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जेल में बंद रिटायर्ड आइएएस के कार्यकाल वाली बीज घपले की फाइल गायब

राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट की कोर्ट में सुनवाई के दौरान शासन ने खुद बयां की हकीकत, 14 अक्टूबर 2020 से गायब है फाइल

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Round The Watch: आय से 2626 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में सुद्धोवाला जेल में बंद रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रामबिलास यादव के कार्यकाल में उनके कार्यालय को भेजी गई बीज घपले से जुडी फाइल शासन से गायब कर दी गई है। यह वह फाइल है, जिसमें बीज घपले की पुष्टि की गई थी, तब रामबिलास अपर सचिव कृषि के पद पर कार्यरत थे। फाइल भी 14 अक्टूबर 2020 से शासन के ही कृषि अनुभाग से गायब बताई जा रही है। इस बात की पुष्टि राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट की कोर्ट में स्वयं कृषि विभाग शासन के अधिकारीयों ने की है। गंभीर यह की प्रकरण से जुडी सूचना मांगने पर भी न मिलने और इसकी अपील सूचना आयोग में किए जाने के बाद अनुभाग अधिकारी ने अक्टूबर 2022 में धारा चौकी में रस्मअदायगी को एक तहरीर दे दी। इस पर भी अभी तक कुछ कार्रवाई नहीं की जा सकी है।
बीज प्रमाणीकरण अभिकरण में बीज बिक्री एवं टैग घोटाले की मूल पत्रावली दो साल से सचिवालय से गायब है। इस पत्रावली में घोटाले की पुष्टि के बाद विशेष एजेंसी अथवा एसआईटी से वृहद जांच का निर्णय लिया जाना था। पत्रावली अनुभाग से दिनांक 14/10/2020 तत्कालीन अपर सचिव (डा० रामबिलास यादव) कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग, उत्तराखण्ड शासन के यहां से गायब है।

अपीलार्थी हरिशंकर पांडे द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम में बीज प्रमाणीकरण अभिकरण में बीज बिक्री एवं टैग से संबंधित कथित घोटाले की मूल पत्रावली की मांग की गयी थी। जिसमें कार्यालय ज्ञाप संख्या 618 / XIII-II/2017-04(3)/2017 दिनांक 14/08/2022 में अनियमितताओं की पुष्टि के साथ पूरे मामले में विशेष एजेंसी अथवा एसआईटी से जांच की संस्तुति के आधार पर शासन स्तर पर निर्णय लिया जाना था।

अपीलार्थी द्वारा वांछित सूचना के क्रम में शासन पर कृषि अनुभाग के लोक सूचना अधिकारी / अनुभाग अधिकारी, कृषक कल्याण अनुभाग-2, उत्तराखण्ड शासन, देहरादून द्वारा प्रेषित सूचना से निम्न तथ्य प्रकाश में आए हैं। वह यह कि बीज बिक्री एवं टैग घोटाले से संबंधित पत्रावली पर आतिथि तक कोई निर्णय नहीं हुआ है, क्योंकि यह पत्रावली शासन के रिकॉर्ड के अनुसार 14/10/2020 से गायब है। दिनांक 14/10 /2020 को यह पत्रावली तत्कालीन अपर सचिव कृषि एवं कृ षक कल्याण विभाग उत्तराखंड शासन के कार्यालय को भेजी गयी। अपर सचिव कार्यालय से यह पत्रावली कहां गई किसी को नहीं मालूम। किसी भी स्तर से इस पत्रावली के विषय न तो कोई पूछताछ ही हुई एवं न ही किसी भी स्तर पर जानकारी लेने की कोशिश की गई।

