Rajkumar Dhiman, Dehradun: नीट-यूजी 2025 में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के मामले में देहरादून पुलिस की एसआईटी ने एक और आरोपित को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार धीरज कुमार श्रीवास्तव के कब्जे से 5.58 लाख रुपये नकद बरामद हुए हैं। पुलिस के अनुसार, धीरज ने पूछताछ में बताया कि यह रकम उसे रूपेश पंडित ने उत्तराखंड में फ्रीडम फाइटर कोटे से कुछ छात्रों को एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के एवज में कमीशन के तौर पर दी थी। इससे पहले 21 सितंबर को एसआईटी ने रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया था। रूपेश की निशानदेही पर मेरठ स्थित उसके घर से फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने के एवज में लिए गए आठ लाख रुपये भी बरामद किए गए थे।
भोपाल में MBBS WAY के नाम से चलाता था कार्यालय
पुलिस के मुताबिक, धीरज कुमार श्रीवास्तव पुत्र दिवाकर कुमार श्रीवास्तव, निवासी हाउस नंबर 61, खजूरी कलान रोड, थाना पिपलानी, जिला भोपाल, मध्य प्रदेश, उम्र 37 वर्ष है। वह भोपाल के 46-सी सेक्टर, इंद्रपुरी, थाना पिपलानी में MBBS WAY नाम से कार्यालय संचालित करता था। पुलिस के अनुसार, इस कार्यालय के माध्यम से वह विभिन्न निजी विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस, बीटेक, बीसीए, बीबीए और बीकॉम समेत विभिन्न पाठ्यक्रमों में कमीशन पर दाखिले कराने का काम करता था।
पूछताछ में धीरज ने बताया कि उसकी मुलाकात रूपेश पंडित से करीब दो वर्ष पहले श्रीमती मंजरी देवी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, हिटाणु, उत्तरकाशी में हुई थी। इसके बाद दोनों लगातार संपर्क में रहे। पुलिस के अनुसार, अरविंद कुमार ने अपनी पुत्री और दो अन्य परिचितों के बच्चों के एमबीबीएस दाखिले के लिए रूपेश से संपर्क किया था। रूपेश ने इस संबंध में अपने साथी धीरज से बात की।
लो मेरिट वाले अभ्यर्थियों के लिए तलाशा गया रास्ता
पुलिस के अनुसार, धीरज ने अपने एक अन्य साथी से कम मेरिट वाले बच्चों के एमबीबीएस में दाखिले की संभावना के बारे में जानकारी ली। उस साथी ने उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित यानी फ्रीडम फाइटर कोटे के माध्यम से दाखिले की बात बताई। साथ ही दाखिले की प्रक्रिया की जानकारी देते हुए ऐसे व्यक्ति से संपर्क करने को कहा गया, जिसकी तहसील और कचहरी में अच्छी सेटिंग होने की बात बताई गई थी।
एसआईटी के अनुसार, इसके बाद धीरज कुमार श्रीवास्तव ने रूपेश पंडित और अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर तीन अभ्यर्थियों के कूटरचित दस्तावेज तैयार कराए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र बनवाए गए और तीनों अभ्यर्थियों ने अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में दाखिला लिया। पुलिस अब इस नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों और दस्तावेज तैयार कराने से लेकर सरकारी प्रमाणपत्र हासिल करने तक की पूरी प्रक्रिया की जांच कर रही है।
बरामदगी:
– धीरज कुमार श्रीवास्तव से 5,58,100 रुपये नकद।
– रूपेश पंडित की निशानदेही पर 8 लाख रुपये नकद।
– कुल बरामदगी: 13,58,100 रुपये।
गिरफ्तार धीरज कुमार श्रीवास्तव:
पुत्र दिवाकर कुमार श्रीवास्तव, निवासी हाउस नंबर 61, खजूरी कलान रोड, थाना पिपलानी, जिला भोपाल, मध्य प्रदेश। उम्र 37 वर्ष।
कार्रवाई करने वाली पुलिस टीम:
व.उ.नि. भरत सिंह रावत, अ.उ.नि. सुशील बलूनी, हे.कां. सोबन सिंह राणा और कां. किशन पाल।
45-45 लाख में सीट का सौदा, 20-20 लाख एडवांस
