DehradunHealthUttarakhandमनमानी

कैग: नमामि गंगे के 800 करोड़ के कार्यों पर गंभीर सवाल, करोड़ों खर्च और गंगा में फिर भी गिर रही गंदगी

कई STP बेकार, 28 लोगों की जान गई, कई शहरों में सीवर कनेक्शन ही नहीं और 13 साल में नहीं बना गंगा बेसिन मैनेजमेंट प्लान

Rajkumar Dhiman, Bharadisain: गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना पर उत्तराखंड में हुए कामकाज की भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने कई गंभीर खामियों को उजागर किया है। वर्ष 2018-19 से 2022-23 की अवधि पर किए गए इस परफॉर्मेंस ऑडिट में पाया गया कि योजना के तहत बनाए गए कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) या तो बेकार पड़े हैं, कई जगह घरों से सीवर कनेक्शन ही नहीं हैं, कई प्लांट क्षमता से अधिक सीवेज ले रहे हैं और कई स्थानों पर उपचारित किए बिना ही गंदा पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है।

रिपोर्ट को 10 मार्च 2026 को राज्य विधानसभा में पेश किया गया। इसमें योजना की योजना निर्माण, ढांचा निर्माण, परियोजना क्रियान्वयन, फंड प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था की गहन समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य सरकार ने गंगा किनारे बसे शहरों में सीवेज ढांचे पर अपने संसाधनों से कोई खर्च नहीं किया, जबकि स्वच्छता राज्य की जिम्मेदारी है।

13 साल बाद भी नहीं बना गंगा बेसिन प्रबंधन प्लान
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण ने लक्ष्य रखा था कि 2020 तक गंगा में बिना उपचारित शहरी गंदा पानी और औद्योगिक अपशिष्ट का प्रवाह पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 13 साल बाद भी राज्य गंगा समिति ने स्टेट रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान तैयार ही नहीं किया।
इतना ही नहीं, गंगा बेसिन के सात जिलों में भी जिला गंगा योजना तैयार नहीं की गई, जिनमें शामिल हैं उत्तरकाशी
टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार।

इस वजह से सीवरेज प्रबंधन बिखरे हुए तरीके से हुआ और 2020 का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। स्थानीय लोगों को योजना में शामिल ही नहीं किया गया। नमामि गंगे योजना का एक प्रमुख उद्देश्य था कि स्थानीय समुदायों को योजना निर्माण में शामिल किया जाए, ताकि टिकाऊ बुनियादी ढांचा विकसित हो सके।

ऑडिट में पाया गया कि राज्य गंगा समिति, स्टेट मिशन फॉर क्लीन गंगा और क्रियान्वयन एजेंसियां-इनमें से किसी ने भी स्थानीय लोगों को योजना प्रक्रिया में शामिल नहीं किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि कई जगह अनुपयोगी या गलत ढंग से बने सीवरेज ढांचे सामने आए।

राज्य सरकार ने अपने पैसे से नहीं बनाया कोई STP
रिपोर्ट में एक गंभीर तथ्य यह भी सामने आया कि गंगा किनारे बसे शहरों में सीवेज ढांचे पर राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से खर्च नहीं किया। किसी भी शहर में राज्य सरकार ने STP या घरेलू सीवर कनेक्शन नहीं बनाए और जर्मनी की KfW बैंक से वित्तपोषित परियोजनाएं भी केवल हरिद्वार और ऋषिकेश तक सीमित रहीं।

21 STP बने, लेकिन एक भी घर से नहीं जुड़ा सीवर
रिपोर्ट के मुताबिक सात गंगा नगरों में बनाए गए 21 STP घरों से जुड़े ही नहीं। इनमें शामिल हैं-
नंदप्रयाग – 2 STP
कर्णप्रयाग – 5 STP
रुद्रप्रयाग – 6 STP
कीर्तिनगर – 2 STP
चमोली – 1 STP
श्रीनगर-श्रीकोट – 3 STP
जोशीमठ – 2 STP
जोशीमठ में 2010 से 2017 के बीच 42.73 करोड़ रुपये खर्च कर STP बनाए गए, लेकिन किसी भी घर से सीवर कनेक्शन नहीं किया गया।

कई शहरों में बेहद कम घर STP से जुड़े
ऑडिट में पाया गया कि कई शहरों में घरेलू सीवर कनेक्शन बेहद कम हैं। जिसके आंकड़े निम्न प्रकार से दिए गए हैं।