पत्रावली की ढूंढ तब शुरू हुई जब दिनांक 06/06/2022 यानी लगभग दो साल बाद जब अपीलार्थी द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रश्नगत प्रकरण में शासन स्तर पर हुई कार्रवाई की सूचना हेतु पत्रावली की मांग की गई। लोक सूचना अधिकारी / अनुभाग अधिकारी, कृषक कल्याण अनुभाग-2.
उत्तराखंड शासन, देहरादून द्वारा अनुरोध पत्र के क्रम में मूवमेंट रजिस्टर के आधार पर यह पाया कि पत्रावली 619/XIII-II/2017-04 (3) /2017 दिनांक 14/10/2020 को तत्कालीन अपर सचिव, कृषि श्री रामविलास यादव के कार्यालय को गई थी। पत्रावली न मिलने पर अनुभाग द्वारा दिनांक 21/06/2022 को तत्कालीन अपर सचिव के वरिष्ठ निजी सचिव तथा दिनांक 23/06/2022 को सचिवालय के समस्त कार्यालयों को पत्रावली के संबंध में पत्र लिखा गया।
पत्रावली किसी भी स्तर से उपलब्ध न हो पाने के कारण अपीलार्थी को बिंदु संख्या 1 से 4 पर सूचना प्राप्त नहीं हुई। अपीलार्थी द्वारा दिनांक 03/08/2022 को प्रथम अपील किए जाने पर अपीलीय अधिकारी की ओर से बिंदु संख्या 1 से 4 पर पत्रावली प्राप्त होने पर सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए। सूचना प्राप्त ना होने पर दिनांक 14/08/ 2022 को अपीलार्थी द्वारा इस संबंध में द्वितीय अपील सूचना आयोग में की गई। स्पष्ट है कि पत्रावली गायब है यह जानकारी हुए तीन माह बीतने पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई।

दिनांक 14/09/2022 को आयोग में द्वितीय अपील पंजीकृत होने के बाद दिनांक 04/10/2022 को शासन के अनुभाग अधिकारी द्वारा चौकी प्रभारी धारा चौकी घंटाघर को पत्रावली संख्या पत्रावली संख्या 04 (03)/2017 के गुम हो जाने की गुमशुदा रिपोर्ट दर्ज किए जाने के संबंध में पत्र प्रेषित किया गया, जिस पर अतिथि तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। अपीलार्थी को भी उपरोक्त सूचना से अवगत कराया गया है।

प्रकरण सुनवाई करते हुए राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट ने पाया कि यह घोटाले से संबंधित पत्रावली है। विभाग द्वारा जानबूझकर उक्त पत्रावली को गुम किया गया है। अपीलार्थी द्वारा कृषि एवं विपणन अनुभाग-2 उत्तराखण्ड शासन के पत्र संख्या 619/XIII-II/2017-04(3)/2017 दिनांक 14/08/2022 का कार्यालय ज्ञाप प्रस्तुत किया गया, अपर सचिव डा0 रामबिलास यादव के हस्ताक्षरित इस कार्यालय ज्ञाप में उल्लेखित किया गया है कि
डा० आशीष कुमार श्रीवास्तव, जांच अधिकारी / तत्कालीन अपर सचिव, कृषि उत्तराखंड शासन द्वारा उपलब्ध कराई गई जांच आख्या दिनांक 30/10/2017 में यह उल्लेख किया गया है कि एजेंसी द्वारा बीजों की बिक्री व टैग मामले को फौरी तौर पर पर्दा डालने की कार्यवाही की गई, जबकि
बीजों की बिक्री व टैग प्रकरण में घोर अनियमितता हुई है, जिससे संस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह लगा है। तदोपरांत कार्यालय ज्ञाप संख्या 23 / XIII- 11/2018 – 04 (3) /2017 दिनांक 09/01/2018 के द्वारा प्रश्नगत प्रकरण की पुनः विस्तृत जांच किए जाने हेतु आयुक्त कुमाऊं मंडल नैनीताल को जांच अधिकारी नामित किया गया। जांच अधिकारी द्वारा अपनी निष्कर्ष आख्या दिनांक 18/03/2018 में यह उल्लेख किया गया है कि प्रकरण की सत्यता को सामने लाने के लिए विभागीय जांच अथवा अभिलेखीय जांच पर्याप्त नहीं है। प्रकरण का विस्तार उत्तर प्रदेश राज्य सीमा के अंतर्गत भी विस्तारित है। इस कार्य हेतु अपराधिक जांच करने में सक्षम कोई एजेंसी अथवा पुलिस की विशेष जांच टीम एसआईटी के माध्यम से जांच किए जाने की संस्तुति की गई।
उपरोक्त जांच आख्या के परिक्षणोपरान्त यह पाया गया कि प्रकरण की विभागीय जांच अथवा अभिलेखीय जांच पर्याप्त नहीं है तथा प्रकरण का विस्तार उत्तर प्रदेश राज्य सीमा के अंतर्गत विस्तारित होने व प्रकरण में निदेशक, बीज प्रमाणिकरण की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा होने की दृष्टिगत प्रश्नगत प्रकरण की विस्तृत जांच कराया जाना आवश्यक है अतः बीजों की बिक्री व टैग के कथित फर्जीवाड़ा प्रकरण में अनियमितता बरतने वाले निचले स्तर से निदेशक स्तर तक के कर्मियों की भूमिका की जांच किए जाने तथा जांच प्रभावित न होने के दृष्टिगत शासनादेश संख्या 922/XIII- 11/2010-06 ( 3 ) / 2012 दिनांक 20/12/2018 के द्वारा बीज प्रमाणीकरण अभिकरण संस्था के निदेशक पद पर पदस्थ पर पदेन रूप से तैनात कृषि निदेशक, उत्तराखंड को प्रश्नगत जांच समाप्त / निर्णय लिए जाने पर निदेशक, बीज प्रमाणीकरण के पद से अवमुक्त करते हुए इनके स्थान पर अपर निदेशक, कृषि उत्तराखंड को अपने कार्य के साथ-साथ निदेशक, उत्तराखंड स्टेट सीड्स एंड ऑर्गेनिक प्रोडक्शन सर्टिफिकेशन एजेंसी का अग्रिम आदेशों तक अतिरिक्त प्रभार प्रदान किए जाने की श्री राज्यपाल सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हैं।

राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट (फाइल फोटो )

सूचना आयुक्त ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शासन स्तर पर वर्ष 2017 में एक महत्वपूर्ण प्रकरण पर तैयार की गई पत्रावली पर वर्षों तक निर्णय न होना बेहद गंभीर विषय है। प्रश्नगत प्रकरण से स्पष्ट होता है कि शासन के अधिकारियों की संस्तुति के बावजूद पत्रावली
या पहले निर्णय के लिए लंबित रखी जाती हैं और फिर एक दिन अचानक गायब हो जाती है। वर्ष 2022 में सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत पत्रावली नहीं मांगी जाती तो यह तथ्य प्रकाश में ही नहीं आता कि बीज बिक्री घोटाले की हकीकत सामने न आए इसलिए पत्रावली ही गायब कर दी गई। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है एवं सचिवालय की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है कि वर्ष 2020 में जिस पत्रावली पर एसआईटी जांच का निर्णय होना था वह दो साल से गायब है। आज जब फाइल की ढूंढ हो रही है तब पता चल रहा है कि वह उस अधिकारी के कार्यालय से गायब है, जो आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल में हैं। सचिवालय से इस तरह महत्वपूर्ण पत्रावलियों का शासन के निर्णय होने से पूर्व गायब हो जाना शासन व्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। प्रश्नगत प्रकरण इस तरह का अपवाद स्वरूप इकलौता प्रकरण होगा यह कहना भी मुश्किल है। प्रश्नगत प्रकरण से यह स्पष्ट है कि सचिवालय में फाईलों के मूवमेंट एवं रखरखाव की जवाबदेह व्यवस्था नहीं है। व्यवस्था में कहीं न कहीं निरंकुशता व्याप्त है। सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल अवधारणा के लिए भी यह प्रवृत्ति घातक है। सूचना के अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन पारदर्शी व्यवस्था एवं सुशासन के लिए आवश्यक है कि शासन स्तर पर पत्रावलियों के अनुरक्षण की मजबूत एवं जवाबदेह व्यवस्था हो ।

प्रश्नगत प्रकरण में यह भी सवाल है कि शासन स्तर पर अनुभाग के अधिकारियों ने लिखित में इससे उच्चाधिकारियों को अवगत क्यों नहीं कराया? अपीलार्थी के द्वितीय अपील में आने के बाद पत्रावली की गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज कराना भी अपने आप संदेहास्पद है। जबकि प्रश्नगत प्रकरण गुमशुदगी का नहीं बल्कि एक अहम पत्रावली को गायब / नष्ट किए जाने का अपराधिक कृत्य है। जिसके लिए विधिवत गहन जांच एवं अपराधिक मुकदमा दर्ज किए जाने की आवश्यकता थी। ऐसा प्रतीत होता है कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा महज जवाबी खानापूर्ति के लिए पुलिस चौकी में गुमशुदगी सूचना दर्ज कराई गई। शासकीय कार्यालयों में सूचना से संबंधित अभिलेखों का गायव होना उनसे छेड़छाड़ किया जाना अपराध की श्रेणी में है। सनद रहे कि अभिलेखों का गायब होना, छेड़छाड़ किया जाना व अभिलेखों के संबंध में भ्रामक जानकारी प्रदान किया जाना सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा -20 से आच्छादित होता है।

