देश को झकझोरने वाले निठारी कांड में रिहाई के बाद सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में संदिग्ध मौत
पीछे छोड़ गया सबसे बड़ा सवाल-आखिर बच्चों का कातिल कौन? 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने किया था बरी

Rajkumar Dhiman, Uttarakhand: बहुचर्चित निठारी हत्याकांड के आरोपी, दोषी और फिर रिहाई तक के घटनाक्रमों से जुड़े सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत की सूचना सामने आई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तरी हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र में उसने कथित रूप से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना की सूचना के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की है। इस घटना के साथ करीब दो दशक पुराने निठारी कांड की कहानी एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
कोली उस मामले का प्रमुख आरोपित था, जिसमें नोएडा के निठारी गांव में कई बच्चों और युवतियों के लापता होने के बाद मोनिंदर सिंह पंढेर की कोठी डी-5 के आसपास से मानव कंकाल और अवशेष बरामद हुए थे। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट नवंबर 2025 में निठारी कांड से जुड़े उसके आखिरी लंबित मामले में भी उसे बरी कर चुका था। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट 2023 में उससे जुड़े 12 मामलों में उसे दोषमुक्त कर चुका था। रिहाई के बाद भी कोली के कदम को प्रकृति के न्याय से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
19 साल जेल में रहा, फांसी की सजा भी हुई
सुरेंद्र कोली मूल रूप से अल्मोड़ा के मंगरूखाल गांव का रहने वाला था। वह नोएडा के सेक्टर-31 स्थित निठारी गांव में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की डी-5 कोठी में घरेलू नौकर के तौर पर काम करता था। निठारी कांड सामने आने के बाद दोनों को गिरफ्तार किया गया था।
जांच के दौरान कोली पर बच्चों और युवतियों के अपहरण, दुष्कर्म, हत्या और शवों को ठिकाने लगाने के आरोप लगे। सीबीआई ने उसके खिलाफ कई अलग-अलग मामले दर्ज किए। शुरुआती दौर में उसे कई मामलों में मौत की सजा सुनाई गई और वह करीब 19 वर्ष तक जेल में रहा। लेकिन वर्षों बाद अदालतों में इन मामलों की तस्वीर बदलती चली गई।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया। अदालत ने जांच और सबूत जुटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
इसके बाद एक आखिरी मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में भी कोली को दोषमुक्त कर दिया। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने माना कि जिन साक्ष्यों को पहले के मामलों में अविश्वसनीय और अपर्याप्त माना गया, उन्हीं के आधार पर एक मामले में दोषसिद्धि बनाए रखना उचित नहीं होगा। कोर्ट का मूल सिद्धांत था कि सिर्फ मजबूत शक के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, इसके लिए विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं।
जिस कांड ने पूरे देश को हिला दिया
निठारी कांड की शुरुआत 2005-06 के दौरान बच्चों और युवतियों के एक के बाद एक लापता होने से हुई। परिजन स्थानीय पुलिस के पास शिकायतें लेकर जाते रहे। बाद में 29 दिसंबर 2006 को मोनिंदर सिंह पंढेर की कोठी के पास नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिलने के बाद मामला देशभर में सुर्खियों में आ गया। तलाशी आगे बढ़ी तो आसपास के नालों से और मानव अवशेष बरामद हुए।
पुलिस के बाद जांच सीबीआई को सौंपी गई। तलाशी के दौरान मानव हड्डियां और ऐसे पैकेट भी मिलने की जानकारी सामने आई, जिनमें मानव अंग होने की बात जांच एजेंसी ने कही थी। इसी आधार पर निठारी कांड में लापता बच्चों और युवतियों के मामलों को जोड़कर जांच आगे बढ़ी।
सीबीआई ने कोली और पंढेर के खिलाफ कुल 19 मामले दर्ज किए थे। इनमें तीन मामलों में बाद में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई। शेष 16 मामलों में कोली के खिलाफ अलग-अलग मुकदमे चले। पंढेर भी दो मामलों में आरोपी बनाया गया था।
