
Amit Bhatt, Dehradun: दून घाटी के डोईवाला क्षेत्र में जमीन के नीचे पानी एक समान परत में मौजूद नहीं है। कहीं अपेक्षाकृत उथला जलभृत है तो कहीं पानी तक पहुंचने के लिए 100 मीटर से भी अधिक गहराई तक जाना पड़ सकता है। 19 जनवरी 2026 को डिस्कवर वॉटर में प्रकाशित अध्ययन में केंद्रीय भूजल बोर्ड के सोमवीर सिंह, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (डब्ल्यूआईएचजी), देहरादून की तंद्रिला सरकार और परम के. गौतम, तथा अन्य वैज्ञानिकों ने भूभौतिकीय और जल-रासायनिक जांच को जोड़कर डोईवाला ब्लॉक के भूजल तंत्र का आकलन किया। शोध का अंतिम संस्करण 11 फरवरी 2026 को प्रकाशित हुआ।
205 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खोजा गया भूमिगत जल
अध्ययन का क्षेत्र दूनघाटी में डोईवाला ब्लॉक और इससे जुड़े क्षेत्रों में करीब 205 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह दून घाटी के मैदानी हिस्से में स्थित है और क्षेत्र से रिस्पना, सोंग और जाखन नदियां गुजरती हैं। डोईवाला गांव सोंग नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस इलाके में कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों के साथ भूजल दोहन भी बढ़ रहा है, इसलिए जमीन के नीचे पानी की वास्तविक संरचना और उसकी गुणवत्ता को समझना जरूरी है।
दून घाटी के नीचे किस चट्टान में जमा होता है पानी?
दून घाटी का बड़ा हिस्सा पुराने दून बजरी निक्षेपों से बना है। इनमें कंकड़, बजरी, रेत, बोल्डर और मिट्टी की अलग-अलग परतें हैं। ये मोटे कणों वाली परतें पानी को अपने बीच से गुजरने और जमा होने की जगह देती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पहाड़ों से आने वाला वर्षाजल और सतही पानी इन पारगम्य निक्षेपों में रिसकर केंद्रीय घाटी में भूजल का पुनर्भरण करता है।
अध्ययन में दो प्रमुख जलभृतों की पहचान का उल्लेख है। उथले जलभृत में जलस्तर की गहराई लगभग 4.90 से 15.30 मीटर बताई गई है, जबकि गहरे जलभृतों में पानी की गहराई कई स्थानों पर 100 मीटर से भी अधिक हो सकती है।
45 जगहों पर जमीन के भीतर बिजली प्रवाहित कर खोजा पानी
वैज्ञानिकों ने जमीन के नीचे की परतों को जानने के लिए ऊर्ध्वाधर विद्युत प्रतिरोध सर्वेक्षण (वीईएस) किया। कुल 45 स्थानों पर यह जांच की गई। इसमें जमीन में विद्युत धारा प्रवाहित कर अलग-अलग गहराइयों पर चट्टान और मिट्टी के विद्युत प्रतिरोध को मापा गया।
सरल भाषा में, जिस परत में पानी या अधिक नमी होती है, उसकी विद्युत प्रतिक्रिया आसपास की सूखी चट्टान से अलग होती है। इस अंतर से वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि जमीन के नीचे रेत, बजरी, मिट्टी, बोल्डर या जलयुक्त परत कहां मौजूद है। अध्ययन में अधिकतम करीब 150 मीटर तक की गहराई का विद्युत प्रतिरोध विश्लेषण किया गया और 45 स्थानों पर छह से 10 परतों वाले मॉडल बनाए गए।
भूजल की मोटी परत 64 मीटर से ज्यादा मिली
अध्ययन के अनुसार जलभृत की मोटाई अलग-अलग स्थानों पर काफी बदलती है। समग्र मानचित्रण में यह करीब 12.956 से 64.109 मीटर के बीच पाई गई। विस्तृत विश्लेषण में कुछ स्थानों पर मोटाई 64 मीटर से अधिक भी दर्ज हुई।
कुआंवाला के पास स्थित वीईएस-22 में सबसे मोटा जलभृत मिला, जिसकी मोटाई 64 मीटर से अधिक थी। इसके विपरीत दाउदवाला के पास वीईएस-44 में जलभृत अपेक्षाकृत पतला पाया गया। वैज्ञानिकों ने जलभृत की मोटाई में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़ता रुझान भी दर्ज किया।
कहीं पानी 60 मीटर, कहीं 140 मीटर से भी नीचे
जलभृत की गहराई भी पूरे क्षेत्र में समान नहीं मिली। अध्ययन के मानचित्रण में जलभृत की गहराई करीब 60.759 से 156.29 मीटर के बीच दर्ज की गई।
कुछ स्थानों पर जलभृत 60–80 मीटर की गहराई में मिला, जबकि कई स्थानों पर यह 80–100 मीटर और 100–120 मीटर की गहराई में पाया गया। कुछ बिंदुओं पर गहराई 140 मीटर तक दर्ज हुई। शमशेरगढ़ के पास वीईएस-45 में जलभृत की गहराई सबसे कम बताई गई, जबकि कई अन्य स्थानों पर यह काफी गहराई में मिला। अध्ययन में गहराई का रुझान दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में बढ़ता पाया गया।
कौन सी परतें पानी के लिए बेहतर?
