नंदा की चौकी पुल प्रकरण में ठेकेदार पर भी गिरी गाज, हिमालयन कंस्ट्रक्शन सस्पेंड
जांच पूरी होने तक लोनिवि की निविदाओं से बाहर रहेगी फर्म, तीन इंजीनियर पहले ही सस्पेंड

Amit Bhatt, Dehradun: नंदा की चौकी में टौंस नदी पर बने पुल की एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त होने के मामले में लोक निर्माण विभाग ने अब कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। विभागीय अभियंताओं के बाद निर्माण कार्य करने वाली ठेका फर्म मैसर्स हिमालयन कंस्ट्रक्शन, देहरादून पर भी गाज गिरी है। प्रमुख अभियंता राजेश शर्मा ने क्षेत्रीय मुख्य अभियंता की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर कंपनी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
कंपनी को अगले आदेश तक उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग की निविदा प्रक्रिया में भाग लेने से भी रोक दिया गया है। यह प्रतिबंध पुल के आसपास नदी कटाव की वास्तविक गहराई का वैज्ञानिक आकलन और उससे जुड़ी जांच पूरी होने तक प्रभावी रहेगा।
इससे पहले शुक्रवार को मामले में लोनिवि प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार, सहायक अभियंता अमित त्यागी तथा अपर सहायक अभियंता/जेई नवीन गैरोला के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई की जा चुकी है। अब ठेका फर्म के खिलाफ कार्रवाई होने से साफ है कि विभाग इस मामले में जिम्मेदारी का दायरा केवल अपने अभियंताओं तक सीमित नहीं रखना चाहता।
28 जुलाई की बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुई थी एप्रोच रोड
टौंस नदी पर बने पुल के पुनर्निर्माण और सुदृढ़ीकरण का काम 31 जनवरी 2026 को हुए अनुबंध के तहत मैसर्स हिमालयन कंस्ट्रक्शन को सौंपा गया था। 28 जुलाई की सुबह क्षेत्र में हुई भारी वर्षा के बाद अचानक नदी का जलस्तर बढ़ा और तेज बहाव के कारण पुल की ऊपरी धारा की ओर बनी सुरक्षा दीवार के नीचे नदी तल में जबरदस्त कटाव हुआ।
कटाव इतना अधिक था कि पुल की एप्रोच रोड का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना के बाद पुल की सुरक्षा और निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे और शासन के निर्देश पर मामले की प्रारंभिक जांच कराई गई।
जांच में सामने आया नदी कटाव, लेकिन असली गहराई अब भी पहेली
मुख्य अभियंता की प्रारंभिक जांच में एप्रोच रोड को नुकसान पहुंचने की प्रमुख वजह टौंस नदी में हुआ भारी कटाव सामने आया है। हालांकि जांच यहीं खत्म नहीं हुई। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि नदी ने जमीन के नीचे कितनी गहराई तक कटाव किया है, इसका मौके पर सटीक आकलन नहीं हो सका।
यही बिंदु अब पूरे मामले की जांच का केंद्र बन गया है।
जांच अधिकारी ने नदी तल के नीचे की वास्तविक स्थिति जानने के लिए भू-भेदी रडार (Ground Penetrating Radar) और विद्युत प्रतिरोधकता परीक्षण (Electrical Resistivity Testing) कराने की जरूरत बताई है। इन वैज्ञानिक परीक्षणों से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि नदी ने पुल और एप्रोच रोड के आसपास जमीन की सतह के नीचे किस स्तर तक कटाव किया है और संरचना की नींव के आसपास वास्तविक स्थिति क्या है।
कटाव की गहराई का पता लगने तक ठेकेदार पर रोक
विभाग ने इसी तकनीकी अनिश्चितता को देखते हुए हिमालयन कंस्ट्रक्शन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की है। कंपनी को निलंबित करने के साथ ही लोनिवि की निविदाओं में उसके भाग लेने पर भी रोक लगा दी गई है।
अर्थात जब तक जांच पूरी नहीं होती और नदी कटाव की वास्तविक गहराई सामने नहीं आती, तब तक कंपनी विभाग की नई निविदा प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकेगी। यह कार्रवाई इसलिए भी अहम है क्योंकि अब पुल प्रकरण में जवाबदेही का दायरा निर्माण एजेंसी तक पहुंच गया है।