पुलिस की पिछली पूछताछ में सामने आया था कि तीन अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले के लिए करीब 45-45 लाख रुपये में सौदा तय किया गया था। परिजनों से करीब 20-20 लाख रुपये एडवांस लिए जाने की बात सामने आई। शेष रकम दाखिला होने और कक्षाएं शुरू होने के बाद लेने की बात तय होने का पुलिस ने खुलासा किया था। अब धीरज की गिरफ्तारी और उसके पास से बरामद 5.58 लाख रुपये को पुलिस ने कमीशन की रकम से जोड़कर जांच आगे बढ़ाई है। रूपेश पंडित की निशानदेही पर पहले ही आठ लाख रुपये बरामद किए जा चुके हैं। पुलिस के अनुसार, यह रकम फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने के एवज में ली गई थी। इस तरह अब तक इस मामले में कुल 13.58 लाख रुपये नकद बरामद किए जा चुके हैं।
चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही कथित स्वतंत्रता सेनानी
यह पूरा मामला चार अभ्यर्थियों तृप्ति, स्वाति, खुशी और परी के दस्तावेजों की जांच से सामने आया। चारों के दस्तावेजों में धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का कथित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिचय पत्र लगाया गया था। प्रशासनिक जांच में कलक्ट्रेट की संबंधित पंजिका में इस नाम के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का रिकॉर्ड नहीं मिला।
जांच में तृप्ति के आवेदन में मोथरोवाला का पता दर्ज मिला, लेकिन मौके पर न तृप्ति मिली और न उसके परिवार के किसी सदस्य के वहां रहने की पुष्टि हुई। आवेदन में दिया गया मोबाइल नंबर भी किसी अन्य व्यक्ति का मिला। स्वाति, खुशी और परी के आवेदन में राजीव नगर, तरली कंडोली का पता दर्ज था। स्थलीय सत्यापन में वहां भी तीनों अभ्यर्थियों अथवा उनके परिवारों के रहने की पुष्टि नहीं हुई। स्थानीय लोगों और क्षेत्रीय पार्षद से पूछताछ में भी उनके निवास की जानकारी नहीं मिली। इन आवेदनों में दिए मोबाइल नंबर भी अन्य लोगों के पाए गए।
जरूरी दस्तावेजों की जगह लगाए गए आधार कार्ड
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के लिए फोटो, पेंशन पट्टा, पहचान पत्र, निवास प्रमाणपत्र और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कार्ड जैसे दस्तावेज आवश्यक थे। लेकिन चारों आवेदनों में निवास प्रमाणपत्र, पेंशन पट्टा और स्वतंत्रता सेनानी कार्ड उपलब्ध नहीं थे। इनके स्थान पर अभ्यर्थियों और उनके माता-पिता के आधार कार्ड लगाए गए थे। राजस्व अधिकारियों की स्थलीय जांच में आधार कार्ड में दर्ज पतों पर भी संबंधित लोगों के रहने की पुष्टि नहीं हुई। शपथपत्रों में भी गंभीर विसंगतियां मिलीं। स्वाति के आवेदन में दूसरे व्यक्ति का टंकित कथन मिला और एक स्थान पर धर्मवीर वर्मा की पोती के रूप में किसी अन्य नाम का उल्लेख था। परी के शपथपत्र में भी नाम और पारिवारिक विवरण को लेकर विसंगतियां सामने आईं।
10 सितंबर को चारों प्रमाणपत्र रद, MBBS दाखिले भी खत्म
तहसीलदार की विस्तृत जांच के बाद चारों प्रमाणपत्रों को संदिग्ध मानते हुए निरस्त करने की संस्तुति की गई। इसके बाद एसडीएम सदर अपूर्वा सिंह ने 10 सितंबर 2026 को चारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए। इसके बाद एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने भी चारों एमबीबीएस दाखिले रद कर दिए। विश्वविद्यालय के अनुसार चारों सीटों को रिक्त मानते हुए आगे की काउंसलिंग में शामिल करने की प्रक्रिया तय की गई।
13 सितंबर को दर्ज हुए दो मुकदमे