वीईएस परिणामों में छह से आठवीं परतों में कंकड़, बजरी, मोटी रेत, रेत और रेतीली मिट्टी की परतें मिलीं। इनकी मोटाई करीब 13 से 65 मीटर और विद्युत प्रतिरोध 14 से 270 ओम-मीटर के बीच रहा। वैज्ञानिकों ने इन परतों को भूजल के लिहाज से संभावनाशील माना।
अध्ययन में पूरे क्षेत्र के जलभृतों का विद्युत प्रतिरोध 13.37 से 281 ओम-मीटर के बीच पाया गया। अलग-अलग प्रतिरोध श्रेणियों में संभावित भूजल क्षेत्र का वितरण भी किया गया। 10–20 ओम-मीटर वाले क्षेत्र करीब 11 प्रतिशत, 20–30 ओम-मीटर वाले करीब 13.88 प्रतिशत, 30–50 ओम-मीटर वाले करीब 13.88 प्रतिशत, 50–100 ओम-मीटर वाले करीब 27.77 प्रतिशत, 100–200 ओम-मीटर वाले करीब 22.22 प्रतिशत और 200–300 ओम-मीटर वाले करीब 11.11 प्रतिशत रहे।
36 पानी के नमूने लेकर जांच, ज्यादातर पानी में टीडीएस कम
भूमिगत संरचना के साथ पानी की गुणवत्ता जानने के लिए वैज्ञानिकों ने 36 भूजल नमूने लिए। नमूने करीब 10 मीटर गहरे हैंडपंपों से लिए गए और पीएच, विद्युत चालकता, कुल घुले पदार्थ, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड, सल्फेट और नाइट्रेट समेत कई मानकों की जांच की गई।
पानी का पीएच 6.76 से 8.47 के बीच मिला और औसत 7.165 रहा। केवल तीन नमूनों का पीएच 7 से कम था, जबकि बाकी नमूने क्षारीय प्रकृति के थे।
कुल घुले पदार्थ यानी टीडीएस के मामले में 94.44 प्रतिशत नमूनों में मात्रा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम थी। 5.56 प्रतिशत नमूनों में टीडीएस 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाया गया। अध्ययन में 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम टीडीएस को पेयजल के लिए वांछनीय सीमा के संदर्भ में देखा गया है।
पानी की सबसे बड़ी समस्या कठोरता निकली
पानी की कठोरता 50 से 412 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच रही और औसत 231 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज हुआ। कुल नमूनों में 47.22 प्रतिशत पानी कठोर श्रेणी में आया। वहीं 27.78 प्रतिशत नमूनों में कठोरता 300 मिलीग्राम प्रति लीटर की अधिकतम स्वीकार्य सीमा से अधिक थी।
वैज्ञानिकों ने इसकी मुख्य वजह पानी में कैल्शियम और मैग्नीशियम की अधिक मौजूदगी को माना। कठोर पानी से सामान्यतः स्वास्थ्य पर तत्काल गंभीर असर नहीं होता, लेकिन इससे पाइप और जलापूर्ति प्रणालियों में परत जमने की समस्या हो सकती है और अत्यधिक कठोर पानी के लंबे समय तक सेवन को लेकर सावधानी जरूरी है।
कुछ जगह कैल्शियम और मैग्नीशियम भी सीमा से ऊपर
अध्ययन में 10 नमूनों में मैग्नीशियम की मात्रा 30 मिलीग्राम प्रति लीटर की बताई गई स्वीकार्य सीमा से अधिक मिली। वहीं छह नमूनों में कैल्शियम की मात्रा 200 मिलीग्राम प्रति लीटर की अधिकतम स्वीकार्य सीमा से ऊपर थी।