शहर-STP से जुड़े घर
हरिद्वार-69%
ऋषिकेश-29%
श्रीनगर-12%
उत्तरकाशी-9%
चमोली-6%
इसका मुख्य कारण रहा पर्याप्त सीवर लाइन का न होना और STP की क्षमता कम होना। साथ ही को-ट्रीटमेंट प्लांट भी नहीं बन पाया। क्योंकि, उत्तराखंड पेयजल निगम राज्य में एक भी को-ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित नहीं कर पाया। इस कारण यह पाया गया कि जिन घरों में सीवर कनेक्शन नहीं है, वहां से निकलने वाला सेप्टेज असुरक्षित तरीके से निपटाया जा रहा है, जिससे नदी प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है।

हरिद्वार और ऋषिकेश के STP पर क्षमता से ज्यादा दबाव: कई STP अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक सीवेज प्राप्त कर रहे हैं। इसके कुछ उदाहरण यह हैं।

-हरिद्वार का 68 MLD STP
-क्षमता: 68 MLD
-प्राप्त सीवेज: 84 MLD तक
-ऋषिकेश का चोरपानी STP
क्षमता: 5 MLD
-प्राप्त सीवेज: 17 MLD तक

कुछ STP लगभग बेकार पड़े
कई जगह STP अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं। जिसे देवप्रयाग में क्षमता: 1.40 MLD और केवल 70 घरों से सीवेज प्राप्त। जोशीमठ में 1.08 MLD STP और लाइन बंद हो जाने से STP लगभग खाली। इससे STP का उद्देश्य ही विफल हो गया।

गौचर में STP ही नहीं बनाया
गंगा किनारे बसे गौचर नगर में 3,930 घर हैं, लेकिन वहां कोई STP नहीं बनाया गया। बाद में दिसंबर 2023 में स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट का प्रस्ताव दिया गया।

12 STP से बिना उपचार के गंगा में गिर रहा सीवेज
ऑडिट में पाया गया कि 12 STP से बिना उपचार के गंदा पानी गंगा में छोड़ा जा रहा था। इनमें शामिल हैं ढालवाला STP (ऋषिकेश), कीर्तिनगर STP, रुद्रप्रयाग के 4 STP
श्रीकोट STP, पोखरी बैंड STP (गोपेश्वर), कर्णप्रयाग के 4 STP

ऋषिकेश में ठेकेदार ने जानबूझकर गंगा में छोड़ा गंदा पानी
ऑडिट में खुलासा हुआ कि ऋषिकेश के स्वर्गाश्रम (3 MLD) और तपोवन (3.5 MLD) STP से संचालन ठेकेदार ने जानबूझकर बिना उपचार का सीवेज गंगा में छोड़ दिया यह जल अधिनियम 1974 का उल्लंघन है।

रुद्रप्रयाग में 6 STP बने लेकिन नाले ही नहीं जोड़े
रुद्रप्रयाग में 2017 में 6 STP बनाए गए, लेकिन 5 नाले
जो सीवेज और ठोस कचरा ला रहे थे। उन्हें योजना में शामिल ही नहीं किया गया। बार-बार अनुरोध के बावजूद इन्हें जोड़ने की कार्रवाई नहीं हुई।

8 STP बिना वैध अनुमति के चल रहे थे
44 STP में से 8 STP चार साल से बिना वैध अनुमति के चल रहे थे। इनके पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कंसॉलिडेटेड कंसेंट और ऑथराइजेशन नहीं थी। 18 STP रखरखाव एजेंसी को सौंपे ही नहीं गए। वहीं, निर्माण एजेंसी उत्तराखंड जल निगम ने 18 STP कई साल बाद भी जल संस्थान को हस्तांतरित नहीं किए।

4.93 करोड़ का स्लज प्लांट बेकार
ऋषिकेश में ₹4.93 करोड़ लागत का स्लज मैनेजमेंट प्लांट बनाया गया, लेकिन स्लज की कैलोरीफिक वैल्यू कम थी
तकनीक व्यवहार्य नहीं थी। इसका पहले आकलन ही नहीं किया गया।

सुरक्षा ऑडिट न होने से हादसे
रिपोर्ट में सुरक्षा लापरवाही के कारण हुए गंभीर हादसे भी सामने आए। रुद्रप्रयाग में 75 KLD STP भूस्खलन में नष्ट
और 0.88 करोड़ का नुकसान। चमोली में STP में बिजली उपकरणों की खराबी से 28 लोग करंट लगने से प्रभावित हुए, जिनमें 16 की मौत, 12 घायल हो गए थे।