लोक सूचना अधिकारी की मांग पर अपीलार्थी द्वारा उपलब्ध कराए गए कृषि एवं विपणन अनुभाग-2 उत्तराखण्ड शासन के पत्र संख्या 619/XIII- 11/2017-04(3)/2017 दिनांक 14/08/ 2022 का कार्यालय शाप की छायाप्रति लोक सूचना अधिकारी का हस्तगत करायी जाती है। यह प्रति इस आशय से हस्तगत करायी जा रही है कि इसके आधार पर पत्रावली पुन तैयार करने का प्रयास किया जाए। माननीय राज्य सूचना आयुक्त द्वारा सचिव, कृषि उत्तराखण्ड शासन को इस आदेश की एक प्रति इस अपेक्षा के साथ प्रेषित की गई कि पत्रावली को दोबारा तैयार कराया जाए। आदेश की प्रति इस आशय के साथ कृषि सचिव को भेजी गई कि वह मामले में निष्पक्ष जांच कराते हुए कार्रवाई से आयोग को भी अवगत कराएंगे।

जानिए रामबिलास यादव का आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण
आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में देहरादून की सुद्धोवाला जेल में बंद चल रहे रिटायर्ड आइएएस अधिकारी रामबिलास पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हाल में बड़ी कार्रवाई की है। ईडी रामबिलास की 20.33 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति को अटैच कर चुकी है। अटैच की गई संपत्तियों में लखनऊ स्थित आवास, शिक्षण संस्थान, ट्रस्ट आदि समेत दो करोड़ रुपये से अधिके की एफडी शामिल है।

ईडी की देहरादून शाखा ने मई माह में रामबिलास यादव को चार दिन कि कस्टडी में लिया था। इस दौरान उससे आय से अधिक संपत्ति अर्जित किए जाने को लेकर तमाम सवाल पूछे गए। इस आधार पर पर ईडी अधिकारियों ने आरोप के मुताबिक यह तथ्य स्थापित करने में सफलता पाई की रामबिलास ने आय से 20.61 करोड़ रुपये की अतिरिक्त संपत्ति अर्जित की है। अधिकारियों ने पाया कि रामबिलास ने सेवा में रहते हुए भ्रष्टाचार के माध्यम से स्वयं और परिवार के सदस्यों के नाम पर चल-अचल संपत्ति अर्जित की है।

इसके बाद ईडी ने कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ते हुए लखनऊ स्थित आवास, जनता विद्यालय गुडंबा लखनऊ, भवन समूह और स्व. रामकरन दादा मेमोरियल ट्रस्ट गाजीपुर को अटैच कर लिया। इसमें एक फ्लैट और चार भूखंड भी शामिल हैं। अचल संपत्तियों को मूल्य 18.33 करोड़ रुपये आंका गया। साथ ही रामबिलास की 2.03 करोड़ रुपये की बैंक एफडी को भी अटैचमेंट का हिस्सा बनाया गया। इसके साथ ही इस संपत्ति के कुर्की आदेश भी अनंतिम रूप से जारी किए गए हैं।

रिटायरमेंट से पहले विजिलेंस ने किया था गिरफ्तार, मई 2023 में ईडी ने भी की गिरफ्तारी
उत्तराखंड में समाज कल्याण विभाग के अपर सचिव समेत उत्तर प्रदेश में लखनऊ विकास प्राधिकरण के सचिव रहे रामबिलास यादव पर विजिलेंस ने सात अप्रैल 2022 को आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मुकदमा दर्ज किया था। 30 जून 2022 को रिटायर हुए यादव को इस मामले में 23 जून 2022 को ही गिरफ्तार कर सुद्धोवाला जेल भेज दिया था। विजिलेंस की एफआइआर के आधार पर अक्टूबर 2022 में ईडी ने भी रामबिलास पर प्रिवेंशन आफ मनी लांड्रिंग (पीएमएलए) का मुकदमा दायर किया। साथ ही 19 मई 2023 को को इस मामले में गिरफ्तारी की। इसके बाद ईडी ने रामबिलास को चार दिन की कस्टडी में भी लिया।

2013 से 2016 के बीच बटोरी संपत्ति
विजिलेंस और ईडी ने रामबिलास यादव की जनवरी 2013 से 31 दिसंबर 2016 के बीच की सेवा की जांच की। जिसमें पाया गया कि उसने ज्ञात 78 लाख 51 हजार 777 रुपये अर्जित किए, जबकि कुल अर्जित संपत्ति 21.40 करोड़ रुपये पाई गई। इस अवधि में जायज खर्चों को हटाकर 20.60 करोड़ रुपये की संपत्ति अतिरिक्त पाई गई।

 

 

 

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