दो स्थानों पर भूजल प्रदूषण के स्पष्ट संकेत
भूभौतिकीय और रासायनिक आंकड़ों को मिलाने पर वैज्ञानिकों को कुछ स्थानों पर प्रदूषण के संकेत मिले। एसपी-16 और एसपी-22 नमूनों में विद्युत चालकता क्रमशः 1169 और 1583 माइक्रोसीमेंस प्रति सेंटीमीटर मिली। अध्ययन ने इन स्थानों के आसपास भूजल में बढ़ी हुई लवणता/घुले पदार्थों से जुड़ी समस्या की ओर संकेत किया है।
इन नमूनों से जुड़े वीईएस-6 और वीईएस-39 स्थानों पर जलभृत का विद्युत प्रतिरोध क्रमशः 69.14 और 25.24 ओम-मीटर था, जबकि पानी का प्रतिरोध केवल 8.55 और 6.32 ओम-मीटर पाया गया। वैज्ञानिकों ने इस अंतर और उच्च विद्युत चालकता को इन क्षेत्रों में प्रदूषण की पहचान में महत्वपूर्ण माना।
सिंचाई के लिए ज्यादातर पानी अच्छा, लेकिन अपवाद भी
सिंचाई जल की गुणवत्ता के लिए विलकॉक्स वर्गीकरण में अधिकांश नमूने उत्कृष्ट से अच्छे वर्ग में आए। दो नमूने अच्छे से स्वीकार्य सीमा में और एक नमूना स्वीकार्य से संदिग्ध श्रेणी में रहा। विद्युत चालकता के आधार पर 63.89 प्रतिशत नमूने अच्छे और 30.56 प्रतिशत उत्कृष्ट श्रेणी में रहे, जबकि 5.56 प्रतिशत नमूने सामान्य/उचित श्रेणी में आए।
अमेरिकी लवणता प्रयोगशाला यानी यूएसएसएल वर्गीकरण में 63.9 प्रतिशत नमूने सी2-एस1 श्रेणी में मिले, जिसका अर्थ है मध्यम लवणता जोखिम और कम सोडियम जोखिम। 30.56 प्रतिशत नमूने सी1-एस1 यानी कम लवणता और कम सोडियम जोखिम वाली श्रेणी में रहे। दो नमूने सी3-एस1 में आए, जिनमें लवणता अधिक लेकिन सोडियम जोखिम कम था।
पानी है, लेकिन हर जगह एक जैसा नहीं
इस अध्ययन से दून घाटी के डोईवाला क्षेत्र के भूजल की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। यहां पानी मुख्य रूप से दून की बजरी, रेत, कंकड़ और बोल्डर वाली पारगम्य परतों में जमा होता है। लेकिन जलभृत की मोटाई, गहराई और गुणवत्ता स्थान के अनुसार काफी बदलती है। कहीं मोटी और अच्छी जलधारण क्षमता वाली परत है, तो कहीं पानी काफी गहराई में है। इसी तरह अधिकांश नमूने अपेक्षाकृत अच्छी गुणवत्ता के मिले, लेकिन कुछ स्थानों पर अधिक कठोरता, कैल्शियम-मैग्नीशियम और विद्युत चालकता के कारण गुणवत्ता संबंधी चिंता भी सामने आई।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि भूभौतिकीय सर्वे और जल-रासायनिक जांच को एक साथ इस्तेमाल करने से उन जलभृतों की पहचान की जा सकती है जो सुरक्षित हैं और उन क्षेत्रों को भी चिन्हित किया जा सकता है जहां प्रदूषण पहुंच चुका है। यह तरीका दून घाटी जैसे तेजी से शहरीकरण और भूजल दोहन वाले क्षेत्र में भविष्य की भूजल प्रबंधन रणनीति बनाने में उपयोगी हो सकता है।



