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12 वर्षों बाद होने वाली नंदा राजजात स्थगित, अब 2027 में होगी महायात्रा

नंदा देवी राजजात समिति ने लिया निर्णय, कर्णप्रयाग में आयोजित बैठक में तैयारियों की रूपरेखा शुरू

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड की सबसे प्राचीन, कठिन और पवित्र धार्मिक यात्राओं में शुमार नंदा देवी राजजात को स्थगित गया है। यात्रा सितंबर 2026 में प्रस्तावित थी, लेकिन अब यात्रा वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। नंदा राजजात समिति ने इस संबंध में औपचारिक निर्णय लेते हुए यात्रा को तय समय चक्र के अनुरूप 2027 में आयोजित करने पर सहमति जताई है। यह यात्रा परंपरागत रूप से हर 12 वर्ष में आयोजित होती है और पिछली पूर्ण राजजात वर्ष 2014 में संपन्न हुई थी। बताया गया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सितंबर माह में भारी हिमस्खलन और अन्य आपदा का खतरा रहता है। पूर्व में भी इस माह में हादसे हुए हैं। लिहाजा, यात्रा को अब वर्ष 2027 में कराने का निर्णय लिया गया। जिसके लिए आगामी वसंत पंचमी में यात्रा की मनौती की जाएगी और तिथि पर तस्वीर साफ होगी।

समिति के अनुसार, धार्मिक परंपरा, पंचांग गणना, प्रशासनिक तैयारियों और यात्रा की व्यापकता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण अनुभव मिल सके। समिति ने सरकार से मांग की है कि नंदा राजजात के लिए कुंभ की भांति प्राधिकरण का गठन किया जाए। वहीं, यात्रा के आयोजन के लिए 05 हजार करोड़ रुपए का बजट मुहैया कराने की मांग भी उठाई है।

क्या है नंदा राजजात यात्रा
नंदा राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा मानी जाती है। इसे हिमालय की सबसे लंबी और कठिन पैदल धार्मिक यात्रा भी कहा जाता है। यह यात्रा मां नंदा देवी को उनके मायके (गढ़वाल) से ससुराल (होमकुंड) तक विदा करने की परंपरा का प्रतीक है। स्थानीय लोकमान्यता में मां नंदा देवी को भगवान शिव की अर्धांगिनी और हिमालय की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

यात्रा का ऐतिहासिक संदर्भ
नंदा राजजात का उल्लेख 8वीं–9वीं शताब्दी से मिलता है
कत्यूरी और गढ़वाल राजाओं ने इसे राजकीय संरक्षण दिया
इसे “राजजात” इसलिए कहा गया क्योंकि पहले राजा स्वयं इस यात्रा का नेतृत्व करते थे। यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊँ की साझा आस्था का प्रतीक है। इतिहासकारों के अनुसार, इस यात्रा ने सदियों से पहाड़ी समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है।

चार सींग वाला भेड़ा : यात्रा का जीवंत प्रतीक
नंदा राजजात की सबसे अनोखी और विशिष्ट परंपरा है चार सींग वाला भेड़ (खाडू)। ऐसा भेड़ अत्यंत दुर्लभ होता है।मान्यता है कि इसके जन्म के साथ ही राजजात का समय तय हो जाता है। यही भेड़ा यात्रा का अग्रदूत होता है
इसे मां नंदा का प्रतिनिधि माना जाता है।

यात्रा की शुरुआत और मार्ग
🔹 प्रारंभ स्थल
नौटी गांव, जिला चमोली (गढ़वाल)
🔹 मुख्य पड़ाव
नौटी → इड़ा बधाणी → कासुंवा → कोटी → नंदकेसरी → थराली → वांण → बेदनी बुग्याल → रूपकुंड → शिलासमुद्र → होमकुंड

🔹 यात्रा की अवधि
– लगभग 22 से 25 दिन
– कुल पैदल दूरी करीब 280 किलोमीटर
– यह मार्ग अत्यंत दुर्गम है और बर्फीले पहाड़ों, ऊंचे बुग्यालों, संकरे रास्तों और मौसम की कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता
🛕 धार्मिक दृष्टि से मां नंदा देवी की विदाई की प्रतीक यात्रा
शिव-शक्ति परंपरा से जुड़ी हिमालयी लोकदेवताओं की सामूहिक उपासना का प्रतीक भी मानी जाती है। वहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से लोकगीत, झोड़ा-छपेली, जागर
पारंपरिक वेशभूषा, सामूहिक भंडारे और सेवा परंपरा
के वाहक के साथ यह यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का चलता-फिरता संग्रहालय मानी जाती है।

क्या रहती है भागीदारी और आंकड़े क्या कहते हैं
वर्ष 2014 की राजजात में लगभग 20 लाख से अधिक श्रद्धालु विभिन्न चरणों में जुड़े थे। देश-विदेश से तीर्थयात्री, शोधकर्ता और पर्यटक भी पहुंचे। वर्ष 2027 में अनुमान है कि 30 से 50 लाख श्रद्धालुओं की भागीदारी होगी।स्थानीय ग्रामीणों, स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन की व्यापक सहभागिता यात्रा में रहती है। यह यात्रा जनसंख्या और भूगोल के लिहाज़ से चलता-फिरता महाकुंभ कही जाती है।

प्रशासनिक और सरकारी तैयारियां क्या रहती हैं
राज्य सरकार और जिला प्रशासन द्वारा: सुरक्षा बलों की विशेष तैनाती, स्वास्थ्य शिविर, मोबाइल अस्पताल, सैटेलाइट फोन और संचार व्यवस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए प्लास्टिक प्रतिबंध आदि के इंतजाम किए जाते हैं। इसके अलावा डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान, ट्रैक सुधार और अस्थायी पुल निर्माण, यात्रा को पर्यावरण-अनुकूल और सुरक्षित बनाने पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है।

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