उत्तराखंड समेत देश के 25 लाख शिक्षकों की नौकरी पर संकट, सांसद बलूनी ने संभाला मोर्चा
प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रतिनिधिमंडल ने सांसद बलूनी से मुलाकात कर शिक्षकों की समस्या रखी, मिला भरोसा

Rajkumar Dhiman, Dehradun: शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता ने उत्तराखंड समेत देशभर के करीब 25 लाख शिक्षकों के सामने नौकरी बचाने का संकट खड़ा कर दिया है। इनमें उत्तराखंड के लगभग 18 हजार बेसिक शिक्षक भी शामिल हैं। वर्षों पहले सरकारी नियमों के तहत नियुक्त हुए इन शिक्षकों को अब टीईटी की अनिवार्यता से राहत दिलाने की मांग तेज हो गई है। इस मामले में गढ़वाल सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक अनिल बलूनी ने पहल की है।
नई दिल्ली स्थित भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रतिनिधिमंडल ने सांसद बलूनी से मुलाकात कर शिक्षकों की समस्या रखी। पौड़ी गढ़वाल जिलाध्यक्ष मनोज जुगरान के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के एक सितंबर 2025 के आदेश के बाद आरटीई अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों के सामने गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। संघ के अनुसार, आदेश के तहत एक अप्रैल 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को भी निर्धारित अवधि में टीईटी उत्तीर्ण करना होगा।
2028 के बाद नौकरी पर सीधा संकट
शिक्षक संघ के मुताबिक, एक सितंबर 2028 तक टीईटी उत्तीर्ण नहीं करने वाले संबंधित शिक्षकों की सेवा पर संकट आ सकता है। हालांकि 55 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों को फिलहाल सेवा में बने रहने की छूट दी गई है, लेकिन टीईटी पास नहीं करने पर उन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं मिलेगा। इससे बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक प्रभावित होंगे, जो अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके हैं।
संघ ने सांसद को बताया कि उत्तराखंड में करीब 18 हजार बेसिक शिक्षक इस व्यवस्था से प्रभावित हो सकते हैं। देशभर में प्रभावित शिक्षकों की संख्या करीब 25 लाख बताई जा रही है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्होंने नियुक्ति के समय सरकार द्वारा निर्धारित शैक्षिक योग्यता और अन्य मानकों को पूरा किया था। इनमें कई शिक्षक 25 से 30 वर्ष तक की सेवा पूरी कर चुके हैं। ऐसे में सेवा के अंतिम चरण में दोबारा पात्रता परीक्षा अनिवार्य किए जाने को वे व्यावहारिक नहीं मान रहे हैं।
आरटीई से पहले नियुक्ति, बाद में लागू हुई टीईटी की शर्त
शिक्षक संघ ने इस मामले में आरटीई अधिनियम और एनसीटीई के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम एक अप्रैल 2010 से लागू हुआ था, जबकि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने इसके तहत शिक्षक पात्रता परीक्षा संबंधी प्रावधान 23 अगस्त 2010 को अधिसूचित किए। ऐसे में उससे पहले नियुक्त शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों के तहत हुई थी। संघ का कहना है कि बाद में लागू हुई पात्रता की शर्त को पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू करने से हजारों परिवारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है।
संसद में मुद्दा उठाएंगे बलूनी
प्रतिनिधिमंडल की मांग सुनने के बाद सांसद अनिल बलूनी ने इसे गंभीर मामला बताया। उन्होंने भरोसा दिया कि आगामी संसद सत्र में शिक्षकों की टीईटी अनिवार्यता का मुद्दा उठाया जाएगा। साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात कर समस्या का समाधान निकालने का प्रयास करने की बात कही। बलूनी ने कहा कि उत्तराखंड के साथ ही देशभर के प्रभावित शिक्षकों को राहत दिलाने के लिए उचित स्तर पर प्रयास किए जाएंगे। प्रतिनिधिमंडल में हरिद्वार जिलाध्यक्ष अश्वनी चौहान, प्रांतीय तदर्थ समिति सदस्य दीपक सजवाण, जिला संयुक्त मंत्री राजेंद्र ढौंडियाल और सुमित चौहान शामिल रहे।
25 लाख शिक्षकों के भविष्य पर नजर
टीईटी की अनिवार्यता का मामला अब केवल उत्तराखंड के शिक्षकों तक सीमित नहीं रह गया है। शिक्षक संगठनों के अनुसार देशभर के करीब 25 लाख शिक्षक इससे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में आगामी संसद सत्र और केंद्र सरकार के स्तर पर होने वाली पहल पर शिक्षकों की नजर टिकी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से सेवा दे रहे पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से कोई राहत मिलती है या नहीं।



