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बिग ब्रेकिंग: उत्तराखंड में फर्जी शासनादेश से उपनल कर्मियों को जारी कर दिया न्यूनतम वेतनमान

चिकित्सा शिक्षा निदेशालय में सामने आया चौंकाने वाला गंभीर मामला, दून अस्पताल में भी थी वेतनमान देने की तैयारी

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड में शासनादेश के फर्जीवाड़े का गंभीर मामला सामने आया है। फर्जी शासनादेश (जीओ) के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा निदेशालय में तैनात उपनल कर्मियों को न्यूनतम वेतनमान (समान कार्य समान वेतन के अंतर्गत) जारी कर दिया गया है। गंभीर यह कि सब कुछ फर्जी शासनादेश को असली मानते हुए निदेशक चिकित्सा शिक्षा डॉ अजय कुमार आर्य के आदेश के क्रम में किया गया। शासनादेश के फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा है। अफसरों में समझ नहीं आ रहा कि अब वह करें तो क्या। कैसे इस फर्जी जीओ से पार पाया जा सके।

Fake Government Order Uttarakhand
इस फर्जी जीओ से चिकित्सा शिक्षा निदेशालय में दिया गया न्यूनतम वेतनमान।

गौर करने वाली बात यह है कि उत्तराखंड शासन में जिस सचिव दीपेश कुमार सिंह के नाम से यह शासनादेश जारी किया गया है, उस नाम का कोई अफसर है ही नहीं। इसी आदेश के नीचे अवर सचिव के रूप में अभिलेख कुमार श्रीवास्तव का नाम दर्ज है। इस नाम का भी कोई अवर सचिव शासन में नहीं है। न ही इस शासनादेश में स्वास्थ्य विभाग के किसी अनुभाग का जिक्र है।

फर्जी जीओ के आधार पर इस तरह बनाया गया दून मेडिकल कॉलेज पर दबाव।

यह आदेश सभी अपर मुख्य सचिव, सचिव, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी और विभागाध्यक्षों को संबोधित किया गया है। संभवतः इसी क्रम में यह चिकित्सा शिक्षा निदेशालय भी पहुंचा होगा। इससे भी गंभीर बात यह कि चिकित्सा निदेशक ने फर्जी शासनादेश को असली मान लिया। उसकी सत्यता की पुष्टि कराने की जहमत भी नहीं उठाई गई और उपनल कर्मियों को समान कार्य समान वेतन के तहत न्यूनतम वेतनमान जारी कर दिया गया।

दून मेडिकल कॉलेज पर भी बनाया फर्जी जीओ के पालन का दबाव
अधिकारियों ने यह भी जानने की कोशिश भी नहीं की कि दीपेश कुमार और अभिलेख कुमार नाम के अफसर शासन में तैनात हैं भी या नहीं। चिकित्सा शिक्षा निदेशालय के बाद सीधे उपनल कर्मियों को न्यूनतम वेतनमान जारी करने की चिट्ठी दून मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को भी भेज दी गई।

दून मेडिकल कॉलेज में उपनल के तहत 109 कार्मिक तैनात हैं। इससे पहले की फर्जी जीओ के तहत यहां भी लाभ मिलता, कुछ अफसरों की सक्रियता से मामला पकड़ लिया गया। अन्यथा मेडिकल कॉलेज में भी खेल कर दिया जाता। संभव है कि अन्य विभागों में भी ऐसा किया गया हो या तैयारी चल रही हो।

फिलहाल, अधिकारी मामले में लीपापोती में जुट गए हैं। अंदरखाने यह पता किया जा रहा है कि आखिर फर्जी शासनादेश अस्तित्व में कैसे आया और वह कैसे इसमें फंस गए। अपनी खामी छिपाने के लिए अधिकारी फर्जी शासनादेश का तोड़ निकालने में जुटे हैं।

फर्जी जीओ से प्रति कर्मचारी मिला 20 हजार का अतिरिक्त लाभ
चिकित्सा शिक्षा निदेशालय में फर्जी शासनादेश से कर्मियों को जो न्यूनतम वेतनमान का लाभ दिया गया, उससे प्रति कर्मी करीब 20 हजार रुपये अतिरिक्त जारी किये गए। जाहिर है, बिना वास्तविक जीओ के ऐसा करना सीधे तौर पर अपराध है। देखने वाली बात यह है कि अधिकारी इस गंभीर अपराध पर मुकदमा कब दर्ज कराते हैं और कौन-कौन कार्रवाई की जद में आते हैं।

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