तो उत्तराखंड में बाघ के शिकारियों पर सीबीआई के शिकंजे की जरूरत नहीं…?
हरिद्वार में दो बाघों के शिकार के बाद सरकार की मंशा पर सवाल, अंतर्राष्ट्रीय गिरोह की उत्तराखंड में सक्रियता?

फरवरी में सरकार ने CBI जांच को बताया गैरजरूरी, मई में जहरीला चारा देकर दो बाघों की हत्या
Amit Bhatt, Dehradun: उत्तराखंड में बाघ संरक्षण को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक ओर उत्तराखंड सरकार ने इसी वर्ष फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कॉर्बेट और राजाजी पर CBI जांच की जरूरत से इनकार करते हुए दावा किया था कि राज्य में बाघ संरक्षण मजबूत है और 2019 के बाद कॉर्बेट-राजाजी क्षेत्र में बाघ शिकार का कोई मामला सामने नहीं आया, वहीं दूसरी ओर मई में हरिद्वार वन प्रभाग के श्यामपुर क्षेत्र में दो बाघों के शिकार ने इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल काउंटर एफिडेविट में राज्य सरकार ने कहा था कि उत्तराखंड टाइगर संरक्षण का मॉडल राज्य है, यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है और राज्य की वन एवं पुलिस एजेंसियां प्रभावी तरीके से काम कर रही हैं। इसी आधार पर CBI जांच की मांग का विरोध किया गया था। लेकिन अब हरिद्वार के ताजा मामले ने बहस छेड़ दी है कि क्या टाइगर पोचिंग जैसे संगठित और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े अपराधों की जांच केवल राज्य एजेंसियों के भरोसे छोड़ी जा सकती है?
हरिद्वार में जहरीला चारा, पंजे काटे गए… शिकार का क्रूर चेहरा
हरिद्वार वन प्रभाग के श्यामपुर रेंज में हाल ही में दो बाघ मृत पाए गए, जिनके बारे में प्रारंभिक जांच में शिकार की आशंका जताई गई। जानकारी के अनुसार, शिकारियों ने जहरीला चारा देकर बाघों को मारा और उनके पंजे काटकर फरार हो गए। यह तरीका वन्यजीव अंगों की तस्करी के संगठित गिरोह की ओर इशारा करता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अवैध बाजार में बाघ के पंजे, हड्डियां और अन्य अंगों की भारी मांग रहती है।
उत्तराखंड का इतिहास भी सवालों के घेरे में
उत्तराखंड में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कॉर्बेट, हरिद्वार और तराई क्षेत्र में बाघ शिकार और वन्यजीव अंगों की तस्करी के कई मामले सामने आ चुके हैं। कई मामलों में स्थानीय शिकारियों से लेकर अंतरराज्यीय नेटवर्क तक के तार जुड़े मिले हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि टाइगर पोचिंग सामान्य वन अपराध नहीं, बल्कि संगठित ट्रांसनेशनल क्राइम है, जिसके तार नेपाल, भूटान, म्यांमार, चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई नेटवर्क तक जुड़े पाए गए हैं।
क्यों अहम है CBI जांच?
वन्यजीव अपराध विशेषज्ञों के अनुसार, बाघ शिकार के मामलों में जांच सिर्फ स्थानीय गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह सकती। असली चुनौती उन अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट तक पहुंचने की होती है जो शिकार से लेकर तस्करी और विदेशों में खरीदारों तक नेटवर्क संचालित करते हैं। ऐसे मामलों में CBI की भूमिका इसलिए अहम मानी जाती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जांच सहयोग, इंटरपोल समन्वय, विदेशी एजेंसियों से सूचना साझा करने और सीमा पार नेटवर्क तक पहुंचने में उसकी संस्थागत क्षमता अधिक होती है। अन्य राज्यों में भी वन्यजीव तस्करी और संगठित अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच और कार्रवाई के उदाहरण रहे हैं।
सरकार के दावे और जमीनी हकीकत
सुप्रीम कोर्ट में सरकार का तर्क था कि उत्तराखंड में बाघों की संख्या बढ़कर 560 तक पहुंची। कॉर्बेट में देश में सबसे ज्यादा बाघ हैं। सुरक्षा के लिए ड्रोन, ई-सर्विलांस, विशेष गश्त और इंटेलिजेंस नेटवर्क सक्रिय है। CBI जांच की जरूरत नहीं है। लेकिन हरिद्वार की ताजा घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि निगरानी तंत्र इतना मजबूत है, तो दो बाघों का शिकार कैसे हुआ?
सबसे बड़ा सवाल
बाघ सिर्फ वन्यजीव नहीं, भारत की जैव विविधता और संरक्षण प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं। यदि इनके शिकार के पीछे अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय हैं, तो क्या ऐसे मामलों में जांच का दायरा सिर्फ राज्य स्तर तक सीमित रहना चाहिए?
हरिद्वार की घटना ने अब यह बहस तेज कर दी है कि टाइगर पोचिंग के खिलाफ लड़ाई में क्या सिर्फ स्थानीय कार्रवाई काफी है, या फिर बड़े नेटवर्क तक पहुंचने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका तय करनी होगी।



