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उत्तराखंड ने रचा इतिहास, समान नागरिक संहिता का विधेयक पास

समान नागरिक संहिता को मिला कानून का दर्जा, बुधवार को उत्तराखंड की विधानसभा में पारित किया गया विधेयक

Amit Bhatt, Dehradun: उत्तराखंड का नाम बुधवार 07 फरवरी 2024 को देश के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो गया है। उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) के विधेयक को विधानसभा से पारित करा लिया है। विधेयक को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए मुख्य्मंत्री पुष्कर सिंह धामी, उनकी टीम और सरकार के विभिन्न अंगों ने अथक प्रयास किए। जो अब सार्थक रूप भी ले चुके हैं। अब सरकार की प्राथमिकता होगी कि शीघ्र से शीघ्र इस अधिनियम के अनुरूप कार्य करने के लिए विस्तृत रूल्स एन्ड मैनुअल्स बनाए जाएं। ताकि समान नागरिक संहिता के उद्देश्यों की धरातलीय पूर्ति की जा सके। हालांकि, इससे पहले सदन में पक्ष-विपक्ष के विधायकों ने विधेयक पर अपनी-अपनी राय रखी। सत्र के दौरान कई बार तीखी बहस की नौबत भी आई। विपक्ष के विधायकों ने समान नागरिक संहिता में संशोधन के बिंदु भी रखे। इसे सीधे पास किए जाने की जगह पहले प्रवर समिति को भेजे जाने की पैरवी भी गई है। दिनभर कई दौर की कश्मकश के बाद आखिरकार शाम को विधेयक को सदन ने मंजूरी प्रदान कर दी।
विधानसभा सत्र को संबोधित करते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।

उत्तराखंड में बहु विवाह अमान्य, तीन तलाक को जगह नहीं

विधेयक का पहला खंड विवाह और विवाह-विच्छेद पर केंद्रित है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि बहु विवाह व बाल विवाह अमान्य होंगे। विवाह के समय लड़की की न्यूनतम आयु 18 व लड़के की न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए। साथ ही विवाह के पक्षकार निषेध रिश्तेदारी की डिग्रियों के भीतर न आते हों। इस डिग्री में सगे रिश्तेदारों से संबंध निषेध किए गए हैं। संहिता में विवाह और विवाह विच्छेद (डिवोर्स) का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। 26 मार्च 2010 के बाद हुए विवाह का पंजीकरण अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने की स्थिति में भी विवाह मान्य रहेगा, लेकिन पंजीकरण न कराने पर दंड दिया जाएगा। यह दंड अधिकतम 03 तीन माह तक की कारावास और अधिकतम 25 हजार तक के जुर्माने के रूप में हो सकता है।
विधिक प्रक्रिया से ही होगा विवाह विच्छेद
सभी धर्मों के लिए दांपत्य अधिकारों का उल्लेख भी विधेयक में किया गया है। साथ ही न्यायिक रूप से अलगाव के विषय में व्यवस्था की गई है। यह भी बताया गया है कि किस स्थिति में विवाह को शून्य विवाह माना जाएगा। विधेयक में विवाह विच्छेद के संबंध में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। कोई भी इस संहिता में उल्लिखित प्रावधानों के अलावा किसी अन्य प्रकार से विवाह विच्छेद नहीं कर सकेगा। जिसका एक सीधा मतलब यह भी है कि तीन तलाक जैसी व्यवस्था को जगह नहीं मिलेगी। नई व्यवस्था से एकतरफा मनमाने तलाक की प्रथा पर रोक लग जाएगी।
छह माह से तीन साल तक की सजा
विवाह विच्छेद के संबंध में याचिका लंबित रहने पर भरण-पोषण और बच्चों की अभिरक्षा के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। संहिता में उल्लिखित धाराओं का उल्लंघन करने पर छह माह तक का कारावास व 50 हजार जुर्माने की व्यवस्था की गई है। विवाह-विच्छेद के मामलों में तीन वर्ष तक का कारावास होगा। पुनर्विवाह के लिए यदि कोई तय नियम का उल्लंघन करता है तो वह एक लाख रुपये तक का जुर्माना व छह माह तक के कारावास का भागी होगा।
संपत्ति के लिए नहीं झगड़ेंगे उत्तराधिकारी, हिस्सेदारी की गई तय, बेटा-बेटी भी बराबर 
संपत्ति का विवाद परिवार में तब गहरा जाता है, जब किसी मुखिया की मृत्यु बिना वसीयत किए ही हो जाती है। परिवार के सदस्य ही अपने हिस्से और उसके अंश को लेकर आमने-सामने हो जाते हैं। इस स्थिति में महिलाओं की सर्वाधिक उपेक्षा की जाती है। क्योंकि, उन्हें पराई अमानत मानने का चलन रहा है। इस रीति को भी समान नागरिक संहिता में तोड़ने का प्रयास किया गया है। दूसरी तरफ प्रदेश की न्यायलयों में संपत्ति के बंटवारे के वादों की भरमार है। नागरिकों को विवाद की इस स्थिति से बचाने और हिस्सेदारी को लेकर पारदर्शिता के लिए समान नागरिक संहिता विधेयक में तमाम नियम बनाए गए हैं। खासकर उत्तराधिकारियों की श्रेणियां भी तय की गई हैं। साथ ही बताया गया है कि प्रत्येक श्रेणी में उत्तराधिकारियों के मध्य संपत्ति/संपदा का बंटवारा किस तरह किया जाएगा। इसके अलावा दान और अधिकार को लेकर वाद दायर करने को लेकर भी व्यवस्था बनाई गई है।
विधानसभा सत्र से पूर्व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और साथ में काबीना मंत्री गणेश जोशी।

