Uttarakhand

वन विभाग में इन वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती और कैडर प्रबंधन में मनमानी!

पदो के दोहरे प्रभार और नियमों पर सवाल, प्रमुख सचिव से कार्रवाई की मांग

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड के वन विभाग में भारतीय वन सेवा (IFS) के वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती और कैडर प्रबंधन को लेकर गंभीर प्रशासनिक एवं वैधानिक सवाल उठाए गए हैं। एक IFS अधिकारी ने प्रमुख सचिव, वन को भेजे अभ्यावेदन में आरोप लगाया है कि कई पदों पर दोहरा या अतिरिक्त प्रभार देने की व्यवस्था निर्धारित सेवा नियमों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने संबंधित सरकारी आदेशों की समीक्षा कर अनियमितताओं को दूर करने और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।

अभ्यावेदन में भारतीय वन सेवा (कैडर) नियम, 1966, भारतीय वन सेवा (वेतन) नियम, 2016, अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 सहित विभिन्न प्रावधानों का हवाला दिया गया है। पत्र में सवाल उठाया गया है कि जब किसी पद के लिए निर्धारित जिम्मेदारियां, रिपोर्टिंग व्यवस्था और नियामक शक्तियां अलग-अलग हैं, तो एक ही अधिकारी को एक साथ कई पदों का प्रभार देने की व्यवस्था किस आधार पर लागू की जा रही है। यह मामला केवल अधिकारियों के बीच पदों के बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसमें वन्यजीव संरक्षण, सरकारी संस्थाओं के नियमन, विभागीय निर्णयों की निष्पक्षता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। अब प्रमुख सवाल यह है कि शासन इन आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराएगा या संबंधित व्यवस्थाएं पहले की तरह जारी रहेंगी।

एक अधिकारी, कई पद: प्रभार व्यवस्था पर सवाल

अभ्यावेदन में IFS अधिकारी डॉ. नीना ग्रेवाल की तैनाती का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वह प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) के कैडर पद के साथ मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के वैधानिक पद का दायित्व भी संभाल रही थीं। पत्र में उत्तराखंड वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने का भी उल्लेख है। पत्र प्रस्तुत करने वाले अधिकारी का तर्क है कि इस प्रकार एक अधिकारी पर अलग-अलग प्रकृति और स्तर के कई दायित्व एक साथ केंद्रित होने से कैडर प्रबंधन और संस्थागत जवाबदेही प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या ऐसी व्यवस्था निर्धारित नियमों के तहत अनुमन्य है और यदि इसे अस्थायी व्यवस्था बताया जाता है, तो क्या इसके लिए आवश्यक स्वीकृति तथा निर्धारित समयसीमा का पालन किया गया? यहां सरकार को स्पष्ट करना होगा कि संबंधित नियुक्तियां किन आदेशों के आधार पर की गईं, प्रत्येक पद के लिए कौन-सा नियम लागू हुआ और क्या आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किए गए थे।

वन्यजीव संरक्षण में नियामक और प्रशासनिक भूमिकाओं के टकराव का मुद्दा

पत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वैधानिक दायित्वों और प्रशासनिक हितों के संभावित टकराव का है। अभ्यावेदन में तर्क दिया गया है कि मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का पद वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत महत्वपूर्ण शक्तियों और जिम्मेदारियों से जुड़ा है। इनमें संरक्षित क्षेत्रों में गतिविधियों की अनुमति, वन्यजीव संरक्षण से संबंधित निर्णय और कानून के प्रवर्तन से जुड़े दायित्व शामिल हो सकते हैं। पत्र में यह आशंका जताई गई है कि यदि किसी अधिकारी के पास नियामक भूमिका के साथ ऐसी संस्था का प्रशासनिक या वित्तीय प्रभार भी हो, जिसके कार्यों या गतिविधियों का नियमन किया जाना है, तो हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।

जैव विविधता बोर्ड और वन पंचायत के प्रभार पर भी आपत्ति

अभ्यावेदन में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन पंचायत) के पद पर कार्यरत अधिकारी एसपी सुबुद्धि के पास उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार होने का भी उल्लेख किया गया है। पत्र में जैव विविधता बोर्ड की नियामक और प्रशासनिक भूमिका को अलग-अलग संस्थागत जिम्मेदारियों के संदर्भ में देखने की मांग की गई है। अधिकारी का तर्क है कि अलग-अलग कार्यक्षेत्रों वाले पदों को एक साथ सौंपने की वैधानिकता, स्वीकृति और कार्यात्मक प्रभाव की समीक्षा की जानी चाहिए। इस मामले में सरकार को संबंधित आदेशों, पदों की अधिसूचित स्थिति और लागू नियमों के आधार पर स्पष्ट करना होगा कि प्रभार व्यवस्था किस प्रक्रिया से लागू की गई और उसकी समीक्षा कब की गई।

सरकारी आदेशों की वैधता पर सीधा सवाल

अभ्यावेदन में 29 नवंबर 2021 के शासनादेश का विशेष उल्लेख है। पत्र के अनुसार, इस आदेश में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के लिए अलग-अलग रिपोर्टिंग चैनल निर्धारित किए गए हैं। इसमें प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के पदों की अलग रिपोर्टिंग व्यवस्था का हवाला देते हुए एक ही अधिकारी के पास दोनों दायित्व होने पर सवाल उठाया गया है। अधिकारी ने यह भी तर्क दिया है कि कैडर पदों पर नियुक्ति, अस्थायी प्रभार और निर्धारित समयसीमा से आगे जारी व्यवस्थाओं के लिए संबंधित नियमों एवं सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति का पालन जरूरी है। पत्र में 14 जनवरी 2023, 3 अप्रैल 2026 और 5 अगस्त 2026 से संबंधित सरकारी आदेशों की समीक्षा व कुछ व्यवस्थाओं को वापस लेने या समाप्त करने की मांग भी की गई है।

पदों का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग

पत्र में कैडर उपयोग का विवरण तैयार करने और संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति, पदस्थापना, वेतन स्तर, अतिरिक्त प्रभार व लागू नियमों की जानकारी दर्ज करने की मांग की गई है। इस मांग का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी पद पर अधिकारी की तैनाती केवल प्रशासनिक आदेश जारी करने तक सीमित नहीं होती। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पद स्वीकृत है या एक्स-कैडर, उस पर नियमित नियुक्ति हुई है या अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, प्रभार कितने समय से चल रहा है और आवश्यक अनुमोदन प्राप्त हैं या नहीं।

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