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पदोन्नति में आरक्षण पर गेंद सरकार के पाले में, हाई कोर्ट ने एससी/एसटी समिति को सरकार के समक्ष पक्ष रखने को कहा

एससी/एसटी समिति की याचिका निस्तारित, दो सप्ताह में शासन के समक्ष देना होगा प्रत्यावेदन

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन को लेकर दायर एससी/एसटी समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने फिलहाल सीधे कोई अंतिम निर्देश देने के बजाय याचिकाकर्ताओं को सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में हुई।

क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वे उत्तराखंड सचिवालय में कार्यरत हैं और आरक्षित वर्ग से आते हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 629/2022 (जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता) में जो निर्देश दिए थे, उनका राज्य सरकार ने अब तक पालन नहीं किया है। इन निर्देशों में पदोन्नति में आरक्षण देने से पहले कैडरवार डेटा तैयार करना और अनुसूचित जाति/जनजाति के सेवा में प्रतिनिधित्व का आकलन करना शामिल है। हालांकि, यह मूल आदेश/केस 2018 का है। इसी केस से जुड़े केस/निर्देश 2022 में भी सामने आए।

सरकार ने यह रखा पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जेपी जोशी ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का मामला अभी लंबित है और दिए गए निर्देश अंतरिम प्रकृति के हैं। राज्य सरकार ने इस संबंध में न्यायमूर्ति इरशाद हुसैन समिति का गठन किया है और समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है। मामला अभी विचाराधीन है।

कार्मिक और नियुक्ति विभाग को दें संयुक्त प्रत्यावेदन
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता 02 सप्ताह के भीतर सचिव, कार्मिक एवं नियुक्ति विभाग को संयुक्त प्रत्यावेदन (representation) दें। सरकार का संबंधित अधिकारी उस पर यथाशीघ्र निर्णय ले। कोर्ट ने अपेक्षा जताई कि निर्णय संभव हो तो 9 महीने के भीतर लिया जाए।

क्या है इस आदेश का असर
इस फैसले का सीधा असर उत्तराखंड में पदोन्नति में आरक्षण (Promotion in Reservation) के मुद्दे पर पड़ सकता है। अब सरकार को कैडरवार डेटा और प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की मांगों पर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेज हो सकती है।

सीधे आदेश देने की जगह अपनाया यह रुख
हाईकोर्ट ने फिलहाल सरकार को सीधा आदेश देने से बचते हुए प्रक्रिया के तहत समाधान का रास्ता अपनाया है। अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है कि वह तय समय में इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या निर्णय लेती है।

जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामला क्या है? जानिए इसके पहलू
Jarnail Singh vs Lachhmi Narain Gupta (2018) भारत में पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in Promotion) से जुड़ा एक बेहद अहम मामला है, जिसने सरकारी नौकरियों में SC/ST आरक्षण के नियमों को स्पष्ट किया। दूसरी तरफ इस केस की जड़ें M. Nagaraj vs Union of India (2006) के फैसले में हैं।

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर सरकार SC/ST को प्रमोशन में आरक्षण देना चाहती है, तो उसे 3 बातें साबित करनी होंगी। उस वर्ग का पिछड़ापन (Backwardness), सरकारी सेवाओं में कम प्रतिनिधित्व (Inadequate Representation) और इससे प्रशासन की कार्यक्षमता (Efficiency) प्रभावित न हो।

2018 के आदेश ने दी नई दिशा
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस मामले में बड़ा फैसला दिया और कहा कि SC/ST के लिए पिछड़ेपन को साबित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि संविधान पहले ही उन्हें पिछड़ा मानता है। लेकिन बाकी शर्तें बनी रहीं। कोर्ट ने कहा कि सरकार को कैडर (post-wise) के अनुसार डेटा इकट्ठा करना होगा। यह दिखाना कि SC/ST का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और प्रमोशन में आरक्षण देने से प्रशासन की गुणवत्ता पर असर न पड़े।

क्रीमी लेयर पर भी बड़ा फैसला
इस केस में कोर्ट ने यह भी कहा कि SC/ST में भी क्रीमी लेयर (अधिक संपन्न वर्ग) को प्रमोशन में आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यानी आरक्षण का फायदा वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। इस निर्णय के बाद राज्यों को प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले डेटा आधारित फैसला लेना जरूरी हो गया और बिना आंकड़ों के सीधे आरक्षण देना कानूनी रूप से चुनौती योग्य हो गया। कई राज्यों (जैसे उत्तराखंड) में प्रमोशन आरक्षण के मामले कोर्ट में जाने लगे।

क्रीमी लेयर को लेकर हालिया और पिछले बड़े आदेश
क्रीमी लेयर (Creamy Layer) को लेकर हाल के समय में सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसले और आदेश आए हैं, जिनसे यह मुद्दा और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। खासकर SC/ST और OBC आरक्षण में। सबसे नया बड़ा आदेश (2026) आया। कहा गया कि केवल आय से क्रीमी लेयर तय नहीं होगी। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की नौकरी/पद (Status) भी देखना होगा और सामाजिक स्थिति (Social Status) भी जरूरी फैक्टर है।

सिर्फ 8 लाख रुपये से ज्यादा आय को क्रीमी लेयर मान लेना गलत होगा। कोई व्यक्ति अमीर हो सकता है, लेकिन सामाजिक रूप से अभी भी पिछड़ा हो सकता है इसलिए “आय + सामाजिक स्थिति + पद” सब देखना जरूरी है।

SC/ST के लिए क्रीमी लेयर पर 2024 में भी आया था आदेश
State of Punjab vs Davinder Singh में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC/ST में भी सब-क्लासिफिकेशन (अंदर विभाजन) हो सकता है और क्रीमी लेयर को बाहर किया जा सकता है। जिसका मतलब कि जो SC/ST वर्ग में आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे निकल चुके हैं, उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए।

सरकार को क्रीमी लेयर की पहचान में स्पष्ट नियम बनाने को कहा
2026 के गतिमान प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि SC/ST में क्रीमी लेयर पहचानने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं। यानी अभी SC/ST में क्रीमी लेयर लागू करने का तरीका पूरी तरह तय नहीं है। साफ है कि कोर्ट चाहता है कि सरकार इसके लिए स्पष्ट गाइडलाइन बनाए। माना जा रहा है कि आरक्षण अब धीरे-धीरे “जाति + वास्तविक स्थिति” दोनों पर आधारित होने की दिशा में जा रहा है।

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