विधेयक के भाग दो में उत्तराधिकार के अध्याय एक के मुताबिक श्रेणी एक में पति/पत्नी, बच्चे, मृत बच्चों के बच्चे व उनके पति/पत्नी आदि को शामिल किया गया है। इस श्रेणी में प्रत्येक जीवित उत्तराधिकारी को संपत्ति का एक अंश मिलेगा। यदि पति/पत्नी के मध्य एक-एक अंश बांटा गया है और इनमें से किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसका भाग जीवित पति या पत्नी को मिल जाएगा। यही स्थिति माता-पिता के रूप में भी लागू होगी।

यदि श्रेणी एक का कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो दूसरी श्रेणी में दर्ज  नातेदार सौतेले माता-पिता, भाई-बहन, उनके बच्चे, बच्चों के पति-पत्नी, पिता के भाई-बहन, मृत भाई-बहन के बच्चों, दादा-दादी, नाना-नानी आदि को शामिल किया गया है। इस श्रेणी में भी समान अंश में संपदा का बंटवारा किया जाएगा। तीसरी श्रेणी में अन्य नातेदारों (श्रेणी एक व दो के अलावा) को शामिल किया गया है। वहीं, चौथी श्रेणी से मतलब उस स्थिति से है, जहां किसी भी श्रेणी के उत्तराधिकारी न हों। ऐसी संपत्ति पर निर्णय सरकार लेगी।
समान नागरिक संहिता विधेयक पास होने के बाद पुष्प वर्षा के बीच अभिवादन स्वीकार करते सीएम धामी।

