया गया।
पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में दर्ज है कि निबंधक ने अभिलेखों की जांच के बाद समिति के लेआउट मानचित्र के मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण से स्वीकृत होने, अतिरिक्त भूखंडों और सामुदायिक भवन से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया। रिपोर्ट में इन मामलों में विकास प्राधिकरण के स्तर से कार्रवाई से संबंधित तथ्य भी दर्ज किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
विवेचना में सहकारी आवास समितियों से संबंधित कानूनी स्थिति समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जोरास्ट्रियन कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड बनाम जिला सहकारी समितियां पंजीयक मामले में 15 अप्रैल 2005 को दिए गए निर्णय समेत अन्य न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया गया है। समिति की सदस्यता, भूखंड आवंटन और हस्तांतरण से जुड़े कानूनी पहलुओं को भी जांच में शामिल किया गया।
पुलिस का निष्कर्ष: धोखाधड़ी, कूटरचना और षड्यंत्र का पर्याप्त साक्ष्य नहीं
विवेचना के बाद पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि डिफेंस कॉलोनी के अधिकांश भूखंड पहले ही आवंटित किए जा चुके थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि मुकदमे में नामजद किए गए लोगों में से कोई भी उस समय समिति का सदस्य नहीं था, जब संबंधित आवंटन किए गए थे।
पुलिस के अनुसार शिकायतकर्ताओं की ओर से समिति द्वारा धोखाधड़ी, जालसाजी अथवा आपराधिक षड्यंत्र किए जाने का कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। विवेचना में सामने आए अभिलेखों से भी धारा 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत अपराध का प्रकाश में आना नहीं पाया गया। इसी आधार पर पुलिस ने साक्ष्य के अभाव में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए न्यायालय से इसे स्वीकार करने का अनुरोध किया है।
अंतिम रिपोर्ट जांच अधिकारी उपनिरीक्षक आशीष कुमार, थाना नेहरू कालोनी, देहरादून की ओर से तैयार की गई है। रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जा चुकी है। ऐसे में अंतिम रूप से मामले का निस्तारण न्यायालय द्वारा अंतिम रिपोर्ट पर लिए जाने वाले निर्णय के बाद ही माना जाएगा।



