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फर्जी रजिस्ट्री की नकल पर हाईकोर्ट तक सुनवाई, शक नहीं ?

फर्जी रजिस्ट्री को असल रूप देकर नकल की सत्यापित प्रति देने वाले प्रभारी अधिकारी पुलिस की जांच से अभी बाहर, इसी नकल के बूते संभव हो सका फर्जीवाड़ा

Round The Watch: देहरादून में फर्जी रजिस्ट्री प्रकरण में अभी विशेष जांच दल (एसआईटी) केवल छोटी मछलियों को पकड़ कर अपनी पीठ थपथपा रही है। यदि कानूनी पहलू और पुलिसिया कहानी को न्यायिक नजर से देखा जाए तो अभी तक का सफर सारी रात चले और अढ़ाई कोस पहुंचे कहावत जैसा नजर आता है l क्योंकि, नकल के आधार पर पक्षकार हाईकोर्ट तक फर्जी दस्तावेज पर दावेदारी कर मुकदमा भी लड़ आए और जज साहब ने फैसला भी सुनाया। कानून के जानकारों का मानना है कि अभिलेखागार से नकल जारी होने के बाद उस पर शक की कोई गुंजाइश नहीं होती है।
आइए जानते हैं, सरकारी अभिलेखागार से जारी नकल को असल क्यों माना जाता है और इसे जारी करने की जिम्मेदारी किसकी होती है।
पुलिस की अब तक की कहानी में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ही अभियुक्त, वरिष्ठ अधिवक्ता कमल विरमानी को मास्टर माइंड और केपी सिंह को इस फर्जीवाड़े की फिल्म का अदाकार बताया जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह भी है कि उन फर्जी दस्तावेज को असल रूप देने का काम किसी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी या किसी वकील अथवा मुंशी का कैसे हो सकता है? नियम व प्रशासनिक व्यवस्था के मुताबिक किसी भी फर्जी दस्तावेज को असल रूप देने का काम अभिलेखागार के प्रभारी अधिकारी या सब रजिस्ट्रार, जिसके कब्जे/नियंत्रण में अभिलेखागार की चाभी रहती है, उनके होने के प्रबल आसार अधिक हैं । दस्तावेज की नकल का आवेदन प्राप्त होने पर उसकी नकल तैयार करने का काम संबंधित बाबू और मिलान करने वाले बाबू और प्रभारी अधिकारी का होता है। इन्हीं के संयुक्त हस्ताक्षर से नकल जारी की जाती है। इन जिम्मेदार कार्मिकों के संयुक्त हस्ताक्षर के बाद जाकर मूल दस्तावेज के असल बराबर की नकल बनकर तैयार होती है। ऐसा ही इन सभी प्रकरणों में हुआ। किंतु, अभी तक नकल की असल सत्यापित प्रतिलिपि जारी करने वाले किसी भी बाबू या प्रभारी अधिकारी तक पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाए या कह सकते हैं कि पुलिस इन पर हाथ नहीं डाल पा रही है ।

रजिस्ट्री फर्जीवाड़ा पकड़ में आने के बाद जिलाधिकारी सोनिका ने रिकार्ड रूम का औचक निरीक्षण किया था। राउंड द वाच आर्काइव

रिकार्ड रूम की चाभी प्रभारी अधिकारी के हाथ होती है, अकेला चपरासी नहीं घुस सकता
रजिस्ट्री फर्जीवाड़े में सब रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकार्ड रूम में सेंधमारी कर मूल अभिलेख की जगह फर्जी दस्तावेज दर्ज किए गए हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि रिकार्ड रूम जैसे अति संवेदनशील व अति सुरक्षित कक्ष में अकेले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कैसे घुसपैठ कर सकता है। या कोई भी बाहरी व्यक्ति की पहुंच भी आसान नहीं। क्योंकि, राजस्व मैनुअल के अनुसार रिकार्ड रूम की चाभी और उसके प्रयोग का दायित्व प्रभारी अधिकारी के पास होता है l

चपरासी अकेला रिकॉर्ड रूम में नही घुस सकता
ऐसा लगता है कि पुलिस भारतीय रजिस्ट्रेशन एक्ट-1908 और राजस्व मैनुअल का अध्यन किए बिना ही आगे बढ़ रही है। ऐसे में कमजोर पटकथा के चलते यह कहानी तर्क और हकीकत पर चलने वाले कानूनी दांव-पेच के आगे फ्लॉप हो सकती है। तर्क यह कहते हैं कि जो सत्य प्रतिलिपि सरकार के विभाग जारी करते हैं, उसके आधार पर ही उच्च न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट या अन्य न्यायालय निर्णय करते हैं। इस प्रकरण में भी ऐसा हो चुका। सत्य प्रतिलिपि सरकारी विभाग से जारी होने के बाद असल मानी जाती है, जिसके आधार पर वाद योजित कर अपना पक्ष रखने का अधिकार कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। हां, यदि कूटरचित दस्वेताज की नकल बनाकर सत्य प्रतिलिपि जारी की गई है तो पहला दोषी सत्य प्रतिलिपि जारी करने वाला प्रभारी अधिकारी है, न कि कोई अन्य। न ही सत्य प्रतिलिपि के आधार पर सुनवाई कर निर्णय देने या अमल करने वाले लेखपाल, तहसीलदार, उपजिलाधिकारी, अन्य प्रशासनिक अधिकारी, अधिवक्ता या कोई न्यायाधीश।

प्रस्तुति: अजय ‘अनपढ़’
नोट: यह लेखक का अपना नजरिया है।

सब रजिस्ट्रार कार्यालय पर मेहरबानी क्यों: बार एसोसिएशन

अनिल शर्मा, अध्यक्ष (बार एसोसिएशन, देहरादून )

देहरादून बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल शर्मा का कहना है कि एसआईटी की जांच में क्यों अब तक सब रजिस्ट्रार कार्यालय पर मेहरबानी की जा रही है। जिन जिम्मेदार कार्मिकों ने फर्जी रजिस्ट्रियों की नकल की सत्यापित प्रतिलिपि जारी की, उन्हें आपराधिक षड्यंत्र में आरोपी क्यों नहीं बनाया जा रहा। यदि सब रजिस्ट्रार कार्यालय अपने रिकॉर्ड की सुरक्षा ढंग से करता या फर्जी अभिलेखों को सत्य बताकर उनकी नकल जारी नहीं करता तो यह खेल किसी के लिए भी संभव नहीं हो पाता। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल शर्मा ने जिलाधिकारी सोनिका का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी सक्रियता से रजिस्ट्री फर्जीवाड़ा बिना किसी लागलपेट के बाहर निकल पाया है। अन्यथा सब रजिस्ट्रार कार्यालय के अधिकारी इसी तरह फर्जी रजिस्ट्री को असली बताकर नकल जारी करते और सभी अधिकारी व विभिन्न न्यायालय इन्हें असली मानकर निर्णय पारित करते रहते। साथ ही जिलाधिकारी सोनिका के प्रयास से सहारनपुर से दशकों पुराने राजस्व के रिकॉर्ड देहरादून लाए जा सके। इससे भी फर्जीवाड़े पर अंकुश लगेगा।

 

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