गर्भस्थ बच्चे का भी अधिकार, पुनर्विवाह पर अधिकार नहीं

विधेयक के मुताबिक बिना वसीयत किए मृत्यु की दशा में गर्भस्थ शिशु को भी वही अधिकार दिया है, जो वसीयत रहित व्यक्ति के जीवनकाल में जीवित बच्चे को है। ऐसे गर्भस्थ शुशु को संबंधित व्यक्ति की मृत्यु से ही उत्तराधिकारी माना जाएगा। यदि किसी विधवा या विधुर ने वसीयत रहित व्यक्ति के जीवनकाल में ही पुनर्विवाह कर लिया हो, वह मृतक की संपदा में उत्तराधिकारी नहीं होगा।
इन्हें उत्तराधिकार का हक नहीं
-जिस व्यक्ति ने संपत्ति के लालच में हत्या की थी या हत्या का प्रयत्न किया था।
-यदि किसी को बेदखल किया गया हो या संपत्ति से वंचित किया गया तो तो उसे वैसे ही माना जाएगा, जैसे वह वसीयत रहित व्यक्ति की मृत्यु से पूर्व ही मृत हो चुका हो।
रोग, शारीरिक या मानसिक क्षमता में भी मिलेगा संपत्ति का अधिकार
इस आधार पर किसी भी व्यक्ति को उत्तराधिकारी के हक से वंचित नहीं किया जा सकेगा कि वह किसी बीमारी, शारीरिक व मानसिक क्षमता से ग्रसित है या किसी विकार से घिरा है। ऐसा व्यक्ति भी कानूनी रूप से संबंधित संपदा का अधिकारी माना जाएगा।
बल व छल से कराई गई वसीयत मानी जाएगी शून्य
विधेयक के अध्याय दो में वसीयत करने के अधिकार व उसकी वैधता पर स्थिति साफ की गई है। व्यव्यस्था दी गई है कि ऐसे मूक-बधिर या अंधे व्यक्ति भी वसीयत कर सकते हैं, जो यह समझने में सक्षम हों कि वह क्या कर रहे हैं। मामूली व अस्थाई दिमागी रोग वाला व्यक्ति स्वस्थ स्थिति के दौरान वसीयत कर सकता है। दूसरी तरफ छल, बल या अतियाचना की स्थिति में कराई गई वसीयत को शून्य माना जाएगा। इसके अलावा डरा-धमकाकर व किसी भी तरह के दबाव को बनाकर कराई गई वसीयत भी शून्य मानी जाएगी। यदि किसी व्यक्ति ने यह कहकर अपने पक्ष में वसीयत कराई है कि उसका पुत्र कर्तव्य विरुद्ध कृत्य करता या उसके एकमात्र पुत्र की मृत्यु हो गई है, तो इस तरह की वसीयत भी अवैध मानी जाएगी।
संपदा का दान लिया जा सकेगा वापस, पहले नहीं थी व्यवस्था
समान नागरिक संहिता विधेयक में दान को लेकर अभूतपूर्व व्यवस्था दी गई है। पूर्व में दान की गई संपदा को वापस नहीं लिया जा सकता था। अब ऐसा नहीं होगा। मान लीजिए कोई व्यक्ति बीमार है और उसे अपनी मृत्यु निश्चित नजर आ रही है। यदि वह दान करता है और बाद में स्वस्थ हो जाता है तो ऐसे दान को शून्य माना जा सकेगा। इसके अलावा उत्तरदान को लेकर कई तरह की अन्य व्यवस्था भी की गई है। यदि कोई दान किसी असंभव/अवैध शर्त या अव्यवहारिक शर्त के साथ जोड़ा गया है तो इसे भी शून्य माना जाएगा। जैसे कि कोई किसी की हत्या कर दे या अपने पति या पत्नी को छोड़ दे आदि। दूसरी तरफ दान के समय पैदा न हुए बच्चे के लिए भी यह व्यवस्था शून्य मानी जाएगी। हालांकि, बच्चे के पिता पर दान लागू होगा। इसके अलावा भी उत्तरदान में विभिन्न अन्य प्रावधान किए गए हैं।
जिला न्यायाधीश के समक्ष करना होगा उत्तराधिकार का आवेदन, कस्टोडियन नियुक्त करने का भी नियम
विधेयक के उत्तराधिकार के अध्याय-3 में मृतक की संपदा के संरक्षण आदि के नियम दिए गए हैं। इसके मुताबिक यदि कोई व्यक्ति संपदा छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उसके उत्तराधिकारी को संपदा प्राप्त करने के लिए नियम बनाए गए हैं। संपदा प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकारी को जिला न्यायाधीश के समक्ष आवेदन करना होगा। ऐसा तब किया जा सकता है, जब उत्तराधिकारी को आशंका हो कि उसके हक की संपत्ति बलपूर्वक छीनी जा सकती है। जिला न्यायाधीश प्रकरण में जांच करा सकते हैं या ऐसे अधिकारी की नियुक्ति कर सकते हैं जो प्रकरण के निस्तारण में सहायक हों।
संपत्ति के निस्तारण तक रक्षक की तैनाती का भी है नियम
जिला न्यायाधीश संबंधित संपत्ति के निस्तारण या उसे उसके वारिस के सुपुर्द करने तक के लिए इस पर रक्षक/कस्टोडियन की नियुक्ति कर सकते हैं। इसके लिए रक्षक को कुछ शक्तियां और लाभ प्राप्त करने का अधिकार भी दिया जाएगा। वहीं, संपत्ति में राजस्व निहित होने की दशा में जिला कलेक्टर से रिपोर्ट मांगी जाएगी। हालांकि, इस तरह के आवेदन के लिए मृत्यु से अधिकतम छह माह की अवधि तय की गई और अपेक्षा की गई है कि प्रकरण का निस्तारण शीघ्रता से किया जाए। इस तरह के प्रकरणों में वसीयत/इच्छितपत्र प्रस्तुत करने या मूल पत्र की खोजबीन के लिए समय भी दिया जाएगा। संबंधित सक्षम न्यायालय को वसीयत की त्रुटियों में सुधार करने का अधिकार भी होगा।
