21 साल बाद खुला फर्जी वसीयत और करोड़ों की संपत्ति हड़पने का मामला, देहरादून में 04 लोगों पर मुकदमा दर्ज
कुंवर चंद्र बहादुर की संपत्ति से जुड़ा है मामला, दत्तक पुत्री उपासना मेहता के अधिकारों से जुड़ा मामला

Amit Bhatt, Dehradun: देहरादून में करीब ढाई दशक पुराने संपत्ति विवाद ने अब आपराधिक मामले का रूप ले लिया है। कोतवाली नगर पुलिस ने फर्जी वसीयत तैयार कर संपत्ति हड़पने, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में 04 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। मामला दिवंगत कुंवर चंद्र बहादुर सिंह की संपत्तियों और उनकी दत्तक पुत्री मानी जाने वाली उपासना मेहता के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
कोतवाली देहरादून में एफआईआर संख्या 0248 दिनांक 9 जुलाई 2026 में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया है। शिकायत अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी निवासी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मार्ग, धर्मपुर, देहरादून ने दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता ने स्वयं को बेंगलुरु निवासी उपासना मेहता का पंजीकृत मुख्तारआम बताया है।
एफआईआर के अनुसार उपासना मेहता बचपन से स्वर्गीय कुंवर चंद्र बहादुर सिंह के साथ रहती थीं और उन्हें दत्तक पुत्री की तरह माना जाता था। न्यायालय ने चंद्र बहादुर सिंह को उपासना का संरक्षक नियुक्त किया था। 9 सितंबर 2001 को चंद्र बहादुर सिंह के निधन के समय उपासना की उम्र करीब 9 से 10 वर्ष बताई गई है। उनके निधन के बाद कमल प्रसाद को उपासना का संरक्षक बनाया गया।
शिकायत के मुताबिक वर्ष 2023 में उपासना मेहता को जानकारी मिली कि चंद्र बहादुर सिंह ने अपनी वसीयत में बड़ी मात्रा में संपत्ति उनके नाम छोड़ी थी। इस वसीयत के निष्पादक अधिवक्ता मनोजित सिन्हा थे। बाद में मनोजित सिन्हा ने मूल वसीयत जिला जज न्यायालय में जमा कर दी और स्वयं को निष्पादक पद से अलग करने की इच्छा जताई। 25 नवंबर 2025 को मनोजित सिन्हा का निधन हो गया।
एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि चंद्र बहादुर सिंह ने अपने जीवनकाल में “उपासना मेहता ट्रस्ट” का गठन किया था और ट्रस्ट के नाम बैंक ऑफ बड़ौदा में खाता संचालित होता था। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस खाते में पांच लाख रुपये से कहीं अधिक राशि थी, लेकिन वर्ष 2019 में कमल प्रसाद ने करीब पांच लाख रुपये निकालकर खाता बंद करा दिया और खाते की पूरी रकम हड़प ली।
मामले का सबसे गंभीर आरोप कथित फर्जी वसीयत को लेकर है। शिकायत में कहा गया है कि चंद्र बहादुर सिंह ने 21 अगस्त 2001 को एक वसीयत तैयार की थी, जिसे 31 अगस्त 2001 को पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया और उसका पंजीकरण 1 सितंबर 2001 को हुआ। इसके बावजूद उनकी मृत्यु के बाद 2 सितंबर 2001 की तारीख वाली एक दूसरी वसीयत तैयार कर दी गई, जिसके आधार पर उनकी संपत्तियां कमल प्रसाद और कुमुद वैद्य ने अपनी मां और मौसी के नाम करवा लीं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह वसीयत चंद्र बहादुर सिंह की मृत्यु के बाद तैयार की गई और इसका कभी पंजीकरण भी नहीं हुआ।
एफआईआर में यह भी कहा गया है कि इस कथित फर्जी वसीयत के गवाह के रूप में उदशी और जगराज मान को दर्शाया गया। वहीं, पहले की वैध वसीयत के तहत कुछ संपत्तियां आरती कुमार निवासी ग्रीन पार्क, देहरादून के पुत्र और पुत्री के नाम भी छोड़ी गई थीं। शिकायत के अनुसार उस संबंध में कुमुद वैद्य और आरती कुमार पक्ष के बीच मुकदमा चला और बाद में कथित तौर पर चाय बागान की जमीन तथा लगभग 12 लाख रुपये देकर समझौता किया गया।
शिकायतकर्ता ने कमल प्रसाद, कुमुद वैद्य, उदशी और जगराज मान पर सुनियोजित साजिश के तहत जाली दस्तावेज तैयार कर संपत्तियों की बिक्री और हेराफेरी का आरोप लगाया है। तहरीर में यह भी उल्लेख किया गया है कि कमल प्रसाद और अन्य आरोपियों के खिलाफ पूर्व में भी जालसाजी के मामले चलने का दावा किया गया है। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
पुलिस ने इस मामले में आरोपी बनाए गए लोगों के नाम क्रमशः कमल प्रसाद निवासी 8-बी लक्ष्मी रोड, देहरादून, कुमुद वैद्य पत्नी दीपक वैद्य निवासी 251 सूरज अपार्टमेंट्स, वॉकेश्वर मार्ग, मुंबई, उदशी निवासी 30 मोहिनी रोड, देहरादून तथा जगराज मान निवासी 7 लक्ष्मी रोड, देहरादून बताए हैं।
कोतवाली देहरादून पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच उपनिरीक्षक संदीप कुमार को सौंपी है। थाना प्रभारी निरीक्षक कैलाश चंद्र भट्ट के हस्ताक्षर से दर्ज इस मुकदमे में अब दो दशक पुराने संपत्ति हस्तांतरण, वसीयत और बैंक खातों से जुड़े दस्तावेजों की जांच होगी। जांच के निष्कर्ष तय करेंगे कि यह वास्तव में करोड़ों की संपत्ति पर कब्जे का सुनियोजित खेल था या फिर लंबे समय से चला आ रहा पारिवारिक और उत्तराधिकार विवाद।