बिना जरूरत बनाए गए श्मशान घाट
राज्य में 11 स्थानों पर शवदाह गृह बनाए गए, लेकिन
स्थानीय मांग का आकलन नहीं किया गया। सांस्कृतिक परंपराओं को नजरअंदाज किया गया, जिसका नतीजा
उनका उपयोग नहीं हुआ। लोग नदी किनारे पारंपरिक चिता जलाते रहे।

885 करोड़ की योजना में सिर्फ 16% खर्च
गंगा पुनर्जीवन के लिए वनरोपण योजना FIG (Forestry Interventions for Ganga) के तहत कुल लक्ष्य 885.91 करोड़ रुपये तय किए गए थे। लक्ष्य क्षेत्र था 54,855 हेक्टेयर, लेकिन खर्च हुआ केवल 144.27 करोड़ रुपये (16%)।

प्रगति भी बेहद कमजोर रही
प्राकृतिक क्षेत्र: 34%
कृषि क्षेत्र: 9%
शहरी क्षेत्र: 6%

44 नगर निकायों ने कचरा प्रबंधन की अनुमति ही नहीं ली
रिपोर्ट के अनुसार 44 नगर निकाय, जो रोज 5 टन से अधिक कचरा पैदा करते हैं, उन्होंने 2016 से अब तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति नहीं ली। परिणाम स्वरूप 9 शहरों में नदी किनारे कचरा जलाने और फेंकने की घटनाएं मिलीं। इन शहरों में शामिल रहे जोशीमठ, गोपेश्वर कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, टिहरी, गौचर और उत्तरकाशी।

देवप्रयाग से हरिद्वार तक पानी की गुणवत्ता गिर गई
10 साल के डेटा के विश्लेषण में पाया गया कि देवप्रयाग तक गंगा का पानी A श्रेणी का है। लेकिन ऋषिकेश और हरिद्वार में B श्रेणी का हो गया। देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच 93 किमी दूरी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 32 गुना बढ़ गया।

ज्यादातर STP मानकों पर खरे नहीं
2023 में निरीक्षण किए गए 44 STP में केवल 3-5 STP NGT मानकों पर खरे उतरे। 6-12 STP MoEF मानकों पर खरे उतरे।

कई STP में प्रदूषण बेहद अधिक पाया गया
BOD: 1237 mg/l
TSS: 909 mg/l
फीकल कोलीफॉर्म: 24×10¹¹ MPN/100ml

प्रदूषण बोर्ड की जांच पर भी सवाल
हरिद्वार के 68 MLD जगजीतपुर STP के परीक्षण परिणामों में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बीच बड़ा अंतर पाया गया। इससे राज्य बोर्ड की जांच प्रणाली पर सवाल उठे।

2.51 करोड़ रुपये नियमों के विरुद्ध रोके गए
क्रियान्वयन एजेंसियों ने 1.92 करोड़ रुपये अव्ययित धन
और ब्याज के 0.59 करोड़ रुपये GFR 2017 के नियमों के खिलाफ अपने पास रोके रखे। दूसरी तरफ जगजीतपुर और सराय के STP को टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट के रूप में स्वीकृति मिली थी। लेकिन, IIT रुड़की ने शून्य MPN/100ml फीकल कोलीफॉर्म मानक तय किया था। टेंडर प्रक्रिया में इसे 100 MPN/100ml कर दिया गया, फिर भी प्लांट उस ढीले मानक को भी पूरा नहीं कर पाए।

CAG ने सरकार को दिए 11 सुझाव
-सभी STP का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जाए
-सभी घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ा जाए
-सेप्टेज के सुरक्षित निपटान के लिए को-ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएं
-STP की क्षमता तय करते समय वास्तविक डेटा लिया जाए
-स्लज प्रबंधन तकनीक लागू करने से पहले परीक्षण हो
-श्मशान घाटों के उपयोग के लिए जागरूकता अभियान चलें
-सभी नगर निकायों को ठोस कचरा प्रबंधन की अनुमति लेनी होगी
-प्रदूषण बोर्ड की प्रयोगशालाओं को NABL मान्यता मिले
गंगा तरंग पोर्टल की खामियां दूर की जाएं
-STP के खराब प्रदर्शन पर एजेंसियों की जवाबदेही तय हो

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button