उत्तराखंड ने खोया अपना ‘मेजर जनरल’ नेता: पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी नहीं रहे
अनुशासित, कड़क और प्रभावशाली व्यक्तित्व से राजनीति में भी बनाई अलग छवि

Round The Watch Desk: उत्तराखंड की राजनीति और सार्वजनिक जीवन के एक अनुशासित, ईमानदार और दृढ़ व्यक्तित्व पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी के निधन से प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति में शोक की लहर है। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूरी ने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने एक ऐसे जननेता को खो दिया, जिनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति, सख्त प्रशासनिक शैली और विकासोन्मुख सोच के लिए रही।
भुवन चंद्र खंडूरी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि अनुशासन, राष्ट्रसेवा और जनहित के पर्याय माने जाते थे। सेना की वर्दी से लेकर सत्ता के सर्वोच्च पद तक उनका सफर समर्पण, ईमानदारी और कर्मठता का प्रतीक रहा।
सेना से राजनीति तक प्रेरक सफर
1 अक्टूबर 1934 को जन्मे भुवन चंद्र खंडूरी ने भारतीय सेना में लंबी और गौरवपूर्ण सेवा दी। इंजीनियर्स कोर में अपनी सेवाएं देते हुए वे मेजर जनरल के पद तक पहुंचे और उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित भी हुए। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और जल्द ही अपनी अलग पहचान बना ली।
विकास पुरुष के रूप में पहचान
खंडूरी राष्ट्रीय राजनीति में तब प्रमुखता से उभरे जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। देश के हाईवे नेटवर्क के विस्तार और आधुनिक सड़क ढांचे को गति देने में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल प्रशासनिक सख्ती और पारदर्शिता के लिए याद किया जाता है। भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख, सरकारी कामकाज में अनुशासन और विकास कार्यों को तेज करने की उनकी कार्यशैली ने उन्हें आम जनता के बीच अलग पहचान दिलाई।
दो बार संभाली उत्तराखंड की कमान
भुवन चंद्र खंडूरी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार प्रदेश की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में शासन-प्रशासन में जवाबदेही बढ़ाने और विकास परियोजनाओं को रफ्तार देने के प्रयास हुए। उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखा गया, जो कम बोलते थे लेकिन फैसले ठोस लेते थे।
बेदाग छवि और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व
राजनीति में जहां आरोप-प्रत्यारोप आम हैं, वहीं खंडूरी की पहचान एक बेदाग और ईमानदार नेता की रही। उनकी सादगी, स्पष्टवादिता और प्रशासनिक दृढ़ता ने विरोधियों तक को प्रभावित किया। जनता के बीच वे ऐसे नेता के रूप में लोकप्रिय रहे, जो सत्ता को सुविधा नहीं, जिम्मेदारी मानते थे।
उत्तराखंड की राजनीति में अपूरणीय क्षति
खंडूरी का जाना उत्तराखंड की राजनीति के एक युग का अंत माना जा रहा है। उन्होंने प्रदेश को केवल नेतृत्व नहीं दिया, बल्कि राजनीति में मर्यादा, अनुशासन और जनसेवा की एक मिसाल भी कायम की। उनके निधन से उत्तराखंड ने अपना एक ऐसा संरक्षक खो दिया है, जिसकी छवि लंबे समय तक जनमानस में जीवित रहेगी।