मामले में 13 सितंबर 2026 को राजस्व उपनिरीक्षक कंडोली, सदर देहरादून जगदीश सिंह की शिकायत पर थाना रायपुर में मुकदमा संख्या 380/26 दर्ज किया गया। इसमें बीएनएस की धारा 318(4), 338, 336(2) और 340(2) के तहत कार्रवाई की गई। विवेचना के दौरान इसमें धारा 3(5) बीएनएस की भी बढ़ोतरी की गई। इसी तरह थाना क्लेमेनटाउन में मुकदमा संख्या 86/26 दर्ज हुआ। इसमें बीएनएस की धारा 318(4), 338, 340(2) और 61(2) लगाई गई। क्लेमेनटाउन मामले में तृप्ति और उसकी मां उमा रानी के नाम सामने आए, जबकि रायपुर मामले में खुशी, परी और स्वाति के नाम सामने आए।
जया बलूनी के नेतृत्व में एसआईटी ने संभाली जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी देहरादून ने एसपी ग्रामीण-1 जया बलूनी के नेतृत्व में एसआईटी गठित की। टीम ने प्रकरण से जुड़े दस्तावेज कब्जे में लेकर साक्ष्य जुटाने शुरू किए। जांच में अभ्यर्थियों के आवेदन में दर्ज पते गलत पाए गए। इसके बाद एसआईटी ने संबंधित शिक्षण संस्थानों में जाकर दाखिले से जुड़े दस्तावेज भी कब्जे में लिए। इन दस्तावेजों के अवलोकन से पुलिस को अभ्यर्थियों के मूल पतों से संबंधित जानकारी मिली।
एसआईटी ने एसडीएम सदर और एडीएम कार्यालय की पत्रावलियों की भी जांच शुरू की। प्रमाणपत्र जारी होने की सरकारी प्रक्रिया, आवेदन, राजस्व सत्यापन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। संबंधित पटवारी से भी पूछताछ की जा चुकी है। मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालय से दाखिले के समय जमा कराए गए आवेदन व प्रमाणपत्रों का रिकॉर्ड भी लिया गया है।
धर्मवीर वर्मा के परिवार से पूछताछ ने बढ़ाए सवाल
जांच के दौरान एसआईटी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धर्मवीर वर्मा के बेटे मनोज कुमार के बयान भी दर्ज किए। मनोज ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अपने पिता के प्रमाणपत्र का कभी इस्तेमाल नहीं किया। इसके बाद जांच का महत्वपूर्ण सवाल यह बना कि धर्मवीर वर्मा के नाम का कथित दस्तावेज तैयार किसने किया और उसे इन अभ्यर्थियों तक कैसे पहुंचाया गया।
21 सितंबर को रूपेश और अरविंद की गिरफ्तारी
जांच में सामने आए साक्ष्यों के आधार पर एसआईटी ने 21 सितंबर 2026 को रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया था। रूपेश पंडित मूल रूप से ग्राम शिवपुरी, थाना केहाट, जिला पूर्णिया, बिहार का निवासी है और वर्तमान में द्वारका पुरी कालोनी, मेरठ में रहता था। पुलिस के अनुसार, वह करीब पांच वर्षों से एजुकेशन कंसल्टेंसी का काम कर रहा था और मेरठ में मेकोडो नाम से कंपनी चलाता था। वह विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और विदेशों में एमबीबीएस, बीटेक, बीडीएस और बीवीआर आदि पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के लिए कमीशन पर काम करता था। दूसरा आरोपित अरविंद कुमार ग्राम बहादरपुर खादर, लक्सर, हरिद्वार का निवासी है। पुलिस के अनुसार, वह रूपेश का पुराना परिचित है और उसने अपनी बेटी परी तथा दो अन्य परिचितों के बच्चों के एमबीबीएस दाखिले के लिए रूपेश से संपर्क किया था।
अब जांच फर्जी प्रमाणपत्र से लेकर पूरे नेटवर्क तक
तीसरे आरोपित धीरज कुमार श्रीवास्तव की गिरफ्तारी से जांच की कड़ी फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने से आगे बढ़कर कमीशन, एजुकेशन कंसल्टेंसी नेटवर्क और दाखिले के लिए संपर्क कराने वाले लोगों तक पहुंच गई है। एसआईटी अब यह पता लगा रही है कि तहसील और कचहरी में कथित संपर्क वाला व्यक्ति कौन था, फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए, सरकारी पोर्टल पर आवेदन किसने किए, प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही और मेडिकल कॉलेजों में इन दस्तावेजों को किस स्तर पर स्वीकार किया गया। पुलिस के अनुसार, मामले से जुड़े सभी पहलुओं की गहनता से विवेचना की जा रही है। साक्ष्यों के आधार पर अन्य आरोपितों के विरुद्ध भी कार्रवाई की जाएगी।



