
Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने उनके खिलाफ देहरादून के कैंट थाने में दर्ज मुकदमे को निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में लगाए गए आरोप सामान्य वैवाहिक विवाद से कहीं अधिक गंभीर हैं। इनमें मारपीट, धोखाधड़ी, दस्तावेजों की कूटरचना, जातिसूचक अपमान और जान से मारने की साजिश जैसे संज्ञेय अपराध शामिल हैं। ऐसे में इस स्तर पर प्राथमिकी निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता।
मामले में कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ देहरादून के कैंट थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धाराओं 120-बी, 323, 420, 467, 468, 471, 495, 498-ए, 504 और 506 के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया था। शिकायत में रेखा आर्य ने आरोप लगाया कि शादी के समय साहू ने अपनी पहली शादी और बच्चों से जुड़ी जानकारी छिपाई थी। बाद में अन्य महिलाओं से संबंध रखने और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई। उन्हें गालीगलौज के साथ जातिसूचक अपमानजनक टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा।
शिकायत में कंपनी से जुड़े दस्तावेजों में कथित हेराफेरी का आरोप भी लगाया गया है। रेखा आर्य के अनुसार, उनके फर्जी हस्ताक्षर कर दस्तावेज तैयार किए गए और उन्हें कंपनी के निदेशक पद से जबरन सेवानिवृत्त दिखा दिया गया, जबकि उन्होंने कभी इस्तीफा नहीं दिया था। इसके अलावा एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया कि उसमें साहू उन्हें रास्ते से हटाने यानी हत्या की साजिश रचने और इसके लिए धन खर्च करने की बात कर रहे हैं। इन आरोपों को आधार बनाकर रेखा आर्य ने कानूनी कार्रवाई की मांग की थी।
दूसरी ओर, हाई कोर्ट में याचिका दायर कर गिरधारी लाल साहू के अधिवक्ताओं ने मुकदमे को निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की। बचाव पक्ष का तर्क था कि दोनों का विवाह जुलाई 2004 में हुआ था और वे करीब 22 वर्षों से साथ रह रहे हैं। ऐसे में यह मूल रूप से घरेलू और वैवाहिक विवाद का मामला है, जिसे अब आपराधिक रूप दिया जा रहा है। वहीं, राज्य सरकार के सरकारी अधिवक्ता और रेखा आर्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता जांच में भी सहयोग नहीं कर रहा है।
मिनी ट्रायल नहीं कर सकती अदालत
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता कि दोनों पक्ष लंबे समय से वैवाहिक रिश्ते में हैं। 22 वर्षों का संबंध होने से बाद में हुई कथित क्रूरता और अन्य अपराधों की संभावना समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट ने यह भी माना कि ऑडियो रिकॉर्डिंग की वास्तविकता और कथित फर्जी दस्तावेजों की सत्यता जांच तथा मुकदमे के दौरान तय होने वाले विषय हैं।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के भजनलाल और निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर मामलों में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिकी निरस्त करने के स्तर पर अदालत साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर मिनी ट्रायल नहीं कर सकती। जब प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराध सामने आते हैं तो केवल आरोपों के आधार पर जांच को रोकना उचित नहीं है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने मुकदमा निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। मामले में हाई कोर्ट ने पिछले दिन सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।



