सुप्रीम कोर्ट की उत्तराखंड हाई कोर्ट पर सख्त टिप्पणी, जिस कंपनी के लिए वकालत की, अब जज बनकर उसी के मामले में सुनवाई
दून की चर्चित एटीएस कॉलोनी से जुड़ा है मामला, अब दूसरे न्यायमूर्ति की पीठ में सुना जाएगा मामला

Amit Bhatt, dehradun: उत्तराखंड के चर्चित प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड (एटीएस कॉलोनी से चर्चित) से जुड़े भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही पर गंभीर टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश पहले इसी भूमि से जुड़े वर्ष 2013 के एक मुकदमे में प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता रह चुके थे। ऐसी स्थिति में न्यायिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उन्हें इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग रखना चाहिए था।
ऐसे शुरू हुआ विवाद
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, उत्तराखंड हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिका संख्या 762/2026 और 1431/2026 लंबित थीं। याचिका संख्या 762/2026 में 20 मई, 21 मई, 1 जून, 17 जून और 20 जुलाई 2026 को कई अंतरिम आदेश पारित किए गए, जिन्हें प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड ने स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि संबंधित न्यायाधीश वर्ष 2013 में WPMS संख्या 1478/2013 में प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से वकील के रूप में पेश हुए थे और उस मुकदमे की भूमि वही थी, जो वर्तमान विवाद का विषय बनी हुई है। साथ ही कंपनी ने हाईकोर्ट में स्वयं को पक्षकार बनाने (Impleadment) का आवेदन भी दिया था, जो अभी विचाराधीन था।
न्याय केवल होना नहीं, दिखना भी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि जनता को यह दिखाई भी दे कि न्याय पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुआ है। अदालत ने कहा कि किसी पूर्व मुवक्किल से जुड़े मामले में पक्ष या विपक्ष में आदेश पारित करना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
रिट याचिका का दायरा बढ़ाने पर भी सवाल
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जिन रिट याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी, उनका विषय अलग था, लेकिन अंतरिम आदेशों के जरिए उनका दायरा काफी बढ़ा दिया गया। यदि न्यायाधीश को लगा कि मामला व्यापक जनहित का है तो उसे हाईकोर्ट की जनहित याचिका (PIL) समिति के समक्ष रखा जाना चाहिए था या फिर मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाना चाहिए था ताकि निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हो सके।
फिलहाल आदेशों में हस्तक्षेप नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पेड़ों की कटाई नहीं किए जाने संबंधी आश्वासन पहले ही दिए जा चुके हैं। इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। अब उचित पीठ इस मामले के तथ्यों और कानून के सभी पहलुओं की स्वतंत्र रूप से समीक्षा करेगी।
मुख्य न्यायाधीश को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उसका निर्णय उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाए ताकि दोनों आपराधिक रिट याचिकाएं उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की जा सकें। साथ ही यदि आवश्यक हो तो जनहित याचिका शुरू करने के संबंध में भी नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
बिल्डर पुनीत अग्रवाल ने दायर की थी याचिका
दरअसल, विवादों में रहने वाले देहरादून के बिल्डर पुनीत अग्रवाल अपने खिलाफ गुंडा एक्ट में तहत जिला बदर किए जाने के डीएम के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे थे। उसी दौरान उन्होंने एटीएस कॉलोनी से जुड़े एक भूखंड में पेड़ कटान और अवैध प्लॉटिंग का आरोप लगाया और हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया। यह आरोप प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स के विरुद्ध थे। इसी क्रम में प्रतीक रिसॉर्ट्स से सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पीटिशन दाखिल की थी। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी और अहम दिशा-निर्देश सामने आए।