सैनिक व युद्ध लड़ने वाले व्यक्ति विशेषाधिकार वसीयत कर सकेंगे
विधेयक के मुताबिक यदि कोई सैनिक विशेष अभियान या युद्ध में है तो वह विशेषाधिकार वाली वसीयत तैयार कर सकता है। इसके अलावा समुद्री यात्रा या अभियान से जुड़े सैनिक आदि भी इस तरह की वसीयत कर सकते हैं। यह वसीयत या इच्छापत्र लिपिबद्ध या मौखिक शब्दों के माध्यम से किए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति के हस्ताक्षर को प्रमाणित किए जाने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, किसी अन्य की ओर से लिखित वसीयत को हस्ताक्षर के बिना स्वीकार नहीं किया जाएगा। वसीयतकर्ता की ओर से मान्यता दिए जाने के क्रम में इसे स्वीकार किया जा सकेगा।
लिव इन रिलेशन के नियमों की अनदेखी पर 06 माह तक की सजा
आज के आधुनिक युग में युवा प्रेम संबंधों को लेकर उतने फिक्रमंद नजर नहीं आते। यही कारण है कि शहरी क्षेत्रों में लिव इन रिलेशनशिप (सहवासी संबंध) का चलन तेजी से बढ़ रहा है। एक दूसरे को अच्छे से जाने-समझे बिना बनने वाले इस संबंध की डोर न सिर्फ नाजुक होती है, बल्कि कई दफा इसके गंभीर परिणाम भी सामने आते हैं। क्योंकि तमाम लिव इन रिलेशनशिप माता-पिता या अभिभावकों की जानकारी में होते ही नहीं हैं। जिस कारण ऐसे संबंधों की डोर की मजबूती या भरोसे की परख भी अल्प उम्र के युवा नहीं कर पाते हैं। बीते कुछ समय में लिव इन पार्टनरों की हत्या जैसे संगीन प्रकरण भी सामने आए हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड सरकार ने न सिर्फ समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) में लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य किया है, बल्कि ऐसे पार्टनर को कानूनी कवच भी प्रदान किया है।
विधानसभा से पास किए गए समान नागरिक संहिता के बिल में लिव इन रिलेशनशिप में स्पष्ट किया गया है कि यदि लिव इन में रह रहे किसी भी एक पार्टनर की उम्र 21 वर्ष से कम है और वह इस संबंध को तोड़ना चाहते हैं तो उसकी जानकारी पार्टनर के माता-पिता या अभिभावक को देनी होगी। इसकी जिम्मेदारी लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण करने वाले निबंधक को दी गई है। साथ ही संबंध विच्छेद करने के आवेदन की जानकारी दूसरे पार्टनर को भी देनी होगी।
उत्तराखंड के निवासी हों या दूसरे राज्यों के, कराना होगा पंजीकरण
विधेयक में तय किया गया है कि लिव इन रिलेशनशिप में राज्य के भीतर रहने वाला कोई व्यक्ति चाहे वह उत्तराखंड का निवासी हो या दूसरे राज्य का, सभी को पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। पंजीकरण के लिए सहवासी संबंध स्थापित करने के 30 दिन के भीतर संबंधित निबंधक (रजिस्ट्रार) के पास आवेदन करना होगा। यदि कोई ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है या आवेदन नहीं करता है तो निबंधक स्वयं या किसी शिकायत पर नोटिस जारी कर सकता है। नोटिस के 30 दिन के भीतर आवेदन करना होगा।
आवेदन न करने पर सजा व जुर्माने का प्रावधान
जो लिव इन पार्टनर पंजीकरण नहीं कराएंगे, उन्हें दोषी ठहराए जाने की दशा में 03 माह तक की कारावास या 10 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। इसी तरह लिव इन पार्टनर के संबंध में गलत तथ्य प्रस्तुत करने की दशा में भी 03 माह की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों तरह दंडित किया जा सकता है। दूसरी तरफ पंजीकरण कराने के लिए जारी किए गए नोटिस के बाद भी आवेदन न किए जाने की स्थिति में सजा को कड़ा किया गया है। इस स्थिति में 06 माह तक की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों सजा के साथ दी जा सकती है।
कानूनी कवच: भरण पोषण का अधिकार, संतान भी जायज होगी
लिव इन रिलेशन के पंजीकरण की दशा में यदि किसी महिला/युवती को पुरुष पार्टनर अभित्यक्त (छोड़ना) कर देता है तो उस महिला पार्टनर को भरण-पोषण की मांग करने का अधिकार होगा। इसी तरह सहवासी युगल से पैदा होने वाला बच्चा दोनों की वैध संतान माना जाएगा।
इस दशा में पंजीकरण मान्य नहीं
-जहां कम से कम एक व्यक्ति विवाहित हो या पहले से ही लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा हो।
-जहां कम से कम एक व्यक्ति अवयस्क हो।
-बलपूर्वक, उत्पीड़न के साथ या मिथ्या जानकारी की स्थिति में।

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