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खतरे में खाकी का इकबाल, क्राइम सिटी बनता जा रहा दून

जेन जी बार से शुरू हुई दो गुटों की जंग और सरेआम गोलीबारी में निर्दोष रिटायर्ड ब्रिगेडियर की मौत से खाकी पर उठे गंभीर सवाल

Rajkumar Dhiman, Dehradun: राजधानी देहरादून क्राइम सिटी बनता जा रहा है। जिससे पुलिस का इकबाल भी खतरे में पड़ गया है। हाल के दिनों की बात करें तो एंजल चकमा हत्याकांड, गैस एजेंसी संचालक अर्जुन शर्मा की दिनदहाड़े हत्या, झारखंड के गैंगस्टर विक्रम शर्मा हत्याकांड, फिर उत्तरांचल यूनिवर्सिटी के बीटेक के छात्र दुव्यांशु की हत्या और अब सरेआम दो गुटों में आठ से नौ राउंड फायरिंग। जिसमें मॉर्निंग वॉक कर रहे निर्दोष रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी की जान चली जाती है।

ये सभी ऐसे अपराध हैं, जो खुलेआम सड़कों पर इस तरह किए गए हैं, मानो अपराधियों के लिए पुलिस कोई मायने ही नहीं रखती है। अपराधों की यह फेहरिस्त क्राइम सिटी की तरफ तेजी से बढ़ते देहरादून का और भी भयावह भविष्य बताती है। यह बताती है कि दून पुलिस का इकबाल खतरे में है।

आखिर यह कैसी पुलिसिंग है, जसमें आमजन तो खौफ में है, मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के अपराधी मौज काट रहे हैं। शहर में सरेआम गैंगबाजी की जा रही है, बात-बात पर गोलियां चला दी जा रही हैं और छोटे विवाद भी हिंसक रूप ले रहे हैं।

यह शहर बैक टु बैक दो ऐसे पुलिस कप्तानों के हाथ में आया, जिन्होंने निचले पायदान से पुलिसिंग का अनुभव हासिल किया। बदलते शहर के वह संगी साथी रहे। जिन्होंने शहर की नब्ज को बारीकी से टटोला।

फिर अधिकारी कैसे शहर की दुखती रग को पकड़ नहीं पा रहे हैं। कैसे अपराधी इतने बेखौफ हो गए हैं। वर्तमान हालात में शहर के बार, पब और क्लब मनोरंजन की आड़ में अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बनते जा रहे हैं।

शहर में शराब परोसने का नियम रात 11 बजे तक है। वीकेंड पर यह समय 12 बजे तक निर्धारित है। फिर भी राजपुर रोड के तमाम अय्याशी के अड्डे रात दो से ढाई बजे तक गुलजार नजर आते हैं।

सड़कों पर पुलिस के सायरन और लाल-नीली बत्ती की धमक एक तरफ आमजन को नियमों का पाठ पढ़ाती नजर आती है, तो इन बार और क्लब के रातभर बजने वाले तेज म्यूजिक और डिस्को लाइट की चकाचौंध में यह धाक ठंडी पड़ जाती है। जिसकी एक वजह यह भी है इनमें न सिर्फ पश्चिमी यूपी, हरियाणा और दिल्ली के अपराधियों से लेकर काली कमाई करने वाले तथाकथित बिजनेसमैन का पैसा लग रहा है, बल्कि यहां के अफसर और नेता भी अपना कालाधन अय्याशी के अड्डों में खपा रहे हैं।

ऐसे में इन पर पुलिस हाथ डाले भी तो कैसे? फिर अय्याशी के इन्हीं अड्डों का सुरूर सड़कों पर रोड रेजिंग, हिंसक झड़प और गोलीबारी का कारण बनता है। जो अपराधी पश्चिमी यूपी, हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ में भीगी बिल्ली बने घूमते हैं, वह देहरादून और मसूरी में आकर खूंखार बन जाते हैं। नियमों से परे इन बार और क्लबों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को खूब संरक्षण और छूट भी मिलती है।

पुलिस की साख के लिए यह स्थिति सही नहीं है। खाकी का खौफ बदमाशों में कम होगा तो आम नागरिक खुद को उतना ही अधिक असुरक्षित महसूस करेंगे। यह समय खाकी के प्रति दूरगामी सोच को तय करने वाला भी है। अब खाकी अपनी भूमिका खुद तय करे।

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