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डीएम ने बिल्डर को लाभ पहुंचाने को दिया आदेश, हाई कोर्ट ने किया निरस्त

देहरादून की पिनेकल रेजिडेंसी में फायर सेफ्टी पर हाईकोर्ट सख्त, पत्रावली दोबारा सुनवाई के लिए लौटाई

Rajkumar Dhiman, Dehradun: राजधानी देहरादून के जाखन स्थित बहुमंजिला आवासीय परिसर पिनेकल रेजिडेंसी में अग्नि सुरक्षा मानकों को लेकर चले लंबे विवाद में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने देहरादून जिलाधिकारी की ओर से बिल्डर के पक्ष में दिया गया आदेश निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है। अदालत ने कहा कि केवल बिल्डर के प्रस्तुत वीडियो के आधार पर फायर एनओसी जारी करने का आदेश देना कानून और सुरक्षा दोनों दृष्टि से उचित नहीं था। प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी अधिवक्ता अभिजय नेगी ने की।

86 फ्लैटों वाले परिसर में उठा था सुरक्षा का सवाल
याचिका पिनेकल रेजिडेंसी अपार्टमेंट्स ओनर्स एसोसिएशन ने दाखिल की थी। जाखन स्थित इस समूह आवास परियोजना में कुल 86 फ्लैट और स्टूडियो अपार्टमेंट हैं, जिनमें 3 बीएचके, 4 बीएचके, पेंटहाउस और स्टूडियो यूनिट शामिल हैं। लगभग 30 मीटर ऊंची इस इमारत का निर्माण देहरादून की कंपनी दिशा हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने किया था। निवासियों का आरोप था कि बिल्डर ने स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण किया और अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया।

पहले भी हाईकोर्ट पहुंच चुके थे निवासी
वर्ष 2021 में भी निवासियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि कुछ निर्माण कार्य एमडीडीए से स्वीकृत नक्शे के विपरीत किए गए हैं और फायर सेफ्टी कानूनों का उल्लंघन हुआ है। उस समय हाईकोर्ट ने एमडीडीए और संबंधित अधिकारियों को मुख्य अग्निशमन अधिकारी की सिफारिशों के आधार पर आवश्यक कार्रवाई करने और जरूरी फायर फाइटिंग सुविधाएं स्थापित कराने के निर्देश दिए थे।

मॉक ड्रिल में सामने आईं गंभीर कमियां
अग्निशमन विभाग ने परिसर में फायर मॉक ड्रिल कर कई गंभीर खामियां पाई थीं। मुख्य अग्निशमन अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार परिसर के उत्तरी प्रवेश द्वार के पास आरसीसी स्लैब और पिलर बने हुए थे, जिससे फायर टेंडर का प्रवेश प्रभावित हो रहा था। ‘ए’ ब्लॉक के सामने बने बगीचे और रैंप की अधिक ढलान के कारण दमकल वाहन वहां तक नहीं पहुंच पा रहे थे। ‘बी’ और ‘सी’ ब्लॉक के पीछे पर्याप्त खुला स्थान नहीं था, जिससे बड़े अग्निशमन वाहन नहीं जा सकते थे। पीछे के हिस्से में लगाए गए गार्डन प्लांटरों ने रास्ते की चौड़ाई कम कर दी थी। परिसर के प्रवेश द्वार पर केवल 3.70 मीटर ऊंचाई पर लटक रही बिजली लाइन के कारण हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म वाहन अंदर नहीं जा सका।

समझें क्या है तकनीकी समस्या
1. आरसीसी स्लैब क्या करता है?
आरसीसी यानी रिइन्फोर्स्ड सीमेंट कंक्रीट। यह लोहे और कंक्रीट से बना मजबूत ढांचा होता है। यदि ऐसा ढांचा प्रवेश मार्ग या खुली जगह पर बना हो तो बड़े दमकल वाहनों की आवाजाही रुक सकती है।

2. फायर टेंडर के लिए खुला रास्ता क्यों जरूरी है?
ऊंची इमारतों में आग लगने पर केवल पानी की गाड़ी नहीं बल्कि हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म, सीढ़ी वाहन और अन्य भारी उपकरण भी मौके पर पहुंचते हैं। यदि रास्ता संकरा हो या ढलान अधिक हो तो ये वाहन इमारत के पास नहीं पहुंच पाते।

3. हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म क्या होता है?
यह एक विशेष वाहन होता है जिसमें ऊंची उठने वाली सीढ़ी या प्लेटफॉर्म लगा होता है। इसका उपयोग ऊपरी मंजिलों में फंसे लोगों को निकालने और ऊंचाई पर आग बुझाने में किया जाता है। यदि बिजली की तारें या अन्य बाधाएं हों तो इसका संचालन संभव नहीं होता।

4. फायर मॉक ड्रिल क्या होती है?
यह एक अभ्यास प्रक्रिया है जिसमें वास्तविक स्थिति जैसी परिस्थितियों में जांचा जाता है कि आग लगने पर दमकल विभाग कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से कार्रवाई कर सकेगा। इसी प्रक्रिया में कई कमियां सामने आई थीं।

बिल्डर को मिल गई थी डीएम से राहत
बिल्डर ने मुख्य अग्निशमन अधिकारी द्वारा जारी नोटिस के खिलाफ फायर सेफ्टी अधिनियम की धारा 20 के तहत जिलाधिकारी के समक्ष अपील दायर की थी। 18 जनवरी 2023 को जिलाधिकारी ने अपील स्वीकार करते हुए मुख्य अग्निशमन अधिकारी को एनओसी जारी करने के निर्देश दिए थे। जिलाधिकारी ने अपने आदेश में 2018 में जारी फायर एनओसी का भी उल्लेख किया था।

हाईकोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2018 में जारी एनओसी उस समय दी गई थी जब परियोजना केवल नक्शों और प्रस्तावित डिजाइन के स्तर पर थी और निर्माण शुरू नहीं हुआ था। यदि बाद में स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण किया गया हो तो पुरानी एनओसी का हवाला देकर उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि फायर सेफ्टी अधिकारियों की राय को बिना ठोस कारणों के खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका दायित्व लोगों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

केवल वीडियो के आधार पर नहीं हो सकता फैसला
सुनवाई के दौरान बिल्डर ने एक वीडियो पेश किया था, जिसमें एक डंपर वाहन को परिसर में प्रवेश करते दिखाया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आपात स्थिति में फायर टेंडर और अन्य उपकरण भी आसानी से अंदर जा सकेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि किसी इच्छुक पक्ष द्वारा तैयार वीडियो की सत्यता और प्रामाणिकता की जांच आवश्यक होती है।

आखिरकार डीएम का आदेश हुआ रद्द
हाईकोर्ट ने पाया कि जिलाधिकारी ने न तो स्थल निरीक्षण किया और न ही फायर विभाग, एमडीडीए या राजस्व विभाग से स्वतंत्र रिपोर्ट मंगाई। ऐसे में एनओसी जारी करने का आदेश पर्याप्त आधार के बिना दिया गया था। अदालत ने 18 जनवरी 2023 के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए जिलाधिकारी देहरादून के पास भेज दिया है। अब जिलाधिकारी को सभी पक्षों को सुनकर कानून के अनुसार नया निर्णय लेना होगा।

फैसले में छिपा है व्यापक संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि बहुमंजिला इमारतों में अग्नि सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता। भवन निर्माण में थोड़ी सी लापरवाही भी आपदा के समय बड़ी जनहानि का कारण बन सकती है। इसलिए फायर विभाग की तकनीकी आपत्तियों को केवल औपचारिकता मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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