अभियंताओं के बाद ठेकेदार, अब कंसल्टेंट की भूमिका पर भी सवाल
मामले में पहले विभागीय अभियंताओं पर कार्रवाई हुई थी। इसके बाद उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए ठेकेदार के साथ-साथ डिजाइन तैयार करने वाले कंसल्टेंट की भूमिका की भी जांच कराने की मांग उठाई थी।
संघ ने प्रारंभिक जांच के तकनीकी पहलुओं का हवाला देते हुए सवाल उठाया था कि नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने और उसका मार्ग निर्धारित करने की व्यवस्था बनाते समय नदी तल की अनुप्रस्थ ढलान, प्राकृतिक घुमावदार प्रवाह तथा तेज बहाव को नियंत्रित करने के जरूरी उपायों का पर्याप्त ध्यान रखा गया या नहीं।
संघ का तर्क था कि यदि नदी के बहाव को एक तरफ केंद्रित होने से रोकने के लिए पर्याप्त तकनीकी व्यवस्था नहीं की गई तो इससे पुल की ऊपरी धारा वाले हिस्से में कटाव का खतरा बढ़ सकता है।
अब ठेका फर्म के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद जांच की अगली कड़ी डिजाइन और तकनीकी सलाह से जुड़े पक्षों तक पहुंच सकती है।
किसकी कितनी जिम्मेदारी? जांच से खुलेगा पूरा सच
इस पूरे प्रकरण में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि एप्रोच रोड को नुकसान केवल प्राकृतिक आपदा का परिणाम था या निर्माण और डिजाइन से जुड़ी तकनीकी कमियों ने भी नुकसान को बढ़ाया।
आगे की जांच में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है
– नदी के वास्तविक कटाव की गहराई कितनी थी?
– पुल और एप्रोच रोड के आसपास जमीन के नीचे की स्थिति क्या है?
– नदी के तेज बहाव को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षात्मक उपाय किए गए थे या नहीं?
– निर्माण कार्य में निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन हुआ या नहीं?
– डिजाइन तैयार करने वाले कंसल्टेंट की भूमिका क्या रही?
– डिजाइन की तकनीकी जांच और निगरानी में किस स्तर पर जिम्मेदारी थी?
– विभागीय अधिकारियों ने निर्माण और सुरक्षात्मक कार्यों की निगरानी किस तरह की?
पहले वैज्ञानिक जांच, फिर तय होगी सुधार की रणनीति
विभाग फिलहाल जल्दबाजी में सुधारात्मक निर्माण कराने के बजाय पहले नदी तल की वास्तविक स्थिति समझना चाहता है। इसके लिए भू-भेदी रडार और विद्युत प्रतिरोधकता परीक्षण कराने की तैयारी है।
इन परीक्षणों से जमीन के नीचे हुए संभावित कटाव और संरचना के आसपास की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा। रिपोर्ट मिलने के बाद विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर पुल और एप्रोच रोड की सुरक्षा के लिए जरूरी सुधारात्मक कार्य तय किए जाएंगे।
यानी फिलहाल विभाग का फोकस केवल टूटी एप्रोच रोड को दोबारा बनाने पर नहीं, बल्कि यह पता लगाने पर है कि उसके नीचे और आसपास संरचना कितनी सुरक्षित बची है।
सर्किल स्तर तक पहुंच सकती है कार्रवाई की आंच
मामले में जिस तरह जांच का फोकस अब केवल निचले स्तर के अभियंताओं से आगे बढ़कर ठेका फर्म, डिजाइन और सुरक्षात्मक कार्यों तक पहुंच रहा है, उससे सर्किल स्तर की जवाबदेही भी जांच के दायरे में आने की संभावना है।
यदि जांच में यह सामने आता है कि सुरक्षात्मक कार्यों, डिजाइन की समीक्षा, निर्माण की निगरानी या तकनीकी स्वीकृति के स्तर पर भी कोई चूक हुई, तो अधीक्षण अभियंता समेत उच्च स्तर के अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो सकती है।
हालांकि, किस अधिकारी या फर्म की कितनी जिम्मेदारी बनती है, यह जांच के अंतिम निष्कर्ष के बाद ही तय होगा। फिर भी नंदा की चौकी पुल प्रकरण में फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि मामला केवल बारिश और नदी कटाव तक सीमित नहीं रह गया है। विभागीय अभियंताओं के बाद ठेका फर्म पर कार्रवाई हो चुकी है और अब जांच की अगली परत में निर्माण, डिजाइन, तकनीकी सलाह और निगरानी की पूरी श्रृंखला की जिम्मेदारी सामने आ सकती है।