कोली के कबूलनामे पर भी उठे सवाल
जांच के दौरान कोली के कथित कबूलनामे को अभियोजन पक्ष ने अहम आधार बनाया था। बाद में कोली ने अदालत में कहा कि उससे ये बयान दबाव में लिए गए थे।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इस पहलू पर सवाल उठाए। अदालत के मुताबिक कोली लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रहा, लेकिन शुरुआती अवधि में उसकी नियमित मेडिकल जांच नहीं कराई गई। कथित कबूलनामे की स्वैच्छिकता और उसकी पुष्टि करने वाले स्वतंत्र साक्ष्यों को लेकर भी अदालत ने सवाल उठाए।
अदालत ने यह भी देखा कि जांच के अलग-अलग चरणों में अभियोजन का रुख बदलता रहा। शुरुआत में पंढेर और कोली दोनों को घटनाओं से जोड़कर देखा गया, लेकिन बाद में अधिकांश आरोपों का केंद्र कोली बन गया। अंततः कई मामलों में उसके कबूलनामे पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई दी।
मोनिंदर सिंह पंढेर भी हो चुका था बरी
निठारी कांड में दूसरा प्रमुख नाम मोनिंदर सिंह पंढेर का था। उसकी डी-5 कोठी के आसपास से मानव अवशेष बरामद हुए थे और वह कोली का नियोक्ता था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2023 में पंढेर को भी उससे जुड़े दो मामलों में बरी कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट से जुड़े घटनाक्रम के बाद निठारी कांड में दोनों प्रमुख आरोपित कानूनी रूप से दोषमुक्त हो गए।
रिहाई के बाद पीड़ित परिवारों का सवाल- फिर हमारे बच्चों को किसने मारा?
कोली की रिहाई के बाद निठारी के पीड़ित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि अगर कोली दोषी नहीं था तो उनके बच्चों और युवतियों की हत्या किसने की?
एक मीडिया हाउस से बातचीत में 10 साल की बच्ची की मां ने कहा था कि उनकी बेटी के चप्पल, कपड़े और खोपड़ी कोठी के आसपास के नाले से मिली थी। परिवार ने न्याय की लड़ाई में अपना घर और जमीन तक बेच दी, लेकिन अंत में उन्हें निराशा मिली। उनके पति ने भी सवाल उठाया था कि अगर पंढेर और कोली दोषी नहीं थे तो फिर डी-5 के आसपास मिले अवशेषों और अन्य सबूतों का जिम्मेदार कौन था।
एक अन्य परिवार ने अपना साढ़े तीन साल का बेटा हर्ष खोया था। हर्ष की गुमशुदगी की रिपोर्ट वर्ष 2006 में दर्ज कराई गई थी। उसके पिता रामकिशन/राजकिशन ने बीबीसी से कहा था कि यदि अदालत ने कोली को निर्दोष माना है तो उन्होंने भी अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया है और अब पुराने जख्मों को फिर से कुरेदना नहीं चाहते।
एक आठ साल की बच्ची की मां ने जांच पर ही सवाल खड़े किए थे। उनका कहना था कि बच्चों के डीएनए परीक्षण तक कराए गए, परिवारों ने न्याय के लिए अपना काम-धंधा छोड़ा, लेकिन अंत में उन्हें यह पता तक नहीं चला कि उनके बच्चों की हत्या किसने की। उनका सवाल था—“हमारे फूल जैसे बच्चों को किसने मारा?”
अदालत ने जांच एजेंसियों पर भी उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं था कि निठारी में अपराध हुए ही नहीं। अदालत ने माना कि घटनाएं बेहद गंभीर और भयावह थीं और पीड़ित परिवारों की पीड़ा असाधारण है। सवाल यह था कि क्या अभियोजन उपलब्ध कानूनी साक्ष्यों के आधार पर कोली का अपराध संदेह से परे साबित कर पाया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में शक कितना भी मजबूत हो, वह सबूत का विकल्प नहीं बन सकता। अदालत ने जांच की कमियों और देरी की ओर भी ध्यान दिलाया।
यही वजह है कि निठारी कांड का सबसे बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित रह गया—नाले में मिले कंकाल आखिर किसके थे, उन बच्चों और युवतियों की हत्या किसने की और इतने बड़े अपराध का वास्तविक जिम्मेदार कौन था?
अब सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत की सामने आई सूचना के बाद यह करीब दो दशक पुराना मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन पीड़ित परिवारों का मूल सवाल वहीं खड़ा है—बच्चे तो चले गए, आरोपित भी अदालत से बरी हो गए, मगर उनके हत्यारों का सच आखिर सामने कब आएगा?



