
Round The Watch News: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के मुताबिक, “गृहिणी का काम पति की आय का आधार है। उसे खाली बैठा कहना न सिर्फ गलत, बल्कि अन्यायपूर्ण है। अदालत ने माना कि घर संभालने वाली पत्नी का योगदान अदृश्य जरूर है, लेकिन घर की आर्थिक संरचना उसी पर टिकी होती है।
गृहिणी को ‘खाली बैठी’ बताने की सोच पर अदालत की सख्त टिप्पणी
जस्टिस शर्मा ने कहा कि पत्नी का रोजगार में न होना कभी भी आलस्य का प्रतीक नहीं। यह वही श्रम है जो परिवार की पूरी व्यवस्था संभालता है। अदालत के अनुसार, घरेलू काम को हल्के में लेना सामाजिक पूर्वाग्रह है और इसे न्यायिक दृष्टि में कोई मान्यता नहीं मिल सकती।
पति की कमाई में पत्नी की ‘अनदेखी आय’
कोर्ट ने दो टूक कहा, यदि पत्नी घर न संभाले तो पति का कार्यस्थल पर प्रभावी रहना संभव ही नहीं। यह योगदान भले ही बैंक खाते में जमा न हो, लेकिन इसका आर्थिक महत्व असंदिग्ध है। इसलिए भरण-पोषण तय करते समय पत्नी के इस अदृश्य आर्थिक मूल्य को नजरअंदाज करना ‘पूर्ण अन्याय’ होगा।
नये दौर की कानूनी सोच
अदालत का यह फैसला न केवल घरेलू श्रम को सम्मान देता है, बल्कि भविष्य के वैवाहिक विवादों में कानूनी दृष्टिकोण को भी एक नई दिशा प्रदान करता है। घरेलू काम को ‘अनप्रॉडक्टिव’ मानना अब न्यायिक कसौटी पर स्वीकार्य नहीं होगा।
यह फैसला उन महिलाओं के सम्मान की गूंज है जिन्हें समाज अक्सर ‘गैर-कमाऊ’ कहकर कमतर आंकता रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है—घर चलाने वाला श्रम भी एक आर्थिक शक्ति है, और उसकी कानूनी पहचान अब अनिवार्य है।



