वीडियो: उत्तराखंड के इस बैंक में क्लर्क का वेतन चपरासी से कम, बर्खास्त कर्मी बना मुख्य लेखाधिकारी
डूबने के कगार पर खड़े देहरादून के अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में सामने आ रहे चौंकाने वाले मामले

Rajkumar Dhiman, Dehradun: देहरादून में अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक को लेकर उठे विवाद ने अब गंभीर रूप ले लिया है। ऋण घोटाले के बाद पहले से परेशान खातेदारों का गुस्सा उस समय फूट पड़ा, जब बैंक प्रबंधन पर नियमों को दरकिनार कर खुद को राहत देने के आरोप लगे। यही नहीं, बैंक में चपरासी का वेतन क्लर्क से ज्यादा है और एक बर्खास्त कर्मी को मुख्य लेखाधिकारी बना दिया गया। वहीं, बैंक के सचिव कहते हैं कि उन्हें अकाउंट्स का कोई ज्ञान नहीं है।
खातेदार परेशान, कर्मचारियों ने कैश में निकाली सैलरी
ऋण घोटाले के बाद आरबीआई के प्रतिबंध झेल रहे अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में करीब 7 हजार खातेदारों के 124 करोड़ रुपये फंसे हैं। निकासी पर रोक के चलते आम ग्राहक रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं।
लेकिन इसी बीच आरोप है कि बैंक प्रबंधन ने नियमों को दरकिनार करते हुए अपने कर्मचारियों को कैश में वेतन दे दिया, ताकि उनके खातों पर लगे प्रतिबंध का असर न पड़े। इस खबर के सामने आते ही खातेदारों में भारी नाराजगी फैल गई और बड़ी संख्या में लोग बैंक पहुंचकर जमकर हंगामा करने लगे।
तीखे सवाल, “हमें पैसे नहीं, इन्हें कैश में सैलरी कैसे?”
हंगामा कर रहे खातेदारों ने सीधे सवाल उठाए कि जब आम लोगों को पैसा निकालने की अनुमति नहीं है, तो बैंक कर्मचारियों को कैश में सैलरी किस आधार पर दी गई? क्या इसके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक से अनुमति ली गई थी? बताया जा रहा है कि बैंक अधिकारी इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, जिससे लोगों का गुस्सा और बढ़ गया।
वेतन पर्ची से खुली नई परत
कैश भुगतान से जुड़ी एक रसीद भी सामने आई है, जिसमें दर्ज आंकड़ों ने और सवाल खड़े कर दिए हैं। चपरासी का वेतन 24,000 रुपये अधिक, जबकि क्लर्क का वेतन 20,000 रुपये है। खातेदारों का आरोप है कि भर्ती और वेतन निर्धारण में भी भारी अनियमितताएं हैं। यहां तक कि परिचितों और रिश्तेदारों को नौकरी देने और निजी लोगों को भी वेतन देने के आरोप लगे हैं।
सचिव का बयान बना विवाद की वजह
बैंक के सचिव बीरबल का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें वह घोटाले को 2013 का पुराना मामला बताते हैं और इसकी जिम्मेदारी आरबीआई की निगरानी पर डालते नजर आते हैं। उन्होंने एक तरह से आरबीआई को ही कठघरे में खड़ा किया है। सचिव की शैक्षणिक योग्यता और कार्य क्षमता पर भी सवाल उठे, जिससे विवाद और गहरा गया।
ऑडिट खर्च में अचानक उछाल
खातेदारों ने बैंक के वित्तीय निर्णयों पर भी गंभीर सवाल उठाए कि वर्ष 2022–24 तक ऑडिट फीस 2-2.5 लाख रुपये सालाना से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 12 लाख रुपये कैसे पार कर गई। इस अचानक बढ़ोतरी को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बर्खास्त कर्मचारी को दी अहम जिम्मेदारी
एक और बड़ा आरोप यह है कि मुख्य लेखाकार बनाए गए अजय गौड़ को पहले ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स से कथित अनियमितताओं के चलते बर्खास्त किया जा चुका था। इसके बावजूद उन्हें यहां अहम जिम्मेदारी देना प्रबंधन की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
SIT जांच तेज हो और कार्रवाई की मांग
खातेदारों ने साफ कहा है कि पूरे मामले की गहराई से जांच हो और दोषी अधिकारियों के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज किया जाए। स्थिति अब सिर्फ बैंकिंग संकट नहीं, बल्कि विश्वास के टूटने का मामला बन चुकी है।



