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भाजपा विधायक के बेटे पर एसटी की जमीन हड़पने का आरोप, कानूनगो अटैच और खरीदारों में बेचैनी बढ़ी

फर्जी ढंग से जमीन नाम कराने और फिर उसे बेचने के हैं आरोप

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर में बुक्सा जनजाति की जमीन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। गदरपुर से भाजपा विधायक अरविंद पांडेय और उनके बेटे अतुल पांडेय पर आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से जनजातीय जमीन को फर्जी तरीके से अपने नाम कराया और बाद में बेच दिया। अब इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई भी शुरू हो गई है। बाजपुर तहसील के रजिस्ट्रार कानूनगो राकेश शाह को उत्तरकाशी अटैच कर दिया गया है।

अब समझिए शुरुआत से पूरा मामला
ऊधम सिंह नगर की बाजपुर तहसील के सैमलपुरी गांव में बुक्सा समुदाय के चार भाइयों—नारायण सिंह, प्रीतम सिंह, कनहई सिंह और तुला सिंह—के नाम करीब 3.30 एकड़ जमीन दर्ज थी। यह जमीन अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आती थी, इसलिए इसे किसी गैर-जनजाति व्यक्ति के नाम ट्रांसफर नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद वर्ष 2010-11 के दौरान यह जमीन धारा 229-बी के तहत अतुल पांडेय के नाम दर्ज हो गई, जिससे पूरे विवाद की शुरुआत हुई।

16 साल की उम्र और 50 साल से कब्जे का दावा
रिकॉर्ड के अनुसार जिस समय जमीन अतुल पांडेय के नाम हुई, उस समय उनकी उम्र करीब 16 साल थी। वहीं दस्तावेजों में यह भी दर्ज किया गया कि इस जमीन पर 50 साल से कब्जा था। यही विरोधाभास अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है और इसी आधार पर कागजों में हेरफेर के आरोप लगाए जा रहे हैं।

अपने नाम कराने के बाद जमीन बेची गई
जमीन अपने नाम होने के करीब नौ साल बाद 7 अगस्त 2020 को अतुल पांडेय ने यह जमीन गुरविंदर सिंह को करीब 28 लाख रुपये में बेच दी। इस सौदे के बाद मामला और जटिल हो गया क्योंकि जिस जमीन की वैधता पर सवाल उठ रहे थे, उसे सामान्य जमीन बताकर बेच दिया गया।

कमिश्नर ने किया आदेश, लेकिन अमल नहीं
शिकायत के बाद मामले की सुनवाई हुई और वर्ष 2023 में कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने आदेश दिया कि यह जमीन बुक्सा समुदाय की है और उन्हें ही वापस मिलनी चाहिए। इसके बावजूद न तो राजस्व रिकॉर्ड में कोई बदलाव हुआ और न ही जमीन वापस कराई गई, जिससे आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गया।

फैसले के बाद भी जमीन की खरीद-फरोख्त जारी रही
कमिश्नर के आदेश के बावजूद 13 मार्च 2023 को गुरविंदर सिंह ने यही जमीन हरजिंद्र कौर और उनके बेटों सुरेंद्र सिंह और मक्खन सिंह को बेच दी। इस तरह एक ही जमीन की दो बार रजिस्ट्री हो गई और तीसरे पक्ष के लोग इसमें फंस गए।

शिकायतकर्ता ही बन गया रजिस्ट्री में गवाह, लेनदेन के आरोप गहरे
मामले में एक बड़ा मोड़ तब आया जब यह सामने आया कि बुक्सा समुदाय के तुला सिंह, जिन्होंने जमीन को लेकर शिकायत की थी, वही बाद में रजिस्ट्री में गवाह के रूप में शामिल हुए। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि जब जमीन विवादित थी और आदेश भी आ चुका था, तो उसे विवाद मुक्त कैसे बताया गया।

2026 में फिर खुला मामला
20 अप्रैल 2026 को तुला सिंह के परिवार ने एसडीएम कोर्ट पहुंचकर आरोप लगाया कि उनकी जमीन झूठे दस्तावेजों के जरिए छीन ली गई और उन्हें अब तक कब्जा नहीं मिला। इसके बाद 21 अप्रैल को तहसीलदार ने अतुल पांडेय को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में जवाब मांगा।

नोटिस के बाद तहसील पहुंचे विधायक
नोटिस जारी होने के अगले दिन अरविंद पांडेय खुद बाजपुर तहसील पहुंचे और अधिकारियों से कहा कि कमिश्नर का आदेश पहले ही आ चुका था, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने खुद तहसील में बैठकर बुक्सा समाज के नाम जमीन दर्ज करवाई है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वे इस बात में नहीं पड़ना चाहते कि जमीन उनके बेटे के नाम कैसे आई।

तीसरे खरीदार सबसे ज्यादा परेशान
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा है, जिन्होंने 2023 में यह जमीन खरीदी। मक्खन सिंह और उनके परिवार ने एसडीएम कार्यालय पहुंचकर कहा कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से जमीन खरीदी, लेकिन अब बिना उनकी गलती के उनका मालिकाना हक खत्म हो रहा है। उनका सवाल है कि जब जमीन पहले से विवादित थी, तो उसे बेचा कैसे गया।

प्रशासन ने भी लिया एक्शन
मामले में राजस्व रिकॉर्ड से छेड़छाड़ के आरोप सामने आने के बाद बाजपुर तहसील के रजिस्ट्रार कानूनगो राकेश शाह को उत्तरकाशी संबद्ध कर दिया गया है। यह कार्रवाई कुमाऊं कमिश्नर स्तर से जुड़े आदेशों में कथित गड़बड़ी के बाद की गई है।

कब तक हड़पे जाएंगे बुक्सा जनजाति के लोगों के अधिकार?
यह मामला अब सिर्फ जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें जनजातीय अधिकार, प्रशासनिक जिम्मेदारी और खरीददारों के नुकसान जैसे कई पहलू जुड़ गए हैं। अब जांच और कानूनी प्रक्रिया तय करेगी कि जमीन का असली हकदार कौन है और जिन लोगों ने पैसे देकर जमीन खरीदी है, उन्हें राहत कैसे मिलेगी।

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