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पत्रकार पर सरकार ने की एफआइआर, सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अपमानजनक कहे जाने वाले समाचार लेख को ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट है कि लेख में किसी भी समूह या लोगों के समूह का कोई संदर्भ नहीं है

Amit Bhatt, Dehradun: न्याय के सबसे बड़े मंदिर सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से स्पष्ट हो गया कि सरकार किस तरह सच की आवाज उठाने वाले पत्रकारों का गला घोंटने का प्रयास करती है। खासकर त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार इस बात के लिए कुख्यात मानी जाएगी। साथ में उन अधिकारियों की भूमिका भी कठघरे में खड़ी होती है, जो अपने आकाओं के एक इशारे पर दमन के लिए तैयार हो जाते हैं। मामला उस एफआइआर से जुड़ा है, जिसे त्रिवेंद्र सरकार ने पर्वत जन के संपादक शिव प्रसाद सेमवाल के विरुद्ध दर्ज किया था। यह मामला पर्वत जन में प्रकाशित एक लेख से सार्वजनिक सद्भाव प्रभावित होने का आरोप लगाते हुए दर्ज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट पहुंचे इस प्रकरण में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सरकार की एफआइआर को ही निरस्त कर दिया है। पीठ ने कहा कि एफआइआर में लगाए गए आरोप अपीलकर्ता के खिलाफ संज्ञेय अपराध के जरूरी घटकों का खुलासा नहीं करते हैं।

शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के जुलाई 2020 के आदेश के खिलाफ पर्वतजन के संपादक शिव प्रसाद सेमवाल की दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया। क्योंकि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आइपीसी की धारा 153ए के तहत अपराधों के लिए दर्ज एफआइआर को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर की गई थी। जिस पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि आइपीसी की धारा 153ए में स्पष्ट है कि इस प्रकार के अपराध का गठन करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आरोपित के ‘बोले गए’ अथवा ‘लिखे’ शब्दों ने धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच मनमुटाव, या दुश्मनी पैदा हुई।

अपमानजनक समाचार लेख को ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट है कि लेख में किसी भी समूह या लोगों के समूह का कोई संदर्भ नहीं है। इसी आधार पर एफआइआर खारिज कर दी गई। इस पूरे मामले में शिव प्रसाद सेमवाल ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “सत्य की हमेशा जीत होती है। षड्यंत्र करने वाले कितना भी षड्यंत्र कर लें, सत्य परेशान हो सकता है पराजित नही। त्रिवेंद्र सरकार में सिंगटाली पुल का स्थान परिवर्तन करने पर हमने एक खबर प्रकाशित की थी।
इस पर त्रिवेंद्र सरकार ने हमारे खिलाफ दो समुदायों में झगड़ा कराने का गुपचुप मुकदमा दर्ज कर दिया था और यह एफआईआर जानबूझकर छुपा दी गई थी, ताकि हमारे ऊपर गैंगस्टर लगाने में मदद मिल सके।” यदि इस तरह के मुकदमे नहीं होते तो हम कभी पत्रकारिता से दो कदम आगे बढ़कर राजनीति में भी नहीं आते।

शिव प्रसाद सेमवाल (फाइल फोटो)।

यह था मामला, जिसको उठाने पर दर्ज की एफआइआर
पत्रिका में प्रकाशित लेख के मुताबिक सिंगटाली पुल के निर्माण का स्थान एक कंपनी को फायदा पहुंचने के लिए बदल दिया गया था। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया था। लगातार ग्रामीण आदोलनरत थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत इस कंपनी के शिलान्यास कार्यक्रम में गए तो पर्वतजन ने इसको लेकर ग्रामीणों के एतराज को रेखांकित करते हुए खबर प्रकाशित की थी। इस मामले मे आदोलनरत ग्रामीणों की मांग मानने की जगह खबर प्रकाशित करने पर ही धारा 153 ए के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया था। इसी एफआइआर के खिलाफ पर्वतजन के संपादक शिव प्रसाद सेमवाल ने सुप्रीम कोर्ट मे अपील की थी।

सुप्रीम कोर्ट कह चुका, आलोचनाओं को अपराध माना जाएगा तो लोकतंत्र नहीं बचेगा
सुप्रीम कोर्ट अपने एक हालिया आदेश में कह चुका है कि यदि राज्य के कार्यों की हर आलोचना या विरोध को धारा 153-ए के तहत अपराध माना जाएगा तो लोकतंत्र जीवित नहीं रहेगा। लोकतंत्र भारत के संविधान की एक अनिवार्य विशेषता है। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्रकरण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक विरोध है, जो अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा गारंटीकृत भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक हिस्सा है।

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