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पहाड़ में बिखरी जमीनें होंगी एकजुट, 275 गांवों में लागू होगी नई चकबंदी नीति

पलायन रोकने को धामी कैबिनेट का बड़ा दांव, 11 पर्वतीय जिलों को लाभ

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड सरकार ने पहाड़ों से पलायन रोकने और कृषि को फिर से मजबूत आधार देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वैच्छिक/आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति-2026” को मंजूरी दे दी गई। सरकार का दावा है कि यह नीति पर्वतीय कृषि व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव लाएगी और छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी खेती को संगठित कर किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी।

नई नीति के तहत अगले पांच वर्षों में राज्य के 11 पर्वतीय जिलों के 275 गांवों को चकबंदी योजना से जोड़ने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए हर वर्ष प्रत्येक पर्वतीय जिले के पांच गांवों का चयन किया जाएगा।

आखिर क्यों जरूरी पड़ी नई नीति?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की सबसे बड़ी समस्या बिखरी हुई जोतें हैं। एक ही किसान की जमीन कई अलग-अलग स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी रहती है। इससे खेती की लागत बढ़ती है, सिंचाई और मशीनों का उपयोग मुश्किल होता है और उत्पादन घट जाता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

सरकार का मानना है कि चकबंदी के जरिए बिखरी जमीनों को व्यवस्थित कर खेती को व्यावहारिक और लाभकारी बनाया जा सकेगा। इससे बागवानी, औषधीय खेती, नकदी फसलें और सह कृषि गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

किन गांवों को मिलेगी प्राथमिकता?
सरकार ने नीति में स्पष्ट कर दिया है कि केवल विवाद रहित गांवों को ही योजना में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा चकबंदी क्षेत्र का न्यूनतम रकबा 10 हेक्टेयर होना जरूरी होगा। यदि भूमि क्षेत्र कम है तो कम से कम 25 खाताधारकों की लिखित सहमति अनिवार्य होगी। चक निर्माण आपसी सहमति से होगा। किसान स्वयं चकबंदी योजना बनाकर अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

किसानों को मिलेगा प्रोत्साहन
सरकार ने किसानों और खाताधारकों को प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान किया है। हालांकि यह लाभ तभी मिलेगा जब स्वैच्छिक या आंशिक चकबंदी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। योजना का लाभ लेने के इच्छुक किसान बंदोबस्त अधिकारी (चकबंदी) या संबंधित परगनाधिकारी के समक्ष आवेदन कर सकेंगे।

तीन स्तर पर होगी निगरानी
सरकार इस योजना को सिर्फ कागजी पहल बनाकर नहीं छोड़ना चाहती। इसके लिए राज्य स्तर पर उच्चाधिकार समिति (HPC), राज्य स्तरीय अनुश्रवण समिति और जिला स्तरीय क्रियान्वयन समिति का गठन किया गया है। ये समितियां योजना की निगरानी, समीक्षा और क्रियान्वयन पर नजर रखेंगी।

तीन साल बाद होगी समीक्षा
नीति लागू होने के तीन वर्ष बाद इसके परिणामों और व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर संशोधन और सुधार किए जाएंगे।

कृषि अर्थव्यवस्था बदलने की कोशिश
विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ में कृषि योग्य भूमि सीमित है और वन क्षेत्र अधिक होने के कारण खेती पहले से ही दबाव में है। ऐसे में चकबंदी से खेतों तक पहुंच आसान होगी, सिंचाई और मशीनरी का उपयोग बढ़ेगा, उत्पादन लागत घटेगी, सामूहिक खेती को बढ़ावा मिलेगा और युवा फिर खेती की ओर लौट सकते हैं। सरकार इस नीति को पर्वतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और पलायन रोकने की दिशा में “गेम चेंजर” के तौर पर देख रही है।

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