
Rajkumar Dhiman, Dehradun: देहरादून स्थित अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं और हेराफेरी का मामला सामने आने के बाद बैंक के 05 पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। फॉरेंसिक ऑडिट में बैंक के खातों और लेजर रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ियां मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई। इससे पहले जब बैंक में घपला और घाटे की गंभीर स्थिति पाई गई थी तो आरबीआई ने 12 फरवरी 2026 को लेनदेन पर प्रतिबंध लगा दिया था। जिसके बाद से सात हजार से अधिक खतेदारों के 124 करोड़ रुपये फंसे हैं।
फॉरेंसिक ऑडिट में उजागर हुईं अनियमितताएं
फॉरेंसिक ऑडिट में वर्ष 2013-14 से 2015-16 के बीच कई संदिग्ध वित्तीय लेनदेन और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ का खुलासा हुआ। जांच में बैंक के खातों, लेजर एंट्री और वित्तीय दस्तावेजों में कथित तौर पर फर्जीवाड़ा पाए जाने की बात सामने आई। इसके बाद बैंक की मुख्य शाखा के प्रबंधक रिंकू गौतम ने कोतवाली देहरादून में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया।
पांच लोगों पर मिलीभगत से गबन का आरोप
शिकायत में बैंक के तत्कालीन सचिव आर.के. बंसल, सॉफ्टवेयर इंजीनियर गणेश चंद्र वार्ष्णेय, तत्कालीन शाखा प्रबंधक महावीर सिंह, संजय गुप्ता और कार्यकारी शाखा प्रबंधक विजय मोहन भट्ट को नामजद किया गया है।
आरोप है कि सभी ने आपसी मिलीभगत से बैंक रिकॉर्ड में फर्जी एंट्री कीं और बैंक धनराशि का दुरुपयोग किया। शिकायत के अनुसार नियमों के विपरीत निजी खातों में लेनदेन कर अनुचित लाभ लिया गया, जिससे बैंक को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
बैंक की साख पर भी पड़ा असर
बैंक प्रबंधन का कहना है कि इस कथित वित्तीय गड़बड़ी से न केवल संस्था को आर्थिक नुकसान हुआ बल्कि ग्राहकों का भरोसा भी प्रभावित हुआ है। फॉरेंसिक रिपोर्ट और विभागीय जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि आरोपियों ने कथित रूप से बैंक के पैसों से संपत्तियां अर्जित कीं।हालांकि इन संपत्तियों और लेनदेन की वास्तविक स्थिति का पता विस्तृत पुलिस जांच के बाद ही साफ हो सकेगा।
2013-14 में पड़ चुकी थी संकट की नींव
आरबीआई की कार्रवाई भले ही अब हुई हो, लेकिन बैंक के पतन की शुरुआत वर्ष 2013-14 में ही हो चुकी थी। उस समय बैंक प्रबंधन ने मशीनरी खरीद और अन्य मदों के नाम पर चुनिंदा लोगों को बड़े पैमाने पर ऋण बांट दिए। ये ऋण समय के साथ फंसते चले गए, लेकिन न तो वसूली की दिशा में कोई ठोस प्रयास किया गया और न ही जोखिम प्रबंधन के नियमों का पालन हुआ।
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि बैंक घाटे में चला गया, फिर भी खातों में लाभ दिखाया जाता रहा। इस तरह बैंक प्रबंधन लगातार खाताधारकों और नियामक संस्थाओं की आंखों में धूल झोंकता रहा।
38 करोड़ का एनपीए, 124 करोड़ की जमा पर संकट
जानकारी के अनुसार बैंक के फंसे ऋण (NPA) की राशि लगभग 38 करोड़ रुपये है। वहीं, दूसरी ओर करीब 9 हजार खाताधारकों की 124 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि अब संकट में है। यह स्थिति बैंक को लगभग दिवालियेपन की कगार पर ले आई है।
प्रोविजनिंग न होने से नहीं खुली समय रहते सच्चाई
नियमों के तहत प्रत्येक बैंक को दिए गए ऋण और फंसे ऋणों के आधार पर तय प्रतिशत में प्रोविजनिंग (ऋण हानि प्रावधान) करनी होती है। लेकिन अर्बन कोओपरेटिव बैंक के प्रबंधन ने इस अनिवार्य प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं अपनाया और फंसे कर्ज को छिपाता रहा। यदि समय-समय पर नियमों के अनुसार प्रोविजनिंग की जाती, तो बैंक की वास्तविक आर्थिक स्थिति पहले ही सामने आ जाती और हालात इतने भयावह नहीं होते।
आरबीआई की निगरानी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में खाताधारकों ने आरबीआई की निगरानी भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। चार करोड़ रुपये की जमा राशि वाले खाताधारक अचिन गुप्ता का कहना है कि बैंक का हर वर्ष ऑडिट हुआ, लेकिन इसके बावजूद गंभीर अनियमितताएं पकड़ में नहीं आईं। उनका कहना है कि यदि समय रहते गड़बड़ियों की पहचान कर ली जाती, तो आज हजारों खाताधारकों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता। प्रभावित खाताधारकों में नगर निगम देहरादून, निगम ठेकेदार, लोक निर्माण विभाग के ठेकेदार और कई कारोबारी शामिल हैं।
नकदी संकट से ठप हुआ कारोबार
बैंक से जुड़े कई खाताधारक कारोबारी और ठेकेदार हैं।
निकासी पर रोक लगने से उनके व्यापारिक कार्य पूरी तरह प्रभावित हो गए हैं। नकदी की कमी के कारण कई कारोबार ठप पड़ गए हैं और लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
एक ही परिवार के नियंत्रण का आरोप
खाताधारकों का आरोप है कि बैंक की बदहाली के पीछे प्रबंधन पर एक ही परिवार का लंबे समय तक नियंत्रण मुख्य कारण रहा। पहले बैंक के चेयरमैन रमेश ममगाईं रहे और बाद में उनके बेटे मयंक ममगाईं ने यह पद संभाला।
आरोप है कि इसी दौरान नियमों की अनदेखी कर ऋण वितरण किया गया, जिससे बैंक धीरे-धीरे अंदर से खोखला होता चला गया।



